अधिकार कार्यकर्ता इरोम शर्मिला ने दो आदिवासी महिलाओं के कपड़े उतारकर परेड कराने की घटना को 'अमानवीय' और 'बहुत परेशान करने वाला' करार दिया और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से उनके गृह राज्य में स्थिति से निपटने के लिए तुरंत दखल देने का आग्रह किया। उन्होंने कहा कि वह उस वीडियो क्लिप को देखने के बाद अपने आंसू नहीं रोक पाईं, जिसमें चार मई को पूर्वोत्तर राज्य के कांगपोकपी जिले में पुरुषों के एक समूह द्वारा दो महिलाओं को निर्वस्त्र घुमाते और छेड़छाड़ करते दिखाया गया है।
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मणिपुर घटना
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19 जुलाई को सामने आए इस वीडियो की देशभर में निंदा हुई थी। तब से पुलिस ने छह लोगों को गिरफ्तार किया है। पुरस्कार विजेता अधिकार कार्यकर्ता शर्मिला ने कहा, यह अमानवीय और परेशान करने वाली घटना है मुझे जो वीडियो मिला है उसे देखकर मैं अपने आंसू नहीं रोक पाई। उन्होंने बेंगलुरु से पीटीआई-भाषा को दिए एक इंटरव्यू में कहा, 'मैं बहुत दुखी और स्तब्ध हूं।'
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पीएम मोदी (फाइल)।
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राज्य स्थिति नियंत्रित नहीं कर सकता तो पीएम चुप क्यों?
मणिपुर की रहने वाली शर्मिला सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून (एएफएसपीए) हटाने की मांग को लेकर 16 साल से भूख हड़ताल पर रहीं थीं। उस अवधि के दौरान उन्हें भोजन नलियों द्वारा जबरन खिलाया गया था। उन्होंने कहा, 'यह स्पष्ट है कि मणिपुर में राज्य सरकार पूरी तरह से विफल रही है और जब एक राज्य स्थिति को नियंत्रित नहीं कर सकता है, तो प्रधानमंत्री चुप क्यों हैं? उन्हें मणिपुर के लोगों की रक्षा करनी चाहिए। अगर वह मणिपुर के लोगों की पीड़ा के बारे में चिंतित हैं, तो उन्हें हस्तक्षेप करना चाहिए... गुजरात के लोगों की तरह मणिपुरियों को भी उनके नेतृत्व की जरूरत है।'
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मणिपुर के मुख्यमंत्री बीरेन सिंह
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'अपनी विफलता को स्वीकार करें मुख्यमंत्री, माफी मांगें'
'आयरन लेडी' के नाम से मशहूर शर्मिला ने मांग की कि मुख्यमंत्री एन बीरेन सिंह को अपनी विफलता स्वीकार करनी चाहिए और लोगों से माफी मांगनी चाहिए। उन्होंने कहा, मुख्यमंत्री को मतभेदों को दरकिनार करते हुए सभी 60 विधायकों से बात करनी चाहिए। उन्हें उनसे वन-टू-वन बात करनी चाहिए और उनकी राय पर विचार करना चाहिए और तय करना चाहिए कि दो समुदायों (मैतई और कुकी) के बीच नफरत की भावना को कैसे रोका चाहिए। यह समय की मांग है।
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इंटरनेट स्पीड (सांकेतिक)
- फोटो : सोशल मीडिया
'इंटरनेट पर पाबंदी से मणिपुर को नहीं मिली कोई मदद'
शर्मिला का यह भी मानना है कि फर्जी खबरों और वीडियो के प्रसार को रोकने के लिए इंटरनेट पर प्रतिबंध से मणिपुर की स्थिति में कोई मदद नहीं मिली है। उन्होंने कहा, 'मुझे नहीं लगता कि इंटरनेट पर इस प्रतिबंध से मणिपुर में हिंसा को नियंत्रित करने में मदद मिली है। इसके विपरीत, अगर इंटरनेट काम कर रहा होता, तो महिलाओं (स्ट्रिप परेड पीड़ितों) को न्याय मिल सकता था और अपराधी सलाखों के पीछे हो सकते थे।'