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एससी-एसटी कानून में संशोधन बिल इसी हफ्ते लाएगी सरकार, कानून का मूल स्वरूप रहेगा कायम

Thu, 02 Aug 2018 03:55 AM IST
ब्यूरो, अमर उजाला, नई दिल्ली
ब्यूरो, अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Thu, 02 Aug 2018 03:55 AM IST
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SC/ST Act: Modi Cabinet approves bringing amendment
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : PTI

एससी-एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम को अपने पुराने और मूल स्वरूप में फिर से लागू करने के लिए केंद्र सरकार संसद के इसी सत्र में संशोधन बिल पेश करेगी। केंद्रीय मंत्रिमंडल ने बुधवार कों इस कानून में संशोधन के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी।

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सुप्रीम कोर्ट ने इसी साल 20 मार्च के अपने फैसले में इस कानून के प्रावधानों में कई बदलाव करते हुए ऐसे मामले में आरोपियों की तत्काल गिरफ्तारी पर रोक लगा दी थी। इस मुद्दे पर जहां कई दलित संगठनों ने 9 अगस्त को भारत बंद का आह्वान किया था, कई सहयोगी दलों के साथ-साथ भाजपा के भी एससी-एसटी सांसद सरकार से खासे नाराज थे। 
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संशोधन बिल संसद में इसी हफ्ते पेश किया जाएगा। बिल में उन सभी पुराने प्रावधानों को शामिल किया जाएगा, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में हटा दिया था। गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस एके गोयल ने अपने 20 मार्च के फैसले में इस कानून के तहत दायर मुकदमे में तत्काल गिरफ्तारी पर रोक लगा दी थी।
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इस कानून के व्यापक दुरुपयोग का हवाला देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने नई व्यवस्था में कहा था कि इस कानून के तहत एफआईआर के बाद भी गिरफ्तारी जरूरी नहीं है। एफआईआर दर्ज करने से पहले एक हफ्ते के अंदर आरोपों की जांच होगी। इसके बाद संबंधित जिले के एसएसपी या डीएसपी की अनुमति से ही एफआईआर दर्ज किया जा सकेगा।

इस फैसले में यह भी कहा गया था कि अगर आरोपी सरकारी कर्मचारी है तो उसे गिरफ्तार करने केलिए पुलिस को पहले उसे नियुक्त करने वाली अथॉरिटी से इजाजत लेनी होगी। 

इस कारण और बढ़ा विवाद 

SC/ST Act: Modi Cabinet approves bringing amendment

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद 2 अप्रैल को दलित संगठनों के भारत बंद के दौरान हिंसक झड़पें हुई। इसमें 12 लोगों की मौत हुई। विवाद तब बढ़ा जब इस आशय का फैसला देने वाले सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस गोयल को एनजीटी का अध्यक्ष बना दिया गया। जबकि सरकार वादे के मुताबिक कानून में बदलाव पर रोक लगाने के लिए अध्यादेश भी जारी नहीं कर पाई। इसके बाद दलित संगठनों ने एक बार फिर से 9 अगस्त को भारत बंद का आह्वान किया।
 
चौतरफा दबाव में थी सरकार 

इस मुद्दे पर सरकार चौतरफा दबाव में थी। दलित संगठनों की नारजागी के कारण सरकार को इस वर्ग में अपनी छवि खराब होने का भय था। इसी बीच सरकार के तीन सहयोगी दलों लोजपा, आरपीआई और रालोसपा के मोर्चा खोले, भाजपा सांसदों की ओर से मुखर विरोध जताने के बाद के बाद सरकार रक्षात्मक मुद्दे पर आ गई। दो दिन पूर्व इन तीनों दलों के 9 अगस्त को प्रदर्शन में शामिल होने की घोषणा के बाद विदेश से लौटते ही खुद पीएम ने मोर्चा संभाला। अंतत: मंगलवार को सहयोगी दलों की मांगों के अनुरूप एससी-एसटी एक्ट मामले में संशोधन बिल लाने पर सहमति हुई।  

दो तिहाई बहुमत की होगी जरूरत
 
चूंकि संशोधन बिल संविधान संशोधन बिल होगा। ऐसे में इसकेलिए सरकार को दोनों सदनों में दो तिहाई सदस्यों के समर्थन की जरूरत पड़ेगी। चूंकि इस मामले में सभी दलों की राय एक है। ऐसे में सरकार को इसी सत्र में बिल पारित करा कर इसे कानूनी जामा पहनाने में समस्या नहीं आएगी। 

