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Supreme Court: 17 साल पुराने हत्या के मामले में चार लोग बरी, कोर्ट की चुनौतियों को लेकर की यह अहम टिप्पणी

Tue, 14 Mar 2023 09:08 PM IST
शिव शरण शुक्ला न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: शिव शरण शुक्ला Updated Tue, 14 Mar 2023 09:08 PM IST
सार

पीठ ने कहा कि वास्तविक कठिनाई तीसरी श्रेणी के मामले में आती है। जहां सबूत आंशिक रूप से विश्वसनीय और आंशिक रूप से अविश्वसनीय होते हैं। ऐसे मामलों में, अदालत को ज्यादा चौकस रहने की जरूरत होती है। यहां पर विश्वसनीय गवाही, प्रत्यक्ष या परिस्थितिजन्य से आगे की स्थिति की भी पुष्टि करने की मांग करती है। 
 

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Supreme Court acquitted four people in 17 years old murder case also made important remarks
सुप्रीम कोर्ट। - फोटो : ANI

विस्तार

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को 2006 के हत्या के एक मामले में सुनवाई करते हुए अहम टिप्पणी की। शीर्ष अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में जहां सबूत आंशिक रूप से विश्वसनीय और आंशिक रूप से अविश्वसनीय होता है, वहां अदालत को बहुत सतर्क रहने की आवश्यकता होती है। शीर्ष कोर्ट ने यह भी कहा कि यह स्थिति वैसी ही होती है जैसे अनाज से भूसी को अलग करना हो। ऐसे में विश्वसनीय गवाही, प्रत्यक्ष या परिस्थितिजन्य से आगे की पुष्टि करने की जरूरत होती है। 

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न्यायमूर्ति बी आर गवई की अध्यक्षता वाली पीठ हत्या के एक मामले में छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट के नवंबर 2014 के फैसले को चुनौती देने वाले अभियुक्तों द्वारा दायर याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी। शीर्ष अदालत ने अदालत 2006 के एक हत्या के मामले में दोषी ठहराए गए और आजीवन कारावास की सजा पाए चार लोगों को बरी करते हुए उनकी याचिकाओं को स्वीकार कर लिया। दरअसल, छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने उनकी अपील खारिज कर दी थी और ट्रायल कोर्ट के मई 2008 के फैसले को बरकरार रखा था। ट्रायल कोर्ट के फैसले में याचिकाकर्ता और अन्य को मामले में दोषी ठहराया गया था।
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गौरतलब है कि इस पीठ में जस्टिस विक्रम नाथ और संजय करोल भी शामिल हैं। अदालत ने कहा कि ऐसे मामले में जहां सबूत पूरी तरह भरोसेमंद हों वहां इसके आधार पर सजा सुनाना कोई मुश्किल नहीं है। वहीं जहां सबूत पूरी तरह गैर भरोसेमंद हों वहां भी अभियुक्तों को रिहा करने में कोई दिक्कत नहीं है। लेकिन असल मुश्किल तब आती है जब सबूत कुछ भरोसेमंद और कुछ गैर भरोसेमंद हों। इस मामले में आरोपियों की दोषसिद्धि स्वार्थप्रेरित गवाही पर आधारित है और बिना पर्याप्त परिपुष्टि के यह गवाही टिकाऊ नहीं है। यह कहते हुए कोर्ट ने चारों को रिहा करने का आदेश दिया।
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जिस मामले में पीठ सुनवाई कर रही थी उसके संदर्भ में अभियोजन पक्ष का कहना है कि घटना नवंबर 2006 में हुई थी। उस समया आरोपियों में से एक नरेश कुमार ने कथित तौर पर एक व्यक्ति आत्माराम के साथ मारपीट की थी। जिसने बाद में  पुलिस स्टेशन में शिकायत भी दर्ज कराई थी। पुलिस ने इस मामले में दावा किया था कि इसके बाद कुमार, अन्य आरोपियों के साथ मिलकर आत्माराम के घर में घुस गया, जहां उन्होंने कुछ लोगों के साथ मारपीट की। इस मारपीट में कार्तिकराम की मौके पर ही मौत हो गई।


शीर्ष अदालत ने अपने फैसले में कहा कि मामले में  एक प्राथमिकी दर्ज की गई थी। साथ ही जांच पूरी होने के बाद 12 आरोपियों के खिलाफ आरोप पत्र दायर किया गया था। शीर्ष अदालत ने कुमार और तीन अन्य आरोपियों की अपील पर सुनवाई की। 

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