क्या सोनिया प्रियंका-राहुल की जोड़ी को उतारेंगी?
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2016 की कांग्रेस को समझने के लिए 1997 की दूसरी छमाही को याद करना होगा, जब असलम शेर खान, मणिशंकर अय्यर, पीआर कुमारमंगलम, सुरेश कलमाड़ी और बूटा सिंह जैसे नेताओं ने कांग्रेस का साथ छोड़ दिया था। ऐसे में, बड़ी मायूसी के साथ तब की कांग्रेस के दूसरी श्रेणी के दिग्विजय सिंह, अहमद पटेल, अशोक गहलोत, वयालार रवि और कमलनाथ जैसे नेताओं ने 'एपोलिटिकल' सोनिया गांधी से गुहार लगाई थी, ''आप कैसे अपनी आंखों के सामने कांग्रेस ध्वस्त होने दे सकती है।
'' राजीव गांधी हत्याकांड जांच में धीमी प्रगति, कांग्रेस की खस्ताहाल स्थिति और नेहरू-गांधी विरासत पर लगातार होते हमलों ने सोनिया को सक्रिय राजनीति में आने के लिए मजबूर कर दिया। सोनिया गांधी ने कांग्रेस को उस प्यार के विस्तार के रूप में देखा जो उन्होंने राजीव गांधी से किया और साथ ही उस देश से भी, जिसे उन्होंने रहने के लिए चुना था।
सोनिया ने पहले से ही घोषित आम चुनाव में कांग्रेस के प्रचार अभियान में शामिल होने की घोषणा करने का दिन चुना 28 दिसंबर, 1997। यह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की 112वीं वर्षगांठ थी। तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष सीताराम केसरी को उम्मीद नहीं थी कि सोनिया राजनीति में आएंगी।
10 जनपथ से एक छोटा सा नोट सीताराम केसरी को भेजा गया था।
10 जनपथ से एक छोटा सा नोट सीताराम केसरी को भेजा गया था। इसमें कहा गया था कि उन्हें इस बात की आधिकारिक घोषणा करनी है कि 'सोनिया कांग्रेस के अभियान के लिए तैयार हैं।' केसरी खुद से बुदबुदाए थे, ''सब कुछ खत्म, वो आ रही है।'' उन्होंने तय किया कि वे मीडिया को संबोधित नहीं करेंगे और उन्होंने सभी अहम घोषणाएं करने की जिम्मेदारी पार्टी प्रवक्ता वीएन गाडगिल को सौंप दी।
आधिकारिक तौर पर सोनिया के राजनीति में उतर आने के बाद पार्टी से नेताओं का पलायन रुका, विभाजित कांग्रेस एक हुई और पार्टी कार्यकर्ताओं में उम्मीद का संचार हुआ। अगले छह साल के दौरान सोनिया ने पार्टी संगठन को मजबूत करने पर ध्यान दिया और राज्यों में नेतृत्व को मजबूती दी।
कांग्रेस शासित राज्यों में वाईएस राजशेखर रेड्डी, शीला दीक्षित, दिग्विजय सिंह, अशोक गहलोत, कैप्टन अमरिंदर सिंह, गुलाम नबी आजाद को ना केवल पूरी आजादी मिली बल्कि समय समय पर होने वाले सम्मेलनों में बोलने का मौका भी मिला। ये सम्मेलन दिल्ली, माउंट आबू, गुवाहाटी, शिमला, नैनीताल और श्रीनगर में आयोजित हुए थे। कांग्रेस अध्यक्ष के तौर पर सोनिया गांधी ने जापानी तरीका अपनाया। इसमें अधिकतम विचार विमर्श पर ज़ोर दिया गया। यह तरीका इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के मनमाने तरीक़े से काफ़ी अलग था, क्योंकि उन दोनों के जमाने में राज्य के मुख्यमंत्री जल्दी-जल्दी बदले जाते थे।
