पाकिस्तान ने सुनियोजित तरीके से कराई बुखारी की हत्या, ऐसे हुआ खुलासा
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क्या राइजिंग कश्मीर के एडीटर शुजात बुखारी को कश्मीर पर पाकिस्तान के दृष्टिकोण से इतर जाने की कीमत चुकानी पड़ी? खुफिया एजेंसियों के शुरुआती आंकलन में यह बात सामने आ रही है। भारत और पाकिस्तान के बीच चल रहे ट्रैक-2 बातचीत का हिस्सा रहे बुखारी ने हाल के दिनों में कश्मीर का भविष्य भारत के साथ सुरक्षित होने की बात कई मौकों पर कही थी। सुरक्षा एजेंसियों के मुताबिक पाकिस्तान ने कश्मीर पर बेबाक राय रखने वाले असरकारक शख्स की सनसनीखेज हत्या करवा कर घाटी में बन रही कई सकारात्मक संभावनाओं को खत्म कर दिया।
उच्च पदस्थ सूत्रों ने बताया कि बुखारी दुबई और इस्तांबुल में ट्रैक-2 की बातचीत में शामिल हुए थे। इस दौरान उन्होंने अपनी राय रखी थी कि कश्मीरी आवाम भारत के साथ रह कर ही अपने अच्छे भविष्य की कल्पना कर रहा है। हालांकि बुखारी कई मंचों पर कश्मीर में केंद्र सरकार की कई नीतियों की निंदा भी कर चुके हैं। लेकिन कश्मीर को भारत के साथ ही रहने की हिमायत करते रहे थे।
सूत्रों ने बताया कि बुखारी की हत्या कोई आम आतंकी घटना नहीं थी बल्कि वह काफी सुनियोजित तरीके से की गई है। सीसीटीवी में कैद मोटर साईकिल सवार तीन लड़के लाल चौक के आसपास ही इंतजार कर रहे थे। जब बुखारी प्रेस एनक्लेव से करीब सात बजे निकले तो वहीं मौजूद किसी शख्स ने आतंकियों को उनके निकलने की सूचना दी।
लश्कर के लोग भारत की हिमायत करने वाले नामचीन लोगों को अपना निशाना बनाते हैं
पांच से दस मिनट के भीतर मोटर साइकिल सवार आए और पिस्तौल से पहले सुरक्षा गार्डों को मारा। फिर एके-47 की गोलियों से बुखारी को छलनी कर दिया। सूत्रों का कहना है कि यह पाकिस्तानी आकाओं के इशारों पर चलने वाले घाटी में रह रहे लश्कर-ए-तैयबा के गुर्गों का काम है। लश्कर के ऐसे लोग घाटी में भारत की हिमायत करने वाले नामचीन लोगों को अपना निशाना बनाते हैं।
सूत्रों के मुताबिक केंद्र रमजान के दौरान सीजफायर की अवधि बढा कर अलगाववादियों को बातचीत के टेबल पर लाने की गंभीर कोशिश में जुटा था। अब बुखारी की हत्या के बाद यह संभावना बिल्कुल ही खत्म होती दिख रही है। अब अलगाववादियों के बातचीत में यकीन रखने वाला धड़ा भी चुप्पी लगाकर बैठ जाएगा।
सूत्रों के मुताबिक इससे पहले घाटी में मौजूद पाकिस्तान के गुर्गों ने अलगाववादी नेता अब्दुल गनी लोन की हत्या भी इसी वजह से की थी। 90 के दशक की शुरुआत में लोग शुजात बुखारी की ही तरह कश्मीर का भविष्य भारत के साथ होने की तरफदारी करने लगे थे। सूत्रों के मुताबिक उस घटना के बाद मौत के डर से अलगाववादी लगातार पाकिस्तान की भाषा बोलते हैं।