होली- प्रहलाद के बचने की खुशी या कामदेव के?
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
भारत में मनाए जाने वाले सबसे शानदार त्योहारों में से एक है होली। रंगों और मस्ती के ऐसे त्योहार यूं तो दुनिया भर में कई रूप में मनाए जाते हैं लेकिन हिंदुओं के लिए होली का पौराणिक महत्व भी है। बुराई पर अच्छाई की जीत के इस त्यौहार को लेकर कई कहानियां प्रचलित हैं, इनमें से चार प्रमुख कहानियां यहां हम आपके सामने पेश कर रहे हैं।
प्रहलाद और हिरण्यकश्यप की कहानी-
सबसे अहम और प्रचलित है प्रहलाद और हिरण्यकश्यप की कहानी, कहा जाता है कि किसी समय एक शक्तिशाली राक्षस राजा हिरण्यकश्यप था जो खुद को ईश्वर मानता था और चाहता था कि सभी उसकी पूजा करें।
लेकिन उसके ही बेटे प्रहलाद ने उसे भगवान मानने से इनकार कर दिया और विष्णु की पूजा करने लगा। बहुत समझाने बुझाने पर भी जब प्रहलाद नहीं माना तो हिरण्यकश्यप ने प्रहलाद को मारने का एक तरीका सोचा।
उसने अपनी बहन होलिका से कहा कि वो प्रहलाद को गोद में बिठाकर आग में प्रवेश कर जाए, क्योंकि होलिका को वरदान था कि आग उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकेगी।
कहा जाता है कि प्रहलाद को अपनी असीम भक्ति का फल मिला और होलिका को अपनी कुटिलता की कीमत चुकानी पड़ी- मतलब आग में होलिका तो जल गई, प्रहलाद बच गया।
राधा और कृष्ण की कहानी
होली का त्योहार राधा और कृष्ण की प्रेम कहानी से भी जुड़ा हुआ है, बसंत में एक-दूसरे पर रंग डालना उनकी लीला का एक अंग माना गया है। बाद में ये एक परंपरा बन गई और शायद यही वजह है कि मथुरा में फूलों से भी होली खेली जाती है।
श्रीकृष्ण और पूतना की कहानी-
एक और पौराणिक कथा के अनुसार जब कंस को श्रीकृष्ण के गोकुल में होने का पता चला तो उसने पूतना नामक राक्षसी को गोकुल में जन्म लेने वाले हर बच्चे को मारने के लिए भेजा।
पूतना सुंदर रूप बना सकती थी और महिलाओं में आसानी से घुलमिल जाती थी, उसकी योजना स्तनपान के बहाने शिशुओं को विषपान कराना था। गोकुल के कई शिशु उसका शिकार बन गए लेकिन कृष्ण उसकी सच्चाई को समझ गए। उन्होंने दुग्धपान करने के समय ही पूतना का वध कर दिया। कहा जाता है कि तभी से होली पर्व मनाने की मान्यता शुरू हुई।
कहानी शिव-पार्वती की
एक कहानी शिव-पार्वती की भी है, पार्वती शिव से विवाह करना चाहती थीं लेकिन तपस्या में लीन शिव का ध्यान उनकी ओर गया ही नहीं। ऐसे में प्यार के देवता कामदेव आगे आए और उन्होंने शिव पर पुष्प बाण चला दिया।
लेकिन तपस्या भंग होने से शिव को इतना ग़ुस्सा आया कि उन्होंने अपनी तीसरी आंख खोल दी और उनके क्रोध की अग्नि में कामदेव भस्म हो गए, फिर शिवजी ने पार्वती को देखा और कुछ कामदेव के बाण का असर और कुछ पार्वती की आराधना- शिव ने उन्हें अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार कर लिया।
कुछ लोग कहते हैं कि होली की आग में वासनात्मक आकर्षण को प्रतीकात्मक रूप से जला कर सच्चे प्रेम की विजय का उत्सव मनाया जाता है लेकिन कुछ इसी कहानी का और विस्तार करते हैं।
इसके अनुसार कामदेव के भस्म हो जाने पर उनकी पत्नी रति रोने लगीं और शिव से कामदेव को जीवित करने की गुहार लगाई, अगले दिन तक शिव का क्रोध शांत हो चुका था, उन्होंने कामदेव को पुनर्जीवित कर दिया। तो कामदेव के भस्म होने के दिन होलिका जलाई जाती है और उनके जीवित होने की खुशी में रंगों का त्योहार मनाया जाता है।