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समलैंगिकता को अपराध श्रेणी से बाहर रखने की याचिका पर SC ने केंद्र को जारी किया नोटिस
अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली
Updated Tue, 24 Apr 2018 01:02 AM IST
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समलैंगिक संबंध (प्रतीकात्मक तस्वीर)
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आपसी सहमति से दो समलैंगिक वयस्कों के बीच यौन संबंध को अपराध की श्रेणी से बाहर करने की गुहार वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया है। याचिका होटल व्यवसायी केशव सूरी की ओर से दायर की गई है।
चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी करते हुए एक हफ्ते में जवाब दाखिल करने के लिए कहा है। साथ ही पीठ ने कहा है कि इस याचिका पर सुनवाई भी इस संबंध में दाखिल अन्य याचिकाओं के साथ संविधान पीठ के समक्ष होगी।
एलजीबीटी समुदाय से ताल्लुक रखने वाले सूरी ने अपनी याचिका में कहा है कि उन्हें हमेशा इस बात का डर रहता है कि उनके खिलाफ झूठा मुकदमा न चलाया जाए। वह इस डर के साये में जी रहे हैं। वह सम्मान के साथ जीने से महरूम हैं।
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याचिका में उन्होंने कहा है कि वयस्क समलैंगिक पार्टनर के साथ यौन संबंध बनाने की इजाजत मिलनी चाहिए। उन्होंने संविधान के अनुच्छेद-377 को निरस्त करने की गुहार की है। याचिका में कहा गया कि केंद्र को निर्देश दिया जाए कि वह सहमति से यौन संबंध स्थापित करने वाले वयस्क समलैंगिकों के खिलाफ कार्रवाई न करे।
मालूम हो कि नाज फाउंडेशन सहित अन्य ने पहले ही समलैंगिकता को अपराध के दायरे से मुक्त करने को लेकर सुधारात्मक याचिकाएं दायर की है। सनद रहे कि वर्ष 2009 में दिल्ली हाईकोर्ट ने समलैंगिकता को अपराध के दायरे से मुक्त कर दिया था। लेकिन बाद में सुप्रीम कोर्ट ने इसे दोबारा अपराध के दायरे में ला दिया था। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका भी दायर की गई, जो खारिज हो चुकी है।
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चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी करते हुए एक हफ्ते में जवाब दाखिल करने के लिए कहा है। साथ ही पीठ ने कहा है कि इस याचिका पर सुनवाई भी इस संबंध में दाखिल अन्य याचिकाओं के साथ संविधान पीठ के समक्ष होगी।
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एलजीबीटी समुदाय से ताल्लुक रखने वाले सूरी ने अपनी याचिका में कहा है कि उन्हें हमेशा इस बात का डर रहता है कि उनके खिलाफ झूठा मुकदमा न चलाया जाए। वह इस डर के साये में जी रहे हैं। वह सम्मान के साथ जीने से महरूम हैं।
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याचिका में उन्होंने कहा है कि वयस्क समलैंगिक पार्टनर के साथ यौन संबंध बनाने की इजाजत मिलनी चाहिए। उन्होंने संविधान के अनुच्छेद-377 को निरस्त करने की गुहार की है। याचिका में कहा गया कि केंद्र को निर्देश दिया जाए कि वह सहमति से यौन संबंध स्थापित करने वाले वयस्क समलैंगिकों के खिलाफ कार्रवाई न करे।
मालूम हो कि नाज फाउंडेशन सहित अन्य ने पहले ही समलैंगिकता को अपराध के दायरे से मुक्त करने को लेकर सुधारात्मक याचिकाएं दायर की है। सनद रहे कि वर्ष 2009 में दिल्ली हाईकोर्ट ने समलैंगिकता को अपराध के दायरे से मुक्त कर दिया था। लेकिन बाद में सुप्रीम कोर्ट ने इसे दोबारा अपराध के दायरे में ला दिया था। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका भी दायर की गई, जो खारिज हो चुकी है।