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शंकर सिंह वाघेला का नया दांव क्या होगा
बीबीसी हिन्दी
Updated Mon, 24 Jul 2017 01:29 PM IST
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शंकर सिंह वाघेला
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गुजरात भारत का पहला ऐसा राज्य है, जहां बीजेपी ने 1995 मे पूर्ण बहुमत के साथ सरकार बनाने मे कामयाबी हासिल की थी। बीजेपी ने 182 सीटो मे 121 सीटो पर जीत दर्ज की थी। यह अभी तक बीजेपी के लिए एक रिकॉर्ड जीत की तरह है। बीजेपी की इस सफलता मे तीन लोगो की बड़ी भूमिका थी। पहली भूमिका थी। उस समय गुजरात बीजेपी के अध्यक्ष शंकर सिंह वाघेला की और दूसरी भूमिका थी। केशुभाई पटेल की और तीसरी भूमिका थी, उस वक्त संघ प्रचारक रहे नरेंद्र मोदी की।
इस शुक्रवार को शंकर सिंह वाघेला ने ख़ुद को कांग्रेस से अलग कर लिया। विधानसभा में विपक्ष के नेता के तौर पर वे 57 कांग्रेसी विधायकों का नेतृत्व कर चुके है। कोई निष्ठावान 'असली' कांग्रेसी नेता भी इससे इंकार नहीं कर सकता कि वाघेला गुजरात में उनके सबसे करिश्माई नेता थे जिनके पास बड जन समर्थन और पहचान थी।
जनसंघ, राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ, जनता पार्टी, बीजेपी उनकी अपनी पार्टी राष्ट्रीय जनता पार्टी हो या फिर कांग्रेस, वाघेला ने हमेशा अपनी पार्टी और सांगठनिक ढांचे को दरकिनार कर फ़ैसले लिए है। आपातकाल के दौरान वाघेला ने गुजरात में जनता पार्टी का दामना थामा और उसका नेतृत्व किया था। उस दौरान उन्होंने इंदिरा हटाओ, देश बचाओ का नारा जमकर बुलंद किया था। जनसंघ और बीजेपी के प्रति उनकी प्रतिबद्धता पर सवाल नही खड़े किए जा सकते थे।
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अस्सी के दशक में जब बीजेपी का निर्माण हुआ तो वो गुजरात मे बीजेपी के संस्थापक सदस्यो मे एक थे। वो और नरेंद्र मोदी गुजरात के दूर-दराज इलाको मे मोटरसाइकिल से जाया करते थे। जब बीजेपी ने देश मे अपनी पहली दो सीटे पाई थी। तब उसमे से एक मेहसाणा की सीट थी और दूसरी सीट आंध्र प्रदेश की हनामकोंडा थी।
बीजेपी ने तब शंकर सिंह वाघेला को राज्यसभा की सदस्यता देकर उन्हें सम्मानित किया था। वाघेला को गुजरात में लोग बापु भी कहते हैं। वो गुजरात के अकेले ऐसे नेता हैं जिन्हें गुजरात के 18000 गांवों में कम से कम दस लोग जानते होंगे।
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इस शुक्रवार को शंकर सिंह वाघेला ने ख़ुद को कांग्रेस से अलग कर लिया। विधानसभा में विपक्ष के नेता के तौर पर वे 57 कांग्रेसी विधायकों का नेतृत्व कर चुके है। कोई निष्ठावान 'असली' कांग्रेसी नेता भी इससे इंकार नहीं कर सकता कि वाघेला गुजरात में उनके सबसे करिश्माई नेता थे जिनके पास बड जन समर्थन और पहचान थी।
