{"_id":"579852a34f1c1b890221f338","slug":"sex-ratio-skewed-in-particular-age-group-in-gujarat","type":"story","status":"publish","title_hn":"यहां 10-19 साल के लड़कों की तुलना में लड़कियां हैं कम, खरीदी जा रही दुल्हन","category":{"title":"India News","title_hn":"भारत","slug":"india-news"}}
यहां 10-19 साल के लड़कों की तुलना में लड़कियां हैं कम, खरीदी जा रही दुल्हन
टीम डिजिटल/अमर उजाला, नई दिल्ली
Updated Wed, 27 Jul 2016 11:50 AM IST
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विकास के लिए चर्चा में रहने वाले गुजरात से चौंकाने वाली खबर आई है। 2011 की जनगणना के आधार पर 'स्पेशल टेबुलेशन ऑन एडोलसेंट एंड यूथ पॉपुलेशन' की रिपोर्ट के अनुसार, 10 से 19 साल की उम्र में लड़कों की तुलना में 8.45 लाख लड़कियां कम हैं। इस उम्र के लड़कों की संख्या जहां 64.30 लाख है, वहीं लड़कियों की संख्या 55.85 लाख है।
टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर के मुताबिक, वहां साल 2001 की जनगणना में 0 से 6 साल की उम्र के बच्चों में असंतुलित लिंग अनुपात का मामला सामने आया था। इसमें एक हजार लड़कों की तुलना में 883 लड़कियां थी। यह गुजरात की एक डरावनी सामाजिक सच्चाई जाहिर करती है, जिसमें लोग गर्भ में ही लड़कियों की हत्या कर रहे हैं। यह लैंगिक भेदभाव साल 1990 की शुरुआत से लगातार बढ़ रहा है।
इसका सीधा मतलब है कि जहां बाल लिंग अनुपात 2001 में 883 से बेहतर होकर 2011 में 890 हुआ, वहीं 10 से 19 की उम्र में एक हजार लड़कों की तुलना में मात्र 869 लड़कियां है। गुजरात का यह निराशाजनक लिंग अनुपात पंजाब, हरियाणा और बिहार के बाद देश में चौथे नंबर पर है।
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बच्चियों के लिए काम करने वाली समाजसेविका डॉ. अमर विश्वास ने कहा कि यह असंतुलित लिंग अनुपात जमीन पर परस्पर विरोधी दिखाई देते हैं। मेहसाना जैसे जिले में हर गांव में बहुत सारे लड़कों को दुल्हन नहीं मिल रही हैं। इससे उनकी फैमिली दूसरे राज्यों से दुल्हन और लड़की खरीदने पर मजबूर है।
समाजशास्त्री गौरांग जानी ने कहा कि यह डेटा समाज की सच्चाई को सामने ला रहा है। बालिका भेदभाव की समस्या 2001 के पहले की है। 2001 की जनगणना की असंतुलित लिंग अनुपात राज्य सरकार द्वारा चलाए जा रहे अभियान के साथ-साथ बेटी बचाओ अभियान की भी पोल खोल रही है। वहीं, प्रसव पूर्व निदान तकनीक (पीसीपीएनडीटी एक्ट) पर पुलिस कार्रवाई की भी तस्वीर साफ कर रही है। वहीं, इसमें दोषी पाए जाने वाले लोगों में सजा मिलने की दर भी कम है।
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टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर के मुताबिक, वहां साल 2001 की जनगणना में 0 से 6 साल की उम्र के बच्चों में असंतुलित लिंग अनुपात का मामला सामने आया था। इसमें एक हजार लड़कों की तुलना में 883 लड़कियां थी। यह गुजरात की एक डरावनी सामाजिक सच्चाई जाहिर करती है, जिसमें लोग गर्भ में ही लड़कियों की हत्या कर रहे हैं। यह लैंगिक भेदभाव साल 1990 की शुरुआत से लगातार बढ़ रहा है।
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इसका सीधा मतलब है कि जहां बाल लिंग अनुपात 2001 में 883 से बेहतर होकर 2011 में 890 हुआ, वहीं 10 से 19 की उम्र में एक हजार लड़कों की तुलना में मात्र 869 लड़कियां है। गुजरात का यह निराशाजनक लिंग अनुपात पंजाब, हरियाणा और बिहार के बाद देश में चौथे नंबर पर है।
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बच्चियों के लिए काम करने वाली समाजसेविका डॉ. अमर विश्वास ने कहा कि यह असंतुलित लिंग अनुपात जमीन पर परस्पर विरोधी दिखाई देते हैं। मेहसाना जैसे जिले में हर गांव में बहुत सारे लड़कों को दुल्हन नहीं मिल रही हैं। इससे उनकी फैमिली दूसरे राज्यों से दुल्हन और लड़की खरीदने पर मजबूर है।
समाजशास्त्री गौरांग जानी ने कहा कि यह डेटा समाज की सच्चाई को सामने ला रहा है। बालिका भेदभाव की समस्या 2001 के पहले की है। 2001 की जनगणना की असंतुलित लिंग अनुपात राज्य सरकार द्वारा चलाए जा रहे अभियान के साथ-साथ बेटी बचाओ अभियान की भी पोल खोल रही है। वहीं, प्रसव पूर्व निदान तकनीक (पीसीपीएनडीटी एक्ट) पर पुलिस कार्रवाई की भी तस्वीर साफ कर रही है। वहीं, इसमें दोषी पाए जाने वाले लोगों में सजा मिलने की दर भी कम है।