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CAPF: पदोन्नति/वित्तीय फायदों से वंचित सीएपीएफ कैडर अफसरों को सुप्रीम कोर्ट से राहत, 6 माह में होगा रिव्यू

Jitendra Bhardwaj जितेंद्र भारद्वाज
Updated Fri, 23 May 2025 04:56 PM IST
सार

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को केंद्रीय अर्धसैनिक बलों में 'संगठित समूह ए सेवा' (ओजीएएस) लागू करने की बात कही है। इसके लिए बाकायदा छह माह की समय-सीमा भी तय की गई है।

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Supreme Court gives relief to CAPF cadre officers deprived of promotion/  financial benefits
CAPF - फोटो : एएनआई

विस्तार

केंद्रीय अर्धसैनिक बलों, विशेषकर सीआरपीएफ और बीएसएफ जैसे बड़े बलों  में पदोन्नति एवं वित्तीय फायदे के मोर्चे पर पिछड़ चुके कैडर अधिकारियों को सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले से उम्मीद बंध गई है। शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को केंद्रीय अर्धसैनिक बलों में 'संगठित समूह ए सेवा' (ओजीएएस) लागू करने की बात कही है। इसके लिए बाकायदा छह माह की समय-सीमा भी तय की गई है। चार वर्ष से लंबित कैडर रिव्यू प्रक्रिया, उक्त अवधि में ही पूरी की जाए। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि गैर-कार्यात्मक वित्तीय उन्नयन (एनएफएफयू) कैसे देना है, इसके लिए समय-सीमा सुनिश्चित की जानी चाहिए। सीएपीएफ में केवल एनएफएफयू के लिए नहीं, बल्कि सभी कार्यों के लिए 'ओजीएएस पैटर्न' लागू होना चाहिए। 

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सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा है कि सीएपीएफ अधिकारियों को उक्त प्रक्रियाओं में शामिल किया जाना चाहिए। सरकार, सीएपीएफ प्रतिनिधियों को उनकी सेवा शर्तों और पदोन्नति से संबंधित सभी चर्चाओं और निर्णयों में शामिल करे। केंद्रीय अर्धसैनिक बल, अब पूर्ण रूप से 'ओजीएएस' के दायरे में माने गए हैं। इनके हितों को लेकर सरकार जो भी निर्णय ले, उसमें 'ओजीएएस' का दृष्टिकोण मान्य रहे। सीएपीएफ के पूर्व कैडर अफसरों का कहना था कि इन बलों में 'समूह ए' अधिकारियों की सेवाएं 1986 से संगठित हैं, मगर अफसरों को उसका लाभ नहीं मिल सका। 
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2006 के दौरान जब छठे केंद्रीय वेतन आयोग ने आईएएस, आईपीएस व आईआरएस सहित अन्य सभी संगठित समूह ए सेवाओं 'ओजीएएस' के लिए गैर कार्यात्मक वित्तीय उन्नयन 'एनएफएफयू' योजना शुरु की तो कैडर अधिकारियों ने भी इसका लाभ देने की मांग की। हालांकि तब 'सीएपीएफ' को संगठित समूह 'ए' सेवा के रूप में मान्यता देने से इनकार कर दिया गया। इसके बाद कैडर अफसरों ने दिल्ली हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। लंबी कानूनी लड़ाई लड़ने के बाद 3 सितंबर 2015 के दिन अदालत ने अपने फैसले में सीएपीएफ को 1986 से 'संगठित समूह ए सेवा' घोषित कर दिया, लेकिन इसके बावजूद उन्हें फायदा नहीं मिल सका। 
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दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई। सर्वोच्च न्यायालय ने 5 फरवरी 2019 को दिए अपने फैसले में दिल्ली हाईकोर्ट के आदेश को बरकरार रखा। केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 3 जुलाई 2019 को अपनी एक घोषणा के जरिए 'सीएपीएफ संगठित सेवा ए' को मंजूरी प्रदान कर दी। तब कैडर अफसरों में यह उम्मीद जगी थी कि उन्हें एनएफएफयू के परिणामी लाभ मिल जाएंगे। रेलवे सुरक्षा बल 'आरपीएफ' भी सीएपीएफ के साथ न्यायालय में सह-याचिकाकर्ता था। केंद्रीय मंत्रिमंडल की मंजूरी के बाद रेल मंत्रालय ने न्यायालय के आदेश को अक्षरश: लागू कर दिया। आरपीएफ को संगठित सेवा का दर्जा मिल गया। उन्हें एनएफएफयू के सभी लाभ मिल गए और साथ ही उनकी सेवा का नाम बदलकर 'आईआरपीएफएस' कर दिया। कैडर अफसरों के मुताबिक, सीएपीएफ में पुराने सेवा नियमों की आड़ में खंडित एनएफएफयू को न्यायालय के आदेश की व्याख्या कर लागू किया गया है। नतीजा, इससे सीएपीएफ कैडर अफसरों की बहुत छोटी संख्या को ही उसका लाभ मिल सका। अधिकांश कैडर अफसर फायदों से वंचित रहे। 

