स्टेप बाई स्टेप भारत-चीन सुलझा रहे हैं लद्दाख में सीमा पर टकराव का मुद्दा
- दोनों देशों के विदेश मंत्रालय संपर्क में
- चीन और भारत का शिखर नेतृत्व किसी टकराव का पक्षधर नहीं
- कूटनीतिक, रणनीतिक संवाद, सहयोग, समन्वय ही सबसे अच्छा उपाय
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
इस सप्ताह भारत और चीन के लेफ्टिनेंट जनरल स्तर के सैन्य कमांडर फिर चर्चा करेंगे। पिछली चर्चा 6 जून को लेफ्टिनेंट जनरल हरिंदर सिंह और चीन के मेजर जनरल लियु लिन के बीच में हुई थी।
चर्चा के नतीजों को लेकर माना जा रहा है कि दोनों देशों के विदेश मंत्रालय संपर्क में हैं। पिछली चर्चा मोल्डो में हुई थी। इसके बाद चीन की सेना पेट्रोलिंग प्वांइट 14 (गलवां नाला), प्वांइट 15 और हॉट स्प्रिंग एरिया से कहीं 2.5 तो कहीं 2.00 किमी पीछे चीन की तरफ हटी है।
भारत की सेना भी इसी अनुपात में पीछे हटी है। इससे पहले 05 जून को विदेश मंत्रालय के संयुक्त सचिव नवीन (पूर्व एशिया) श्रीवास्तव और चीन के उनके समकक्ष वू च्यांगाओ के बीच चर्चा से पहले भी चीन की सेना ने अपने कदम पीछे खींचे थे। चीन ने अपने सैन्य कमांडर को बदलकर नरम रुख दिखाया था।
विदेश और रक्षा मंत्रालय के सूत्र बताते हैं कि चीन के साथ बातचीत अच्छे माहौल तथा सकारात्मक दिशा में बढ़ रही है। दोनों पक्ष शांतिपूर्ण तरीके से सहयोग, समन्वय, संवाद और कूटनीतिक तरीके से द्विपक्षीय मामले को सुलझाने के पक्ष में है।
चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता झाओ लिजियान ने भी इसी पर जोर दिया है। भारत और चीन दोनों का मानना है कि उनके पास सीमा विवाद संबंधी मामलों के लिए सीमा प्रबंधन मैकेनिज्म है।
इसे और प्रभावी बनाए जाने की जरूरत है। समझा जा रहा है कि लद्दाख एपीसोड के बाद जल्द ही दोनों देशों में कूटनीतिक प्रयास नई दिशा में काम करेंगे।
इसका मुख्य मकसद सीमा पर इस तरह तनाव की स्थिति न आने के उपायों पर जोर देना रहेगा।
भारत ने सबसे पहले भेजी थी चीन को चिकित्सा सहायता
पूर्व विदेश सचिव शशांक ने इसे अच्छी प्रगति बताया है। शशांक का कहना है कि चीन की सेना के पीछे हटने के संकेत से साफ है कि भारत और चीन समाधान की दिशा में बढ़ रहे हैं।
उन्होंने कहा कि शिखर नेताओं के बीच में अच्छा सामंजस्य है। वुहान में और महाबलिपुरम में अनौपचारिक बातचीत होना इसका साफ संकेत हैं। यह विश्वास बहाली की दिशा में बड़ा कदम माना जाता है।
पूर्व विदेश सचिव ने कहा कि हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि चीन के कोविड-19 संक्रमण से ग्रस्त रहने के दौर में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सबसे पहले दस टन चिकित्सा सामग्री भेजने का निर्णय लिया था। राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने इसके लिए प्रधानमंत्री मोदी की सराहना की थी।