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Supreme Court: वकीलों को 'एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड' के रूप में नामित करने की प्रथा को चुनौती, याचिका खारिज
Wed, 16 Nov 2022 07:15 PM IST
Amit Mandal
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: Amit Mandal
Updated Wed, 16 Nov 2022 07:15 PM IST
सार
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता वकील नंदिनी शर्मा के पास किसी विशेष एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड के खिलाफ शिकायत है, तो वह एडवोकेट्स एक्ट, 1961 के तहत अपने उपायों का पालन कर सकती है।
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सुप्रीम कोर्ट
- फोटो : Social Media
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विस्तार
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें 2013 के सुप्रीम कोर्ट के नियमों के तहत वकीलों को 'एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड' के रूप में नामित करने की प्रथा को चुनौती दी गई थी। इसमें दावा किया गया था कि यह वकीलों का एक विशेष वर्ग बनाता है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा संविधान के अनुच्छेद 145 के तहत बनाए गए नियमों के अनुसार, केवल एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड के रूप में नामित अधिवक्ता ही शीर्ष अदालत में एक पक्ष के लिए पैरवी कर सकते हैं।
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जस्टिस के एम जोसेफ और जस्टिस ऋषिकेश रॉय की पीठ ने लिली थॉमस के मामले में 1964 की एक संविधान पीठ के फैसले का जिक्र करते हुए कहा कि इसमें कोई संदेह नहीं है कि शीर्ष अदालत के पास अधिवक्ताओं के एक विशेष वर्ग को 'एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड' के रूप में नामित करने और उन्हें इसके समक्ष पैरवी करने के लिए विशेष विशेषाधिकार प्रदान करने की शक्ति है। इसमें कहा गया है कि अगर याचिकाकर्ता वकील नंदिनी शर्मा के पास किसी विशेष एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड के खिलाफ शिकायत है, तो वह एडवोकेट्स एक्ट, 1961 के तहत अपने उपायों का पालन कर सकती है।
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नंदिनी शर्मा ने व्यक्तिगत रूप से याचिकाकर्ता के रूप में मामले पर बहस की। उन्होंने कहा कि नियम अनुचित और अव्यावहारिक हैं और अधिवक्ताओं की एक अलग श्रेणी बनाते हैं और उन्हें ऐसे सभी काम करने की अनुमति दी जानी चाहिए, जो अब केवल एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड को ही करने की अनुमति दी जा रही है। उसने तर्क दिया है कि एडवोकेट्स-ऑन-रिकॉर्ड पर विशेष अधिकार प्रदान करने की प्रथा एडवोकेट्स एक्ट, 1961 के प्रावधानों का उल्लंघन है और वकीलों के वर्गीकरण पर पटना उच्च न्यायालय के फैसले का हवाला दिया।
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