कॉलेजियम सिस्टम के फैसले की समीक्षा नहीं करेगा सुप्रीम कोर्ट, याचिका खारिज
- नौ सदस्यीय बेंच ने कहा, 1993 में दिए गए फैसले की समीक्षा का मामला नहीं बनता
- नेशनल लॉयर्स कैंपेन फॉर ज्यूडिशियल रिफॉर्म्स एंड ट्रांसपेरेंसी ने दाखिल की थी याचिका
- न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए 1993 के फैसले में लाया गया था कॉलेजियम सिस्टम
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सुप्रीम कोर्ट ने एक इन चैंबर फैसले में साल 1993 में दिए गए नौ जजों की बेंच के फैसले की समीक्षा की मांग वाली याचिका खारिज कर दी। 26 साल पुराने ऐतिहासिक फैसले में न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए कॉलेजियम सिस्टम पेश किया गया था।
मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली बेंच ने नेशनल लॉयर्स कैंपेन फॉर ज्यूडिशियल रिफॉर्म्स एंड ट्रांसपेरेंसी (एनएलसीजेआरटी) की ओर से दाखिल याचिका पर विचार किया और कहा कि इस न्यायिक निर्णय की समीक्षा के लिए कोई मामला नहीं है।
16 अक्तूबर को हुए इस फैसले को बुधवार को सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट पर जारी किया गया। इस बेंच में सीजेआई के अलावा जस्टिस एसए बोबडे, जस्टिस एनवी रमना, जस्टिस अरुण मिश्रा, जस्टिस आरएफ नरीमन, जस्टिस आर भानुमति, जस्टिस यूयू ललित, जस्टिस एएम खानविलकर और जस्टिस अशोक भूषण भी शामिल थे।
पीठ ने कहा, याचिका दाखिल करने में 9071 दिन की अत्यधिक देरी की गई। याचिकाकर्ताओं ने इस देरी का संतोषजनक स्पष्टीकरण भी नहीं दिया है। पीठ ने कहा, यों तो मौजूदा याचिका को देरी के कारण ही निरस्त किया जाना चाहिए लेकिन हमने फिर भी इसे ध्यान से पढ़ा है। हम पूरी सहमति से इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि पूर्व के फैसले पर पुनर्विचार का मामला नहीं बनता। इसलिए याचिका खारिज की जाती है।
पुरानी व्यवस्था लागू करने की मांग
सुनवाई के दौरान एनएलसीजेआरटी के अध्यक्ष वकील मैथ्यूज जे नेदमपारा ने कहा, हम चाहते हैं कि साल 1993 से पहले की व्यवस्था दोबारा लागू हो। जिसमें सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के जजों की नियुक्ति और तबादले का अंतिम अधिकार केंद्र सरकार के पास होता था। इसमें कहा गया कि संविधान के अनुच्छेद 124 और 217 के तहत राष्ट्रपति के पास सीजेआई से परामर्श के बाद उच्च न्यायालयों में जजों की नियुक्ति का अधिकार है।
‘सेकंड जजेस केस’ नाम से चर्चित
नौ जजों की बेंच वाले साल 1993 के फैसले को ‘सेकंड जजेस केस’ भी कहा जाता है। इस फैसले में ये धारणा दी गई कि ‘परामर्श’ का अर्थ भारत के मुख्य न्यायाधीश की अनिवार्य ‘सहमति’ माना जाए। इस फैसले से पहले कार्यकारी प्रमुख को न्यायाधीशों की नियुक्ति और तबादले में प्रधानता प्राप्त थी।
इसके बाद साल 1998 में नौ जजों वाली सुप्रीम कोर्ट की एक अन्य पीठ ने साल 1993 के फैसले को बरकरार रखते हुए न्यायाधीशों की नियुक्ति का कॉलेजियम सिस्टम पेश किया, जिसमें सीजेआई के नेतृत्व को प्रधानता दी गई।
इसके बाद 16 अक्तूबर, 2015 को जस्टिस जेएस खेहर की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय पीठ ने राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग को खत्म किया और संविधान संशोधन के तहत मौजूदा कॉलेजियम सिस्टम कायम किया।