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बिड़ला-सहारा डायरी मामले में याचिकाकर्ता एनजीओ ने कहा, जांच के लिए सबूत पर्याप्त

Thu, 05 Jan 2017 11:01 PM IST
ब्यूरो/ अमर उजाला, नई दिल्ली 
ब्यूरो/ अमर उजाला, नई दिल्ली  Updated Thu, 05 Jan 2017 11:01 PM IST
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Sahara-Birla Diary: NGO files fresh affidavit in SC seeking probe into allegations

आयकर विभाग के छापों से संबंधित दस्तावेज के आधार पर आदित्य बिड़ला और सहारा समूह की कंपनियों पर नरेंद्र मोदी समेत अन्य राजनेता को रिश्वत देने का आरोप लगाने वाले गैर सरकारी संगठन ने गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट से कहा कि अगर सुप्रीम कोर्ट इस मामले में जांच का आदेश नहीं देता है तो कोई दूसरी जांच न्यायसंगत नहीं होगी। मालूम हो कि सुप्रीम कोर्ट ने इन दस्तावेजों को शून्य बताते हुए याचिकाकर्ता संगठन को पुख्ता प्रमाण पेश करने केलिए कहा था।

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याचिकाकर्ता संगठन सीपीआईएल ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दाखिल कर कहा है कि आयकर विभाग की अप्रैजल रिपोर्ट, डायरी और ई-मेल साफ-साफ इशारे करती है कि राजनेताओं को रिश्वत दी गई थी, लिहाजा सुप्रीम कोर्ट को जांच का आदेश देना चाहिए। हलफनामे में यह भी कहा गया है कि यह विरले ही होता है जब अदालत या जांच एजेंसी के समक्ष ऐसे पुख्ता दस्तावेज पेश किए गए हों। ऐसे में अगर इस मामले में जांच का आदेश नहीं दिया जाता तो सुप्रीम कोर्ट द्वारा किसी भी मामले में जांच का आदेश देना न्यायसंगत नहीं होगा।
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हलफनामे में कहा गया है कि बिड़ला समूह पर सीबीआई केछापे और सहारा समूह की कंपनियों पर आयकर विभाग केछापे में अघोषित रकम, डायरी, नोटबुक, ई-मेल समेत कई अन्य दस्तावेज मिले थे। इन दस्तावेजों से साफ है कि इन कंपनियों द्वारा राजनेताओं और नौकरशाहों को रिश्वत दी गई थी। 

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'किसी भी अथॉरिटी नेदस्तावेजों की विश्वसनीयता को नकारा नहीं'

Sahara-Birla Diary: NGO files fresh affidavit in SC seeking probe into allegations

हलफनामे में कहा गया है कि ललिता कुमारी के मामले में संविधान पीठ ने कहा था कि अगर जांच एजेंसी के संज्ञान में अगर किसी तरह का गंभीर अपराध आता है तो एफआईआर दर्ज किया जाना चाहिए। लिहाजा इस मामले में उपलब्ध कराए गए दस्तावेज जांच कराने के लिए पर्याप्त है। साथ ही यह भी कहा गया है कि किसी भी अथॉरिटी ने इन दस्तावेजों की विश्वसनीयता को नकारा नहीं है। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट को अदालत की निगरानी में विशेष जांच दल(एसआईटी) से जांच करने का निर्देश देना चाहिए।

मालूम हो कि गत 16 दिसंबर को हुई सुनवाई के दौरान प्रशांत भूषण ने यह सवाल उठाया था कि जस्टिस जेएस खेहड़ को इस मामले पर सुनवाई नहीं करनी चाहिए क्योंकि चीफ जस्टिस नियुक्त करने संबंधी उनकी फाइल सरकार केपास लंबित है। भूषण की इस दलील को जस्टिस खेहड़ और अटॉर्नी जनरल ने अनुचित और गलत बताया था। 

याचिका में कहा गया है कि जब नरेंद्र मोदी गुजरात मुख्यमंत्री थे तब उन्हें कॉरपोरेट घरानों ने रिश्वत दी थी। याचिका में मोदी केअलावा दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित और मध्य प्रदेश केमुख्यमंत्री शिवराज सिंह पर भी रिश्वत लेने का आरोप लगाया गया है।

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