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Samwad 2026: मणिपुर में क्यों होता है संघर्ष? रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल राणा प्रताप ने बताई इसके पीछे की वजह
Wed, 24 Jun 2026 05:13 PM IST
Rahul Kumar
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली।
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली।
Published by: Rahul Kumar
Updated Wed, 24 Jun 2026 05:13 PM IST
सार
अमर उजाला संवाद उत्तराखंड 2026 में सेवानिवृत्त लेफ्टिनेंट जनरल राणा प्रताप कलिता ने मणिपुर की हिंसा पर चर्चा की। उन्होंने कहा कि राज्य की 53 फीसदी मैतेई आबादी सिर्फ 10 फीसदी क्षेत्र में रहती है, जबकि शेष भूमि पर कुकी और नागा समुदाय बसे हैं। जमीन पर बढ़ता दबाव संघर्ष की बड़ी वजह है।
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सेवानिवृत लेफ्टिनेंट जनरल राणा प्रताप कलिता
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
विस्तार
अमर उजाला देहरादून ने बुधवार को 'अमर उजाला संवाद उत्तराखंड 2026' का आयोजन किया। कार्यक्रम में सेवानिवृत लेफ्टिनेंट जनरल राणा प्रताप कलिता शामिल हुए। इस दौरान उन्होंने देश की सुरक्षा और आंतरिक चुनौतियों पर खुलकर बात की। रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल ने इस दौरान मणिपुर में बार-बार भड़कने वाली हिंसा के पीछे की असली वजह सामने रखी। उन्होंने कहा, उत्तर पूर्व का सबसे जटिल राज्य मणिपुर है। मणिपुर की 53 फीसदी आबादी मैतेई है, जो वहां के 10 फीसदी तराई इलाके में रहती है। बाकी 90 फीसदी जमीन पर कुकी और नागा आबादी रहती है। जमीन के ऊपर दबाव वहां की समस्या का एक बड़ा कारण है।
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संघर्ष की पहली वजह- जनसंख्या
संवाद के मंच पर सेवानिवृत लेफ्टिनेंट जनरल राणा प्रताप कलिता ने कहा कि पूर्वोत्तर में सबसे कठिन राज्य मणिपुर है। यहां तीन समुदाय रहते हैं। पहला समुदाय मैतेई, जो 53 फीसदी है और इंफाल घाटी में रहते हैं। नगा समुदाय की जनसंख्या 20 फीसदी है, वो पहाड़ी के ऊपर रहते हैं। तीसरा कुकी समुदाय है जो घाटी और पहाड़ के बीच वाले इलाके में रहते हैं। ये 2011 के जनसंख्या गणना के हिसाब से 16 फीसदी हैं। मणिपुर में कुकी-नगा अनुसूचित जनजाति समुदाय है, जबकि मैतेई सामान्य जाति है। मैतेई मणिपुर के 10 फीसदी इलाके में रहते हैं। बाकी की 46 फीसदी नगा और कुकी का कब्जा मणिपुर की 90 फीसदी जमीन पर है।
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दूसरी वजह- जमीन
इसके अलावा नगा और कुकी समुदाय के लोग इंफाल घाटी में जमीन खरीद सकते हैं और रह सकते हैं, जबकि मैतेई पहाड़ों में जमीन नहीं खरीद सकते हैं। विवाद की एक वजह ये भी है। नगा और कुकी समुदाय को मिला आरक्षण है, जबकि मैतेई समुदाय को आरक्षण नहीं मिला है. उन्होंने कहा कि बेरोजगारी हमारे देश में एक बड़ा मुद्दा है, जमीन की कमी और रोजगार की उपलब्धता बड़ा मुद्दा है।
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तीसरी वजह- विधानसभा में प्रतिनिधित्व
तीसरा मुद्दा राजनीति में उनका प्रतिनिधित्व है। राज्य की विधानसभा में कुल विधायकों की संख्या 60 है। उसमें 40 विधायक इंफाल घाटी से हैं, जहां मैतेई जनसंख्या बड़ी तादात में है। इसके बाद 10 विधायक नगा समुदाय का प्रतिनिधित्व करते हैं और 10 विधायक कुकी समुदाय का प्रतिनिधित्व करते हैं। सरकार में इस वजह से दखल मैतेई समुदाय का है। इसके अलावा पहाड़ के लोगों और मैदान के लोगों के बीच विकास कार्यों में भी अंतर दिखाई पड़ता है।
उरी हमला,सर्जिकल स्ट्राइक और कश्मीर पर चर्चा
वहीं कश्मीर के मुद्दे पर बात करते हुए उन्होंने कहा- मैं खुद को भाग्यशाली समझता हूं कि मुझे कश्मीर में काफी साल सेवा करने का मौका मिला। मेरे 40 साल के सेवा के दौरान मैंने 11 साल अलग-अलग रैंक में बिताए, मेजर से लेकर मेजर जनरल तक सेवारत था। उरी की सर्जिकल स्ट्राइक मुझे अभी याद है, तब मैं ब्रिगेडियर के रैंक पर था और श्रीनगर के हेडक्वार्टर में सेवारत था, जब 16 अक्तूबर जब आतंकी हमला हुआ, तो वहां पर हमारे जो जवान बलिदान हुए थे, तो उस समय जो कोर कमांडर से जनरल दुआ, वो और मैं तुरंत हेलीकॉप्टर से उरी गए थे और बाद में कई शीर्ष अधिकारी भी मौके पर पहुंचे। तो हम लोगों ने घटना का जायजा लिया और उस समय सबके मन में यही था कि इसे हम भुलाएंगे नहीं और बदला जरूर लेंगे. हमने सोच लिया था कि कुछ ऐसे किया जाएगा, जिससे उग्रवादियों के संगठन की कमर टूट जाए। इसके पहले ही सेना की तरफ से अलग-अलग हालातों के लिए कुछ तैयारियां की जाती हैं और इस घटना के बाद इसे और तेजी से किया गया। फिर तकरीबन 12 या 13 दिन के बाद ही सर्जिकल स्ट्राइक किया गया। मैं यही कहना चाहूंगा, मेरा रोल बीजीएस ऑपरेशन का था, जो सभी प्रकार के ऑपरेशन कश्मीर में जो होते हैं, उसे कॉर्डिनेट और कंट्रोल करते हैं। ऑपरेशन की मॉनिटरिंग मैंने की थी रात भर, यूएवी, ड्रोन से फुटेज के साथ। इस ऑपरेशन के बारे में कई अधिकारियों को जानकारी नहीं थी। इस ऑपरेशन के बारे में उनको पता था जो इससे जुड़े थे सिर्फ उन्हें ही बताया गया था।