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Supreme Court: 'धरना देना अभिव्यक्ति की आजादी..', सुप्रीम कोर्ट ने रद्द की आचार संहिता के दौरान दर्ज एफआईआर

Thu, 31 Jul 2025 07:45 PM IST
निर्मल कांत न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली।
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली। Published by: निर्मल कांत Updated Thu, 31 Jul 2025 07:45 PM IST
सार

Supreme Court: सुप्रीम कोर्ट ने 2019 में आंध्र प्रदेश में धरना देने पर दर्ज की प्राथमिकी को रद्द किया और कहा कि अपीलकर्ताओं ने अभिव्यक्ति की आजादी के अधिकार का उपयोग किया है। कोर्ट ने माना कि इस धरने से न ही चुनाव प्रक्रिया में कोई दखल हुआ और न ही कोई आपराधिक कृत्य सामने आया। 
 

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SC quashes FIR for 'dharna' in Andhra Pradesh when Model Code of Conduct was in force
सुप्रीम कोर्ट (फाइल) - फोटो : एएनआई (फाइल)

विस्तार

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को मार्च 2019 में आंध्र प्रदेश में आयोजित एक धरने को लेकर दर्ज की गई प्राथमिकी को रद्द कर दिया। शीर्ष कोर्ट ने कहा कि धरना देने वाले लोग अपने अभिव्यक्ति की आजादी और शांतिपूर्ण तरीके से एकत्र होने के अधिकार का उपयोग कर रहे थे।
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जस्टिस बी. वी. नागरत्ना और जस्टिस के. वी. विश्वनाथन की पीठ ने बताया कि यह प्राथमिकी उस समय दर्ज की गई थी, जब राज्य में लोकसभा और विधानसभा चुनावों के लिए आदर्श आचार संहिता लागू थी। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला अभिनेता और शिक्षाविद् मांचू मोहन बाबू और उनके बेटे मांचू विष्णु वर्धन बाबू की अपीलों पर आया है। उन्होंने आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के उस फैसले को चुनौती दी थी, जिसमें उनके खिलाफ आपराधिक कार्यवाही रद्द करने से इनकार कर दिया गया था।
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पीठ ने कहा कि प्राथमिकी और आरोपपत्र में ऐसा कोई साक्ष्य नहीं है, जिससे यह साबित हो सके कि चुनावों पर किसी तरह का गलत प्रभाव डाला गया या स्वतंत्र मतदान प्रक्रिया में कोई दखल दिया गया। शीर्ष कोर्ट ने कहा, अगर राज्य के पक्ष को पूरी तरह मान भी लिया जाए, तो भी यह नहीं कहा जा सकता कि याचिकाकर्ताओं ने धरना या रैली के दौरान किसी अपराध को अंजाम दिया या सड़कों पर ऐसी बाधा पैदा की, जिससे आरोप सही साबित हों। 

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता सिर्फ अपने अभिव्यक्ति की आजादी और शांतिपूर्वक तरीके से एकत्र होने के अधिकार का प्रयोग कर रहे थे। ऐसे में उनके खिलाफ मुकदमा चलाने का कोई औचित्य नहीं है। कोर्ट ने यह भी कहा कि प्राथमिकी और आरोपपत्र में ऐसा कुछ नहीं है जिससे यह लगे कि उन्होंने ऐसा कोई गैरकानूनी कार्य किया जिससे सार्वजनिक रूप से किसी को नुकसान, खतरा, असुविधा या अधिकारों में बाधा पहुंची हो।

मांचू मोहन बाबू श्री विद्यानीकेतन के शिक्षण संस्थानों के अध्यक्ष हैं और मांचू विष्णु वर्धन बाबू उनके बेटे हैं। कोर्ट ने बताया कि राज्य में आम चुनाव और विधानसभा चुनाव 11 अप्रैल 2019 को तय थे और 10 मार्च से ही आदर्श आचार संहिता लागू हो गई थी। इस दौरान बिना अनुमति के किसी भी सार्वजनिक सभा, धरने, रैली या रोड शो पर प्रतिबंध था।


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राज्य सरकार के अनुसार, 22 मार्च 2019 को याचिकाकर्ताओं ने कुछ स्टाफ और छात्रों के साथ तिरुपति-मदनपल्ली सड़क पर एक रैली निकाली और उस समय की आंध्र प्रदेश सरकार के खिलाफ नारे लगाए। आरोप यह था कि सरकार छात्रों की फीस की प्रतिपूर्ति (नुकसान की भरपाई) नहीं कर रही थी। यह भी कहा गया कि इससे यातायात बाधित हुआ, लोगों को असुविधा हुई और यात्रियों की सुरक्षा को खतरा पहुंचा। इस घटना को लेकर प्राथमिकी दर्ज की गई थी और आरोपपत्र दाखिल किया गया था।  

इसके खिलाफ याचिकाकर्ताओं ने हाईकोर्ट में अपील की, लेकिन जनवरी में उनकी याचिका खारिज कर दी गई। इसके बाद उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। सुप्रीम कोर्ट ने उनकी अपील स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट का फैसला रद्द कर दिया और कहा कि याचिकाकर्ताओं के खिलाफ लगाए गए किसी भी आरोप की पुष्टि नहीं होती।

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