क्या है एससी-एसटी अधिनियम

अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लोगों पर होने वाले अत्याचार और उनके साथ होने वाले भेदभाव को रोकने के मकसद से अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार रोकथाम) अधिनियम, 1989 बनाया गया था। जम्मू-कश्मीर को छोड़कर पूरे देश में इस एक्ट को लागू किया गया था।

इसके तहत इन लोगों को समाज में एक समान दर्जा दिलाने के लिए कई प्रावधान किए गए और इनकी हरसंभव मदद के लिए जरूरी उपाय किए गए। इन पर होने वाले अपराधों की सुनवाई के लिए विशेष व्यवस्था की गई ताकि ये अपनी बात खुलकर रख सकें।

क्या बनाया गया था यह कानून

1955 के प्रोटेक्शन ऑफ सिविल राइट्स एक्ट के बावजूद वर्षों तक न तो छुआछूत का अंत हुआ और न ही दलितों पर अत्याचार रुके। यह एक तरह से एससी और एसटी के साथ भारतीय राष्ट्र द्वारा किए गए समानता और स्वतंत्रता के वादे का उल्लंघन माना गया। देश की चौथाई आबादी इन समुदायों से बनती है और आजादी के लिए तीन दशक बाद भी उनकी आर्थिक और सामाजिक स्थिति तमाम मानकों पर बेहद खराब थी।

ऐसे में इस खामी को दूर करने और इन समुदायों को अन्य समुदायों के अत्याचारों से बचाने के मकसद से इस कानून को लाया गया। इस समुदाय के लोगों को अत्याचार और भेदभाव से बचाने के लिए इस एक्ट में कई तरह के प्रावधान किए गए थे।

क्या हैं इस कानून के प्रावधान

एससी-एसटी एक्ट 1989 में ये व्यवस्था की गई कि अत्याचार से पीड़ित लोगों को पर्याप्त सुविधाएं और कानूनी मदद दी जाए, जिससे उन्हें न्याय मिले। इसके साथ ही अत्याचार के पीड़ितों के आर्थिक और सामाजिक पुनर्वास की व्यवस्था की जाए।

इस एक्ट के तहत मामलों में जांच और सुनवाई के दौरान पीड़ितों और गवाहों की यात्रा और जरूरतों का खर्च सरकार की तरफ से उठाया जाए। प्रोसिक्यूशन की प्रक्रिया शुरू करने और उसकी निगरानी करने के लिए अधिकारी नियुक्त किए जाएं और इन उपायों के अमल के लिए राज्य सरकार जैसा उचित समझेगी, उस स्तर पर समितियां बनाई जाएं। उन क्षेत्रों का पता लगाना जहां एससी और एसटी पर अत्याचार हो सकते हैं और उसे रोकने के उपाय करने के प्रावधान किए गए।

सुप्रीम कोर्ट का फैसला 

सुप्रीम कोर्ट ने अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति अत्याचार रोकथाम अधिनियम,1989  के तहत स्वत: गिरफ्तारी और आपराधिक मामला दर्ज किये जाने पर हाल में रोक लगा दी थी। यह कानून भेदभाव और अत्याचार के खिलाफ हाशिये पर रहने वाले समुदायों की रक्षा करता है। 

सुप्रीम कोर्ट के दो जजों की बेंच ने इस मामले पर फैसला सुनाते हुए कहा था कि इस कानून का दुरुपयोग किया जाता है। हालांकि उन्होंने ये बात बिना किसी आंकड़े के कही है। बिना कोई आंकड़ा पेश किए ही इस कानून के दुरुपयोग की बात कही गई। हालांकि किसी भी कानून का दुरुपयोग हो सकता है।

ये जांच एजेंसियों और न्यायपालिका के उपर है कि किसी कानून का दुरुपयोग न हो। कोर्ट सुप्रीम कोर्ट का इस मामले में 2015 के आंकड़ों को हवाले से कहा है कि 15 से 16 फीसदी मामलों में पुलिस क्लोजर रिपोर्ट दाखिल कर देती और 75 फीसदी मामलों में अभियुक्त छूट जाते हैं। 

लेकिन इन आंकड़ों से ये नहीं कहा जा सकता कि कानून ठीक तरीके से नहीं लागू नहीं किया गया या इसपर अमल नहीं किया गया। भारत में इस वक्त जिस तरह की सामाजिक स्थितियां है उसमें ऐसा होना बिल्कुल लाजमी है। क्योंकि संस्थाओं में उच्च पदों पर दलितों और आदिवासियों न के बराबर है। ऐसे में उनके लिए न्याय पाना आसान नहीं है।
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