मई 2004 के चुनावी नतीजों ने कई कांग्रेसियों की नजर में सोनिया गांधी का कद काफ़ी बड़ा कर दिया।
मई 2004 के चुनावी नतीजों ने कई कांग्रेसियों की नजर में सोनिया गांधी का कद काफ़ी बड़ा कर दिया। इटली में जन्मी सोनिया ने अपने क़दम तब थोड़े पीछे करके पार्टी के अनुभवी नेताओं को बढ़ावा दिया। लोकसभा की पिछली सीट पर बैठने वाले राहुल गांधी को मनमोहन सिंह के रूप में मेंटॉर मिला।
हालांकि सोनिया ने जयराम रमेश, पुलक चटर्जी और कुछ अन्य लोगों की सलाह पर ध्यान देना शुरू किया। ये लोग एक तरह से पार्टी प्रमुख के लिए सुपर कैबिनेट के तौर पर काम करने लगे थे। आनन-फानन में सोनिया गांधी के लिए संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) चेयरपर्सन और राष्ट्रीय सलाहकार परिषद प्रमुख जैसे पद बनाए गए।
तब प्रणब मुखर्जी, नटवर सिंह, अर्जुन सिंह और एके एंटनी जैसे सीनियर नेताओं ने सोचा कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पर इसके ज़रिए नियंत्रण रखा जाएगा। इन नेताओं के व्यक्तिगत पूर्वाग्रह के चलते ना तो उनमें साहस रहा होगा और ना ही नैतिक दायित्व कि वे इन प्रावधानों का विरोध कर सकें।
इन सबका असर यूपीए- दो के कार्यकाल में देखने को मिला। तब तक नटवर सिंह कांग्रेस से बाहर हो चुके थे, अर्जुन सिंह कैबिनेट से बाहर हो चुके थे और प्रणब मुखर्जी राष्ट्रपति भवन पहुंच चुके थे। दोषी अंतरात्मा के साथ केवल एके एंटनी बचे थे।
19 साल बाद उनके सामने कांग्रेस पार्टी के हित में कुछ कड़े कदम उठाने की जरूरत आ गई है।
'हाऊसवाइफ़' से चतुर राजनेता के तौर पर सोनिया गांधी के असाधारण सफर के करीब 19 साल बाद उनके सामने कांग्रेस पार्टी के हित में कुछ कड़े कदम उठाने की जरूरत आ गई है, उसी कांग्रेस के लिए जिसे वह राजीव से प्रेम का विस्तार मानती रही है। सबसे पहले तो कांग्रेस अध्यक्ष को आत्मविश्लेषण करना होगा कि क्या राहुल गांधी को पार्टी प्रमुख के पद के लिए आगे बढ़ाने का फैसला सही है।
ये सच है कि हैदराबाद और जयपुर में राहुल को प्रमोट करने के फैसले के लिए कांग्रेस का पूरा तंत्र जिम्मेदार है, लेकिन कांग्रेस परिवार का मुखिया होने के नाते सोनिया को अपने फैसले पर फिर से विचार करना होगा। उन्हें अंतरात्मा की आवाज सुननी होगी। इससे भी अहम, सोनिया गांधी को ये भी सोचना होगा कि क्या इस महत्वपूर्ण समय में कोई खास कार्रवाई करने की जरूरत है?
अगर राहुल गांधी पार्टी काडर का उत्साह नहीं बढ़ा पा रहे हैं तो क्या प्रियंका गांधी को उनकी जोड़ी के तौर पर सामने लाया जा सकता है? क्या उन्हें पार्टी के लिए उम्मीद के तौर पर पेश किया जा सकता है? ठीक उसी तरह जैसे सोनिया ने खुद को दिसंबर, 1997 में पेश किया था? क्या राहुल गांधी और प्रियंका गांधी के बीच कामों का बंटवारा इस तरह से हो सकता है कि पार्टी के अंदर दो पावर सेंटर न बन जाएं?