इसके बाद भी अधिकांश अफसरों की पदोन्नति से जुड़ी समस्याएं जस की तस बनी रही। एक ही न्यायालय के आदेश की विभिन्न मंत्रालयों द्वारा अलग-अलग व्याख्या कर दी गई। अधिकारियों के मुताबिक, जब तक ओजीएएस 'संगठित सेवा' पैटर्न के अनुसार, भर्ती नियमों/सेवा नियमों में संशोधन नहीं किया जाता है, तब तक ओजीएएस का लाभ नहीं दिया जा सकता। सीएपीएफ के अधिकारियों की मांग थी कि ओजीएएस पैटर्न के अनुसार, संशोधित भर्ती नियम/सेवा नियमों के साथ कैबिनेट और सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पूर्ण कार्यान्वयन किया जाए। अनेकों बार मांग करने के बाद भी उनके सेवा नियम/भर्ती नियम संशोधित नहीं किए गए। इसका नतीजा यह निकला कि वह केस दोबारा से अदालत में पहुंच गया। 

सीएपीएफ में कैडर रिव्यू काफी समय से लंबित है। बीएसएफ और सीआरपीएफ में पिछला कैडर रिव्यू 2016 में हुआ था। अब वह कैडर रिव्यू वर्ष 2021 से लंबित है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा, 6 महीने के भीतर कैडर रिव्यू पूरा किया जाना चाहिए। इन सेवाओं के भर्ती नियमों (आरआर) में संशोधन और समयबद्ध पदोन्नति का प्रावधान हो। भर्ती नियम (आरआर) और सेवा नियम (एसआर) को ओजीएएस मानकों के अनुसार बदला जाए। एनएफएफयू, कैसे देना है, ये भी तय होगा। इसके लिए एक समय-सीमा सुनिश्चित की जानी चाहिए। जैसे, उप कमांडेंट को चार वर्ष में एनएफएफयू का फायदा मिले। सेकेंड-इन-कमांड को 9 वर्ष बाद, कमांडेंट को 13 वर्ष और महानिरीक्षक को 18 वर्ष में उक्त फायदा दिया जाए। 

कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (डीओपीटी) को सभी नियमों में संशोधन और कैडर रिव्यू 3 महीने के भीतर करना होगा। सभी तरह की प्रक्रिया में सीएपीएफ प्रतिनिधियों को शामिल किया जाए। विशेषकर, सेवा नियमों और कैडर समीक्षा से जुड़े सभी निर्णयों में सीएपीएफ के कैडर अधिकारियों की भागीदारी अनिवार्य होगी। 


सुप्रीम कोर्ट ने माना है कि सीएपीएफ अधिकारी, देश की सेवा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। वे कठिन परिस्थितियों में काम कर रहे हैं। इसके बावजूद, सीएपीएफ के कैडर अधिकारी, अपने करियर में बहुत अधिक ठहराव का सामना कर रहे हैं। अदालत ने इन बलों में बतौर प्रतिनियुक्ति बाहर से आने वाले अधिकारियों की संख्या (सीनियर एडमिनिस्ट्रेटिव ग्रेड के स्तर तक) को धीरे-धीरे कम किया जाए। साथ ही उनकी सेवा अवधि अधिकतम 2 वर्ष तक सीमित हो। इस ग्रेड में आईजी रैंक वाले अधिकारी आते हैं। यानी कुछ वर्षों के दौरान इन बलों में आईजी रैंक तक आईपीएस प्रतिनियुक्ति को खत्म किया जा सकता है।

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