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जनसंघ, राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ, जनता पार्टी, बीजेपी उनकी अपनी पार्टी राष्ट्रीय जनता पार्टी हो या फिर कांग्रेस, वाघेला ने हमेशा अपनी पार्टी और सांगठनिक ढांचे को दरकिनार कर फ़ैसले लिए है। आपातकाल के दौरान वाघेला ने गुजरात में जनता पार्टी का दामना थामा और उसका नेतृत्व किया था। उस दौरान उन्होंने इंदिरा हटाओ, देश बचाओ का नारा जमकर बुलंद किया था। जनसंघ और बीजेपी के प्रति उनकी प्रतिबद्धता पर सवाल नही खड़े किए जा सकते थे।
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अस्सी के दशक में जब बीजेपी का निर्माण हुआ तो वो गुजरात मे बीजेपी के संस्थापक सदस्यो मे एक थे। वो और नरेंद्र मोदी गुजरात के दूर-दराज इलाको मे मोटरसाइकिल से जाया करते थे। जब बीजेपी ने देश मे अपनी पहली दो सीटे पाई थी। तब उसमे से एक मेहसाणा की सीट थी और दूसरी सीट आंध्र प्रदेश की हनामकोंडा थी।
बीजेपी ने तब शंकर सिंह वाघेला को राज्यसभा की सदस्यता देकर उन्हें सम्मानित किया था। वाघेला को गुजरात में लोग बापु भी कहते हैं। वो गुजरात के अकेले ऐसे नेता हैं जिन्हें गुजरात के 18000 गांवों में कम से कम दस लोग जानते होंगे।
शंकर सिंह वाघेला
1995 से पहले उन्होंने बीजेपी के लिए गुजरात में जी-तोड़ मेहनत किया है। गुजरात भारत में पहला ऐसा राज्य बना जहां बीजेपी ने अपने दम पर सरकार बनाई। हालांकि जल्दी ही बीजेपी के थींक टैंक ने फ़ैसला लिया कि अगर कोई पटेल मुख्यमंत्री होता है, तो वो बीजेपी के लिए राजनीतिक रूप से ज्यादा फायदेमंद होगा।
इसकी वजह यह थी कि चुनाव में पटेलों ने बीजेपी का भरपूर साथ दिया था। नरेंद्र मोदी उस वक्त गुजरात बीजेपी के महासचिव थे और उन्हें भी लगा कि केशुभाई पटेल, शंकर सिंह वाघेला की तुलना में मुख्यमंत्री पद के लिए अधिक जिम्मेवार और फीट होंगे।
क्योंकि शंकर सिंह वाघेला अपनी महत्वकांक्षा और व्यक्तिवादिता के लिए जाने जाते थे। शंकर सिंह वाघेला के गुजरात के मुख्यमंत्री बनने का सपना टूट चुका था। छह महीने बाद जब केशुभाई पटेल अमरीका के आधिकारिक दौरे पर गए तब शंकर सिंह वाघेला ने सरकार को अस्थिर करने का प्रयास किया।
उन्होंने दावा किया कि 121 विधायकों में से 110 विधायक केशुभाई से नाखुश हैं। उन्होंने पहली बार भारतीय राजनीति में चार्टर प्लेन का इस्तेमाल कर अपने समर्थक विधायकों को ले जा कर खजुराहों के पांच सितारा होटल में ठहराया।
मुझे याद आता है, उस वक्त अटल बिहारी वाजपेयी और उस समय राजस्थान के मुख्यमंत्री रहे भैरो सिंह शेखावत गुजरात पहुंचे थे। शंकर सिंह वाघेला को समझाने के लिए। शंकर सिंह वाघेला की शर्त थी कि नरेंद्र मोदी को गुजरात से बाहर भेजा जाए और केशुभाई पटेल को हटाया जाए।
नरेंद्र मोदी उस वक्त गुजरात के इतने बड़े नेता नहीं हुए थे। उन्हें आराम से गुजरात से दूर रहने और राज्य के किसी भी मामले में दखल नहीं देने का हुक्म दे दिया गया। केशुभाई को हटाने की शर्त भी मान ली गई। सुरेश मेहता सर्वसम्मति से अक्टूबर 1995 को मुख्यमंत्री बनाया गया।
हालांकि शंकर सिंह वाघेला के कैंप और बीजेपी के साथ बने रहने वाले कैंप में खाई बरकरार रही। वाघेला ने अपने चिर-परिचित अंदाज़ में सुरेश मेहता की सरकार को एक साल तक का भी वक्त नहीं दिया। उन्होंने बीजेपी के ऊपर 1996 के लोकसभा में उनकी गोधरा सीट से हार का ठीकरा फोड़ दिया।
