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Hindi News ›   India News ›   Shabnam case : like Nirbhya rape case, legal options are still open, second mercy petition filed

शबनम को फांसी: निर्भया मामले की तरह कानूनी दांव-पेच अब भी बाकी, राष्ट्रपति को भेजी दूसरी दया याचिका

Sun, 21 Feb 2021 04:08 PM IST
सुरेंद्र जोशी आशीष तिवारी, अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली
आशीष तिवारी, अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली Published by: सुरेंद्र जोशी Updated Sun, 21 Feb 2021 04:08 PM IST
सार

शबनम मामले में राष्ट्रपति को दूसरी दया याचिका भेजी गई। अगर राष्ट्रपति इस दया याचिका को खारिज करते हैं तो इसे कोर्ट में चैलेंज किया जा सकता है। इसके अलावा कोर्ट के फैसले पर रिव्यू पिटिशन भी दाखिल की जा सकती है।
 

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Shabnam case : like Nirbhya rape case, legal options are still open, second mercy petition filed
शबनम - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

शबनम का केस निर्भया कांड की तरह बहुत पेचीदा तो नहीं है, लेकिन कानूनी दांव-पेच के मुताबिक शबनम की फांसी भी निर्भया के दोषियों की तरह आगे बढ़ती रहेगी। कानून के विशेषज्ञों का दावा है कि अभी शबनम के पास कुछ ऐसे कानूनी विकल्प खुले हुए हैं, जिनसे उसकी फांसी की तारीख आगे बढ़ सकती है। कानून के जानकारों का कहना है कि इन विकल्पों के आधार पर शबनम को कुछ दिन के लिए राहत तो मिल सकती है लेकिन फांसी तय है। 

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राष्ट्रपति के पास फिर दया याचिका दायर
शबनम ने एक बार फिर से राष्ट्रपति के पास दया याचिका दाखिल की है। ऐसे में अब इस मामले में भी डेथ वारंट की न सिर्फ तारीखें बढ़ेंगी, बल्कि शबनम की फांसी में देरी होगी। कानून के जानकार और तिहाड़ जेल के पूर्व लॉ ऑफिसर सुनील कुमार गुप्ता कहते हैं कि अभी शबनम के पास कई कानूनी विकल्प खुले हुए हैं। 
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तय नहीं हो सकती फांसी की तारीख
पहले विकल्प के तौर पर राष्ट्रपति को दया याचिका दाखिल करना था। जो शबनम की ओर से शनिवार को ही कर दी गई है। अब जब तक इस मामले में राष्ट्रपति की ओर से कोई फैसला नहीं आ जाता तब तक डेथ वारंट नहीं जारी नहीं किया जा सकता। यानी शबनम को फांसी पर चढ़ाने की कोई भी नई तारीख मुकर्रर नहीं हो सकती। सुनील गुप्ता के मुताबिक इसके बाद अगर राष्ट्रपति इस दया याचिका को खारिज कर देते हैं तो उसको कोर्ट में चैलेंज करने का रास्ता भी खुला है। कोर्ट में जाने पर फांसी की तारीख फिर तय नहीं हो सकती। 

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सारे तरीके अपनाएंगे वकील

इसके बाद भी एक और विकल्प शबनम के पास होगा। इस विकल्प के तौर पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले में रिव्यू पिटिशन भी दाखिल की जा सकती है। सुनील कहते हैं कि अगर इन कानूनी रास्तों को अख्तियार किया गया तब भी अगले कई महीनो का वक्त लग सकता है और शबनम को होने वाली फांसी टल सकती है। सुनील गुप्ता कहते हैं जिस तरीके से शबनम के वकीलों ने राज्यपाल और अब राष्ट्रपति के पास दया याचिका दाखिल की है। उससे इस बात का अंदाजा लगाया जा सकता है कि कानून के बचे हुए सभी रास्तों को शबनम और उसके वकील अपनाएंगे।

महीनों लग सकते हैं प्रक्रिया में
2014 में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है अगर राष्ट्रपति ने दया याचिका खारिज की है तो 14  दिन की मोहलत मिलना जरूरी है। इसके अलावा दया खारिज करने पर उसको चुनौती देने का अधिकार भी है। कानून के जानकार कहते हैं इस पूरी प्रक्रिया में कुछ महीनों का वक्त भी लग सकता है। 

इसलिए थोड़ा अलग है शबनम का केस

निर्भया के दोषियों को फांसी दिए जाने की प्रक्रिया और शबनम को फांसी पर लटकाए जाने की प्रक्रिया में कानूनी दांव-पेच का खेल एकदम अलग है। तिहाड़ जेल के पूर्व लॉ ऑफिसर सुनील गुप्ता कहते हैं दरअसल निर्भया के दोषियों की संख्या ज्यादा थी। इसलिए उनके पास कानूनी दांव पेचों से खेलना और उसके आधार पर राहत मिलने का अधिकार ज्यादा बार मिलता था। चार लोगों में से किसी भी एक का मामला अगर कोर्ट में या राष्ट्रपति के पास विचाराधीन होता था तो सभी लोगों को राहत मिल जाती थी। दिसंबर 2012 में निर्भया कांड हुआ था और उसके करीब आठ साल बाद मार्च 2020 में दोषियों को फांसी दी गई थी। हालांकि शबनम के मामले में ऐसा नहीं है। शबनम को एक बार जरूर कानूनी दांवपेच का फायदा फांसी को कुछ दिनों तक आगे बढ़वाने के तौर पर मिल सकता है।
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