Supreme Court: निजी एजेंसियों से बने दस्तावेजों पर भरोसे पर सवाल नहीं; SIR में आधार पर 'सुप्रीम' टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने मतदाता सूची की विशेष गहन पुनरीक्षण में आधार कार्ड के इस्तेमाल पर उठाए गए सवालों को खारिज करते हुए कहा कि निजी एजेंसियों द्वारा जारी दस्तावेजों की विश्वसनीयता पर संदेह नहीं किया जा सकता।
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सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को मतदाता सूची की विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) में सत्यापन दस्तावेज के तौर पर आधार के इस्तेमाल को लेकर आपत्तियों पर सवाल उठाया। शीर्ष अदालत ने कहा कि पासपोर्ट जारी करने का काम भी निजी एजेंसियों को आउटसोर्स किया गया है। निजी एजेंसियों की भागीदारी से किसी दस्तावेज की विश्वसनीयता पर सवाल नहीं उठाया जा सकता है।
चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ अधिवक्ता अश्विनी कुमार उपाध्याय की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिनमें सभी राज्यों में मतदाता सूचियों के राष्ट्रव्यापी पुनरीक्षण की मांग की गई है। याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता विजय हंसारिया ने एसआईआर प्रक्रिया में आधार को सत्यापन दस्तावेज के रूप में स्वीकार करने का विरोध किया। उन्होंने तर्क दिया कि आधार कार्ड निजी तौर पर संचालित आधार केंद्रों के माध्यम से जारी किया जाता है, इसलिए इसे भरोसेमंद दस्तावेज नहीं माना जा सकता। हंसारिया ने कहा कि आधार निजी एजेंसियों की ओर से जारी किया जाता है, इसलिए इसे एसआईआर के लिए प्रासंगिक दस्तावेज नहीं माना जाना चाहिए।
इस पर जस्टिस बागची ने सवाल उठाते हुए कहा, आज कई सार्वजनिक सेवाएं निजी एजेंसियों के माध्यम से संचालित की जा रही हैं। क्या आपको पता है कि पासपोर्ट जारी करने की प्रक्रिया भी एक निजी कंपनी को आउटसोर्स की गई है? केवल निजी एजेंसियों की भागीदारी से किसी दस्तावेज की विश्वसनीयता पर सवाल नहीं उठाया जा सकता।
नाम जोड़ना और हटाना सामान्य प्रक्रिया : सीजेआई
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि एसआईआर में नाम जोड़ना और हटाना एक सामान्य और कानूनी प्रक्रिया है। केवल इस आधार पर कि कुछ नाम हटाए गए हैं, पूरी एसआईआर प्रक्रिया को गलत नहीं ठहराया जा सकता। वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल की ओर से बड़े पैमाने पर नाम काटे जाने के आरोप पर सीजेआई ने कहा, मतदाता सूची संशोधन में जोड़ और घटाव दोनों शामिल होते हैं।
आयोग को नागरिकता तय करने का अधिकार नहीं : सिब्बल
कपिल सिब्बल ने कहा, चुनाव आयोग को चुनाव कराने का अधिकार है, लेकिन नागरिकता तय करने का अधिकार केवल केंद्र सरकार के पास है। मतदाता पंजीकरण अधिकारी नागरिकता जैसे जटिल मुद्दे का फैसला नहीं कर सकते। उन्होंने कहा, बिहार में करीब 1.82 करोड़ मतदाताओं की जांच की गई, जबकि घुसपैठियों के बड़े पैमाने पर होने का कोई ठोस आंकड़ा नहीं है। चुनाव से ठीक पहले बड़े पैमाने पर नाम काटना लोकतांत्रिक भागीदारी को कमजोर कर सकता है।
आधार वैध पहचान दस्तावेज, नागरिकता का प्रमाण नहीं : जस्टिस बागची
हंसारिया ने यह भी दलील दी कि आधार के लिए किसी प्रकार का कठोर प्रमाणीकरण आवश्यक नहीं होता और कोई भी व्यक्ति, जो भारत में निवास करता है, आधार प्राप्त कर सकता है। उन्होंने कहा कि आधार न तो नागरिकता का प्रमाण है और न ही अधिवास का। इस पर जस्टिस बागची ने कहा कि अदालत ने हमेशा आधार को एक वैध पहचान दस्तावेज के रूप में स्वीकार किया है, हालांकि इसे कभी भी नागरिकता का प्रमाण नहीं माना गया। आधार एक मान्य पहचान पत्र है। हमने कभी नहीं कहा कि इसके आधार पर नागरिकता तय की जा सकती है। चुनाव आयोग को आधार का सत्यापन करने का अधिकार है। पीठ ने यह भी कहा कि एसआईआर के लिए निर्धारित 11 दस्तावेजों का हर स्थिति में नागरिकता से सीधा संबंध होना आवश्यक नहीं है। ये दस्तावेज चुनाव आयोग की ओर से अपने सांविधानिक अधिकारों के तहत निर्धारित उद्देश्य की पूर्ति के लिए तय किए गए हैं।
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