उन्होंने इसके बाद अपनी एक नई पार्टी राष्ट्रीय जनता पार्टी का गठन किया और कांग्रेस के साथ सांठगांठ कर गुजरात के मुख्यमंत्री बन गए। एक साल के अंदर ही कांग्रेस के साथ उनके मतभेद सामने आने शुरू हो गए।
इसकी वजह यह थी कि चुनाव में पटेलों ने बीजेपी का भरपूर साथ दिया था। नरेंद्र मोदी उस वक्त गुजरात बीजेपी के महासचिव थे और उन्हें भी लगा कि केशुभाई पटेल, शंकर सिंह वाघेला की तुलना में मुख्यमंत्री पद के लिए अधिक जिम्मेवार और फीट होंगे।
क्योंकि शंकर सिंह वाघेला अपनी महत्वकांक्षा और व्यक्तिवादिता के लिए जाने जाते थे। शंकर सिंह वाघेला के गुजरात के मुख्यमंत्री बनने का सपना टूट चुका था। छह महीने बाद जब केशुभाई पटेल अमरीका के आधिकारिक दौरे पर गए तब शंकर सिंह वाघेला ने सरकार को अस्थिर करने का प्रयास किया।
उन्होंने दावा किया कि 121 विधायकों में से 110 विधायक केशुभाई से नाखुश हैं। उन्होंने पहली बार भारतीय राजनीति में चार्टर प्लेन का इस्तेमाल कर अपने समर्थक विधायकों को ले जा कर खजुराहों के पांच सितारा होटल में ठहराया।
मुझे याद आता है, उस वक्त अटल बिहारी वाजपेयी और उस समय राजस्थान के मुख्यमंत्री रहे भैरो सिंह शेखावत गुजरात पहुंचे थे। शंकर सिंह वाघेला को समझाने के लिए। शंकर सिंह वाघेला की शर्त थी कि नरेंद्र मोदी को गुजरात से बाहर भेजा जाए और केशुभाई पटेल को हटाया जाए।
नरेंद्र मोदी उस वक्त गुजरात के इतने बड़े नेता नहीं हुए थे। उन्हें आराम से गुजरात से दूर रहने और राज्य के किसी भी मामले में दखल नहीं देने का हुक्म दे दिया गया। केशुभाई को हटाने की शर्त भी मान ली गई। सुरेश मेहता सर्वसम्मति से अक्टूबर 1995 को मुख्यमंत्री बनाया गया।
हालांकि शंकर सिंह वाघेला के कैंप और बीजेपी के साथ बने रहने वाले कैंप में खाई बरकरार रही। वाघेला ने अपने चिर-परिचित अंदाज़ में सुरेश मेहता की सरकार को एक साल तक का भी वक्त नहीं दिया। उन्होंने बीजेपी के ऊपर 1996 के लोकसभा में उनकी गोधरा सीट से हार का ठीकरा फोड़ दिया।
उन्होंने इसके बाद अपनी एक नई पार्टी राष्ट्रीय जनता पार्टी का गठन किया और कांग्रेस के साथ सांठगांठ कर गुजरात के मुख्यमंत्री बन गए। एक साल के अंदर ही कांग्रेस के साथ उनके मतभेद सामने आने शुरू हो गए।
शंकर सिंह वाघेला
इसके बाद उन्होंने अपने पुराने फॉर्मूले के तहत अपने ही विश्वासपात्र दिलीप पारिख को गुजरात का मुख्यमंत्री बनाया। 1998 के अगले विधानसभा चुनाव में बीजेपी, कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के बीच त्रिकोणीय मुकाबला था। बीजेपी ने केशुभाई पटेल के नेतृत्व में दोबारा से सत्ता में वापसी की।
राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी का कोई भविष्य नहीं देखते हुए और बीजेपी में वापस जगह पाने का कोई आसार ना देखते हुए उन्होंने 1999 में कांग्रेस में शामिल होने का फ़ैसला लिया। कांग्रेस ने वाघेला को जो कुछ दिया है अगर उस पर एक नज़र दौड़ाए तो यह काफी प्रभावकारी लगेगा। वाघेला को लोकसभा का टिकट मिला, वो दो बार केंद्रीय मंत्री बनें और उन्हें गुजरात में कांग्रेस की सबसे बड़ी ज़िम्मेवारी दी गई।
