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चिंताजनक: शरीर के संवेदनशील अंगों तक पहुंचा प्लास्टिक, प्रजनन क्षमता पर खतरा; दंपतियों को घबराने की जरूरत नहीं

Fri, 04 Jul 2025 07:19 AM IST
दीपक कुमार शर्मा अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली Published by: दीपक कुमार शर्मा Updated Fri, 04 Jul 2025 07:19 AM IST
सार

शोधकर्ताओं ने 22 पुरुषों के वीर्य नमूनों का विश्लेषण किया और पाया कि इनमें 55 फीसदी में माइक्रोप्लास्टिक कण मौजूद थे। सबसे ज्यादा पाया जाने वाला पदार्थ पॉलीटेट्राफ्लूरो एथिलीन (पीटीएफई) था, जो 41 फीसदी नमूनों में मिला।

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Study: Microplastics now reaching most sensitive parts of body
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : freepik

विस्तार

माइक्रोप्लास्टिक अब हमारे शरीर के अत्यंत संवेदनशील हिस्सों तक पहुंचने लगे हैं। ताजा अध्ययन में मनुष्य के प्रजनन द्रव, यानी वीर्य और महिलाओं के कूपिक तरल में माइक्रोप्लास्टिक की मौजूदगी मिली है। यूरोपीय सोसायटी ऑफ ह्यूमन रिप्रोडक्शन एंड एम्ब्रियोलॉजी की 41वीं वार्षिक बैठक में इसका खुलासा हुआ, जहां वैज्ञानिकों ने इसे मानव प्रजनन स्वास्थ्य के लिए एक गंभीर खतरा बताया।

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शोधकर्ताओं ने 22 पुरुषों के वीर्य नमूनों का विश्लेषण किया और पाया कि इनमें 55 फीसदी में माइक्रोप्लास्टिक कण मौजूद थे। सबसे ज्यादा पाया जाने वाला पदार्थ पॉलीटेट्राफ्लूरो एथिलीन (पीटीएफई) था, जो 41 फीसदी नमूनों में मिला। इसके अतिरिक्त पॉलीस्टाइरीन 14, पीईटी 9, पॉलियामाइड 5 और पॉलीयुरेथेन 5 फीसदी की मौजूदगी दर्ज की गई। पीटीएफई सबसे आम माइक्रोप्लास्टिक है, जो नॉन-स्टिक बर्तनों में उपयोग किया जाता है। शोध के दौरान 29 महिलाओं के कूपिक तरल (जो अंडाणु निर्माण की प्रक्रिया से जुड़ा तरल होता है) के नमूनों का अध्ययन किया गया, जिसमें 69 फीसदी नमूनों में माइक्रोप्लास्टिक पाए गए। यहां भी पीटीएफई की उपस्थिति सर्वाधिक 31 फीसदी रही। इसके बाद पीपी 28, पीईटी 17, पीए 14, पीई 10, पीयू 10 और पीएस 7 फीसदी पाए गए। शोध अध्ययन को रिप्रोडक्शन पत्रिका में प्रकाशित किया जाएगा।
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ऐसे शरीर में पहुंच रहे सुक्ष्म कण
माइक्रोप्लास्टिक अत्यंत छोटे प्लास्टिक कण होते हैं, जिनका आकार पांच मिलीमीटर से भी कम होता है। ये प्लास्टिक बोतलों, पैकेजिंग सामग्री, कपड़ों, सौंदर्य उत्पादों और घरेलू प्लास्टिक कचरे से टूटकर हमारे शरीर में पहुंच रहे हैं। इनका आकार इतना सूक्ष्म होता है कि इन्हें सामान्य दृष्टि से देख पाना संभव नहीं होता।
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और शोध की जरूरत
पशुओं पर किए गए शोध से पता चला है कि शरीर में जमा माइक्रोप्लास्टिक सूजन, डीएनए क्षति, हार्मोनल गड़बड़ी और कोशिकीय विकृति का कारण बन सकते हैं। हालांकि मानव शरीर में इनके प्रभावों को समझने के लिए अभी और शोध की आवश्यकता है।


प्लास्टिक के कम से कम उपयोग से ही बचाव संभव
वैज्ञानिकों ने सुझाव दिया है कि आम लोग भी अपनी जीवनशैली में कुछ साधारण बदलाव कर सकते हैं। जैसे खाने को प्लास्टिक की बजाय कांच या स्टील के बर्तनों में रखना, गर्म करने के लिए माइक्रोवेव में प्लास्टिक का प्रयोग न करना  और पानी के लिए प्लास्टिक बोतलों की जगह मिट्टी या धातु के पात्रों का उपयोग करना।

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दंपतियों को घबराने की जरूरत नहीं
शोधकर्ताओं का कहना है कि खोज चौंकाने वाली है, फिर भी गर्भधारण की कोशिश कर रहे दंपतियों को घबराने की जरूरत नहीं है। प्रजनन क्षमता कई कारकों से प्रभावित होती है जैसे उम्र, आनुवंशिकी, आहार और जीवनशैली। माइक्रोप्लास्टिक इनमें से सिर्फ एक संभावित कारक हो सकता है।

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