कांग्रेस में तो बड़ा समृद्ध इतिहास रहा है जब नेहरू-गांधी परिवार के सदस्यों ने जोड़ी के तौर पर काम किया। अगर प्रियंका राजनीति में आती हैं तो ये पहला मौका नहीं होगा कि जब नेहरू गांधी परिवार के दो सदस्य एक साथ काम करते नजर आएंगे और सर्वोच्च पदों पर होंगे।
1959 में इंदिरा गांधी कांग्रेस की अध्यक्ष बनी थीं, तब जवाहर लाल नेहरू प्रधानमंत्री थे।
1959 में इंदिरा गांधी कांग्रेस की अध्यक्ष बनी थीं, तब जवाहर लाल नेहरू प्रधानमंत्री थे। नेहरू के आलोचकों ने तब माना था कि वे अपनी बेटी को आगे बढ़ा रहे थे, लेकिन कांग्रेस के बड़े तबके की यही राय थी कि इंदिरा ने अपनी क़ाबलियत से पद हासिल किया। इसकी पर्याप्त वजहें भी थीं।
कांग्रेस अध्यक्ष के तौर पर इंदिरा गांधी ने केरल की समस्या का हल निकाला और इसके अलावा भाषाई समस्या को देखते हुए महाराष्ट्र और गुजरात को अलग राज्य बनाने की अनुशंसा की। जब उनका कार्यकाल 1960 में समाप्त हुआ तो कांग्रेस कार्यकारिणी ने काफ़ी कोशिश की थी कि इंदिरा अध्यक्ष बनी रहें। लेकिन उन्होंने इंकार कर दिया।
साल 1974 से 1980 के दौरान संजय गांधी आधिकारिक तौर पर कांग्रेस में किसी पद पर नहीं रहे। थोड़े समय के लिए वे कांग्रेस के महासचिव जरूर रहे। लेकिन वे कांग्रेस में संस्थागत और प्रशासनिक स्तर पर इंदिरा के बराबर की हैसियत रखते थे। जून 1980 में हवाई दुर्घटना में अपनी मौत से कुछ ही महीने पहले संजय गांधी के साथी रामचरण रथ ने संजय गांधी को पार्टी अध्यक्ष के तौर पर देखना शुरू कर दिया था।
रथ कहा करते थे, ''सुभाष चंद्र बोस और जवाहर लाल नेहरू कम उम्र में कांग्रेस अध्यक्ष बन गए थे। ऐसे में, अगर संजय को पार्टी अध्यक्ष चुना जाता है, तो यह पूरी तरह लोकतांत्रिक होगा। इसमें कुछ भी गलत नहीं है।''
राजीव को दिल्ली में 24 अकबर रोड की कोठी में एक कमरा दिया गया।
संजय के भाई राजीव गांधी 1983 में कांग्रेस के महासचिव बने। तब उनकी मां इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री थी। राजीव को दिल्ली में 24 अकबर रोड की कोठी में एक कमरा दिया गया। उस दौर में भी राजीव की खूब चलती थी और इंदिरा कैबिनेट के ज़्यादातर मंत्री उनके दफ़्तर के बाहर इंतजार करते पाए जाते थे।
लेकिन साल 2006 से 2014 के दौरान सोनिया और राहुल के कामकाजी रिश्ते में, संजय-राजीव के दौर के मुकाबले खासा अंतर दिखा। यूपीए के वो मंत्री जो टीम राहुल में शामिल नहीं थे, उन पर ऐसा कोई दबाव नहीं था कि वो राहुल गांधी से भी मिलें और विचार विमर्श करे। राहुल की टीम के युवा मंत्री अजय माकन, आरपीएन सिंह, मिलिंद देवड़ा और सचिन पायलट जरूर उनके करीब थे और उनसे संपर्क में रहते थे।
कांग्रेस महासचिव के तौर पर राहुल गांधी ने खुद को युवा कांग्रेस और छात्र कांग्रेस की गतिविधियों में सीमित रखा। जून, 2016 में देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी - कांग्रेस के अंदर सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या सोनिया विवेकपूर्ण ढंग से फैसला लेंगी और पार्टी की कमान उन हाथों में देंगी जिससे पार्टी को फायदा होगा।