उनके रहते हुए कांग्रेस की गुजरात में भद्द पीट गई और कांग्रेस का सारा मुस्लिम समर्थन ख़त्म हो गया। मुसलमानों के लिए कांग्रेस के अंदर एक संघ के आदमी को पचाना मुश्किल था। आज भी कांग्रेस के साथ दो दशक पुराने रिश्ते के बाद उन्होंने वही किया जो वो करने में माहिर है।हो सकता है कि वाघेला पर अमित शाह और बीजेपी की ओर से सीबीआई और प्रवर्तन निदेशालय के मामलों का दबाव हो।
भ्रष्टाचार और मनी लांड्रिंग के ये मामले बीजेपी की राज्य सरकार ने उनके ऊपर केंद्रीय कपड़ा मंत्री रहने के दौरान के लगाए थे। ये भी हो सकता है कि वाघेला को यह लगा हो कि कांग्रेस राज्य में एक डूबता जहाज है और उससे नाता तोड़ने का यह सबसे अच्छा समय है।
उन्होंने पार्टी के ख़िलाफ़ कदम उठाते हुए राष्ट्रपति चुनाव में मीरा कुमार के विरोध में वोट डाला। गुजरात से बीजेपी के उम्मीदवार रामनाथ कोविंद के समर्थन में 11 क्रॉस वोटिंग हुए। वाघेला ने कांग्रेस से मोहभंग को लेकर कई बार अपनी स्थिति बदली है लेकिन एक बात पक्की है कि यह कांग्रेस के लिए ज़्यादा चिंता की बात है।
सभी पार्टियों से घूमफिर कर वाघेला हो सकता है कि राष्ट्रवादी कांग्रेस के साथ अब गठबंधन करे। यह गठबंधन आने वाले चुनाव मे बीजेपी से ज्यादा कांग्रेस के वोट बैंक में सेंध लगा सकता है।
राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी का कोई भविष्य नहीं देखते हुए और बीजेपी में वापस जगह पाने का कोई आसार ना देखते हुए उन्होंने 1999 में कांग्रेस में शामिल होने का फ़ैसला लिया। कांग्रेस ने वाघेला को जो कुछ दिया है अगर उस पर एक नज़र दौड़ाए तो यह काफी प्रभावकारी लगेगा। वाघेला को लोकसभा का टिकट मिला, वो दो बार केंद्रीय मंत्री बनें और उन्हें गुजरात में कांग्रेस की सबसे बड़ी ज़िम्मेवारी दी गई।
उनके रहते हुए कांग्रेस की गुजरात में भद्द पीट गई और कांग्रेस का सारा मुस्लिम समर्थन ख़त्म हो गया। मुसलमानों के लिए कांग्रेस के अंदर एक संघ के आदमी को पचाना मुश्किल था। आज भी कांग्रेस के साथ दो दशक पुराने रिश्ते के बाद उन्होंने वही किया जो वो करने में माहिर है।हो सकता है कि वाघेला पर अमित शाह और बीजेपी की ओर से सीबीआई और प्रवर्तन निदेशालय के मामलों का दबाव हो।
भ्रष्टाचार और मनी लांड्रिंग के ये मामले बीजेपी की राज्य सरकार ने उनके ऊपर केंद्रीय कपड़ा मंत्री रहने के दौरान के लगाए थे। ये भी हो सकता है कि वाघेला को यह लगा हो कि कांग्रेस राज्य में एक डूबता जहाज है और उससे नाता तोड़ने का यह सबसे अच्छा समय है।
उन्होंने पार्टी के ख़िलाफ़ कदम उठाते हुए राष्ट्रपति चुनाव में मीरा कुमार के विरोध में वोट डाला। गुजरात से बीजेपी के उम्मीदवार रामनाथ कोविंद के समर्थन में 11 क्रॉस वोटिंग हुए। वाघेला ने कांग्रेस से मोहभंग को लेकर कई बार अपनी स्थिति बदली है लेकिन एक बात पक्की है कि यह कांग्रेस के लिए ज़्यादा चिंता की बात है।
सभी पार्टियों से घूमफिर कर वाघेला हो सकता है कि राष्ट्रवादी कांग्रेस के साथ अब गठबंधन करे। यह गठबंधन आने वाले चुनाव मे बीजेपी से ज्यादा कांग्रेस के वोट बैंक में सेंध लगा सकता है।