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सुप्रीम कोर्ट ने कहा: सार्वजनिक सेवा के लिए अभिशाप है पिछले दरवाजे से प्रवेश, एलआईसी नियत प्रक्रिया के बिना अस्थायी श्रमिकों को स्थायी नहीं कर सकता

Wed, 27 Apr 2022 09:30 PM IST
अभिषेक दीक्षित न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: अभिषेक दीक्षित Updated Wed, 27 Apr 2022 09:30 PM IST
सार

अदालत ने उन कामगारों के दावों के नए सिरे से सत्यापन का निर्देश दिया जो 20 मई 1985 और 4 मार्च 1991 के बीच तीन साल की अवधि में चतुर्थ श्रेणी के पदों पर कम से कम 70 दिनों के लिए या दो वर्षों की अवधि में तृतीय श्रेणी के पदों पर 85 दिनों के लिए कार्यरत रहे हों।

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SC says LIC bound by Constitution directs fresh verification of claims of temporary workers
सुप्रीम कोर्ट (फाइल) - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को कहा कि भारतीय जीवन बीमा निगम (एलआईसी) जैसे सार्वजनिक नियोक्ता को भर्ती प्रक्रिया का पालन किए बिना 11000 से अधिक अस्थायी कामगारों (श्रमिकों) को सामूहिक रूप से स्थायी करने के लिए निर्देशित नहीं किया जा सकता है। जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस विक्रम नाथ की पीठ ने कहा है, इस तरह का समावेशन पिछले दरवाजे से प्रवेश प्रदान करना होगा जो सार्वजनिक रोजगार में समान अवसर और निष्पक्षता के सिद्धांत को नकारता है। सेवा में पिछले दरवाजे से प्रवेश की अनुमति देना सार्वजनिक सेवा के लिए अभिशाप है।

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शीर्ष अदालत ने कहा कि एलआईसी एक वैधानिक निगम है। ऐसे में एलआईसी संविधान के अनुच्छेद- 14 (समानता) और 16 (कोई भेदभाव नहीं) को मानने के लिए बाध्य है। शीर्ष अदालत ने कहा है कि एक सार्वजनिक नियोक्ता होने के नाते एलआईसी की भर्ती प्रक्रिया को निष्पक्ष और खुली प्रक्रिया के सांविधानिक मानक को पूरा करना चाहिए। एलआईसी के अंशकालिक (पार्ट टाइम) कर्मचारियों से संबंधित लगभग चार दशक पुराने विवाद को निपटाते हुए पीठ ने कहा कि सत्यापन के बाद कामगारों के दावे पात्रता की शर्तों में नियमानुकूल पाए जाते हैं तो उन्हें समावेशन के एवज में नकद मुआवजे के जरिये सभी दावों और मांगों का पूर्ण और अंतिम निपटान किया जाए।
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जजों की समिति बनाई
संविधान के अनुच्छेद-142 के तहत अपनी शक्ति का प्रयोग करते हुए पीठ ने सत्यापन के कार्य के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस पीकेएस बघेल की एक समिति नियुक्त की है और पूर्व जिला जज राजीव शर्मा और यूपी उच्च न्यायिक सेवा के सदस्य की एक समिति का गठन किया है।
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इनके दावों का होगा सत्यापन
अदालत ने उन कामगारों के दावों के नए सिरे से सत्यापन का निर्देश दिया जो 20 मई 1985 और 4 मार्च 1991 के बीच तीन साल की अवधि में चतुर्थ श्रेणी के पदों पर कम से कम 70 दिनों के लिए या दो वर्षों की अवधि में तृतीय श्रेणी के पदों पर 85 दिनों के लिए कार्यरत रहे हों। शीर्ष अदालत ने कहा है कि सभी व्यक्ति, जो मानदंड पर खरे होंगे उन्हें, हर वर्ष की सेवा के लिए 50000 रुपये की दर से मुआवजा दिया जाएगा।

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