फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   India News ›   SC upholds twin bail conditions under PMLA, says money laundering heinous crime

Money Laundering: सुप्रीम कोर्ट ने जमानत के लिए दो कठोर शर्तों को बरकरार रखा, कहा- मनी लॉन्ड्रिग जघन्य अपराध

Wed, 27 Jul 2022 09:48 PM IST
Amit Mandal न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Amit Mandal Updated Wed, 27 Jul 2022 09:48 PM IST
सार

शीर्ष अदालत ने रेखांकित किया कि मनी लॉन्ड्रिंग में शामिल गतिविधि की हर प्रक्रिया (अवैध धन बनाना, जमा करना और छुपाना) पीएमएलए के तहत एक अपराध के रूप में माना जाएगा।  

विज्ञापन
SC upholds twin bail conditions under PMLA, says money laundering heinous crime
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को मनी लॉन्ड्रिंग रोकथाम अधिनियम, 2002 की संशोधित धारा 45 के तहत जमानत के लिए दो शर्तों को बरकरार रखा। अदालत ने कहा कि मनी लॉन्ड्रिंग एक जघन्य अपराध है, जो न केवल राष्ट्र के सामाजिक और आर्थिक ताने-बाने को प्रभावित करता है, बल्कि अन्य जघन्य अपराधों को बढ़ावा देता है। जस्टिस ए एम खानविलकर की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि दो शर्तें हालांकि आरोपी के जमानत देने के अधिकार को सीमित करती हैं, लेकिन पूरी रोक नहीं लगाती हैं। शीर्ष अदालत ने कहा कि प्रावधान, जैसा कि 2018 में संशोधन के बाद लागू है, उचित है और इसमें मनमानी या अनुचितता नहीं है। 

विज्ञापन


पीठ ने कहा, हम मानते हैं कि 2002 अधिनियम की धारा 45 के रूप में प्रावधान, 2018 के लागू होने के बाद संशोधन के रूप में उचित है। अदालत ने कहा कि वित्तीय प्रणालियों और देशों की संप्रभुता और अखंडता को प्रभावित करने सहित अंतरराष्ट्रीय परिणामों वाले मनी-लॉन्ड्रिंग के खतरे का मुकाबला करने के लिए 2002 के अधिनियम के उद्देश्यों के साथ सीधा संबंध है। बेंच में जस्टिस दिनेश माहेश्वरी और जस्टिस सीटी रविकुमार भी शामिल थे। 
विज्ञापन


आपराधिक गतिविधियों से देश की आर्थिक स्थिरता, संप्रभुता और अखंडता को खतरा
पीठ ने यह भी कहा कि अपराधों को मनी लॉन्ड्रिंग के अपराध के गठन के लिए प्रासंगिक मानने के लिए वर्गीकरण या समूहीकरण विधायी नीति का मामला है और अदालत इस पर दूसरा अनुमान नहीं लगा सकती। पीठ ने कहा, दरअसल कुछ अपराध संबंधित कानून के तहत गैर-संज्ञेय अपराध हो सकते हैं या छोटे और समझौता वाले अपराध के रूप में माने जा सकते हैं, फिर भी संसद ने अपने विवेक से मनी लॉन्ड्रिंग को लेकर संबंधित प्रक्रिया या गतिविधि के संचयी प्रभाव को माना है। इस तरह की आपराधिक गतिविधियों से देश की आर्थिक स्थिरता, संप्रभुता और अखंडता के लिए खतरा पैदा होने की आशंका है और इस प्रकार इसे मनी लॉन्ड्रिंग के अपराध के रूप में मानने के लिए एक साथ समूहित करना, विधायी नीति का विषय है। 
विज्ञापन
विज्ञापन


यह फैसला देते हुए कि कानून के तहत अपराध की आय की परिभाषा को एक विस्तृत दृष्टिकोण दिया जाना चाहिए, शीर्ष अदालत ने रेखांकित किया कि मनी लॉन्ड्रिंग में शामिल गतिविधि की हर प्रक्रिया (अवैध धन बनाना, संचय और छुपाना) पीएमएलए के तहत एक अपराध के रूप में माना जाएगा।  

कठोर दोहरी जमानत शर्तों को भी बरकरार रखा
सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी को जमानत देने के लिए कानून के तहत आवश्यक कठोर दोहरी जमानत शर्तों को भी बरकरार रखा है। जमानत याचिका के खिलाफ लोक अभियोजक को सुनने के लिए अदालत के लिए दो शर्तों की आवश्यकता होती है कि उसके पास यह मानने के लिए उचित आधार हो कि आरोपी अपराध का दोषी नहीं है और जमानत पर रहने के दौरान उसके द्वारा कोई अपराध करने की आशंका नहीं है।

सुप्रीम फैसले ने पीएमएलए पर सभी संदेह किए दूर : रिजिजू
केंद्रीय कानून मंत्री किरेन रिजिजू ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने पीएमएलए को लेकर कुछ ‘पक्षों’ द्वारा उठाए गए सभी संदेहों को दूर कर दिया है। साथ ही इससे यह भी स्पष्ट हो गया कि एजेंसियां ऐसा कुछ भी नहीं करती हैं जो गैरकानूनी और सांविधानिक हो। जांच एजेंसियों द्वारा की गई कार्रवाई भ्रष्टाचार को रोकने और भ्रष्टाचारियों को दंडित करने के सरकार के इरादे की भावना के तहत है। इस तरह किसी भी मामले को तय करने में सरकार की कोई भूमिका नहीं होती है और हर मामला मेरिट के आधार पर तय किया जाता है। 


विधि आयोग से जुड़ी याचिका पर सुनवाई को तैयार कोर्ट  
वहीं, सुप्रीम कोर्ट बुधवार को वर्ष 2020 की उस जनहित याचिका पर सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने के लिए सहमत हो गया, जिसमें केंद्र को विधि आयोग को ‘वैधानिक निकाय’ घोषित करने और आयोग में अध्यक्ष और सदस्यों को नियुक्त करने का निर्देश देने की मांग की गई थी। सीजेआई एनवी रमन की अध्यक्षता वाली पीठ ने आयोग में रिक्तियों के संबंध में याचिकाकर्ता अश्विनी उपाध्याय की दलीलों को सुनने के बाद याचिका को सूचीबद्ध करने का निर्णय लिया। याचिकाकर्ता ने कहा कि 21वें विधि आयोग का कार्यकाल 31 अगस्त, 2018 को समाप्त हो गया, फिर भी केंद्र ने न तो अध्यक्ष व सदस्यों का कार्यकाल बढ़ाया और न ही 22वें विधि आयोग को अधिसूचित किया है। उपाध्याय ने कहा कि इस मामले में पहले नोटिस किया जा चुका है।

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News apps, iOS Hindi News apps और Amarujala Hindi News apps अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed