त्वरित विश्लेषणः मुद्दों से भटकाने का कारगर हथियार रहा है दंगा
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तमाम टीवी चैनलों पर बहस चल रही है कि आखिर एक बार फिर देश दंगों की आग में कैसे सुलगने लगा। आरोप-प्रत्यारोप और एक दूसरे पर सियासी हमले हो रहे हैं। इस बात की तह में जाने की सतही सी कोशिश भी हो रही कि आखिर दंगों के इस खेल के पीछे का सियासी गणित क्या है और 2019 से इन दंगों का रिश्ता क्या है। तिरंगा यात्रा के दौरान उत्तर प्रदेश के कासगंज में भड़के दंगों के बाद से ये सिलसिला तेज हुआ है।
अगर आंकड़ों पर गौर करें तो इसी आठ फरवरी को लोकसभा में गृह मंत्रालय ने जो आंकड़े पेश किए उसके मुताबिक, पिछले तीन सालों में दंगों की संख्या में 28 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। अकेले उत्तर प्रदेश में 2015 में 155, 2016 में 162 और 2017 में 195 दंगे हुए। और अगर 2018 के अभी तक के आंकड़े देख लें तो यह संख्या और बढ़ती हुई नजर आ रही है।
दंगों पर अपनी सियासत चमकाने वाले नेतागण यह बात जोर देकर कहने में शर्म नहीं महसूस कर रहे हैं कि 2013 में मुजफ्फरनगर के भयानक दंगों वाले साल कुल 247 दंगे हुए थे जो इन तीन सालों से कहीं ज्यादा थे।
दरअसल दंगा देश को मुद्दों से भटकाने का एक कारगर सियासी हथियार हमेशा से बनता रहा है। चाहे 1984 के सिख दंगे रहे हों, 1987 के मेरठ दंगे रहे हों या फिर उसके बाद के तमाम दंगे। यहां तक कि 2013 के मुजफ्फरनगर दंगों को भी 2014 के चुनावी चश्मे से देखा गया और इसका सियासी फायदा उठाने में कोई कसर नहीं छोड़ी गई।
अब भले ही उन दंगों के आरोपियों को क्लीन चिट दे दी गई हो लेकिन मुजफ्फरनगर को इस एक दंगे ने जितने दशक पीछे धकेल दिया, उसे वापस लौटने में कितना वक्त लगेगा कोई नहीं जानता। यहां तक कि मेरठ जैसे शहर की ब्रांडिंग भी वहां के 1987 के दंगों से आज तक होती है।
दंगामुक्त भारत बनाने के बड़े-बड़े दावे
1984 के सिख दंगों के बाद से अबतक दिल्ली, कानपुर, लखनऊ, पटना और देश के तमाम शहरों में सिख आज भी खुद को किस तरह अजनबी सा महसूस करते हैं, ये उनसे मिलने पर जाहिर हो जाता है।
दरअसल नफरत के इस खेल में सियासत की भूमिका के बारे में कहते तो सब हैं, हर पार्टी और सरकार दंगामुक्त प्रदेश और भारत बनाने के बड़े-बड़े दावे करती है, लेकिन चुनाव नजदीक आते ही वोटों के ध्रुवीकरण का ये खतरनाक खेल शुरू हो जाता है। चाहे वह रामनवमी के जुलूस के नाम पर हो या फिर मोहर्रम के जुलूस के नाम पर।
फिलहाल बिहार और पश्चिम बंगाल जल रहा है। बिहार के जेडीयू-भाजपा सरकार के मुखिया और सुशासन के लिए मशहूर नितीश कुमार और उप मुख्यमंत्री सुशील मोदी कुछ बोलें न बोलें लेकिन भाजपा के दूसरे नेता और मंत्रीगण दंगों के लिए सीधे तौर पर कांग्रेस और खासकर राहुल और सोनिया गांधी को दोषी ठहरा कर पल्ला झाड़ने की कोशिश कर रहे हैं। बिहार में भागलपुर, मुंगेर, औरंगाबाद, नवादा से होते हुए दंगा तमाम शहरों में फैल रहा है।
ममता बनर्जी के बंगाल में आसनसोल, रानीगंज, मुर्शिदाबाद, दुर्गापुर जैसे शहर में हालात बिगड़े हैं। आरोप ये है कि रामनवमी के जुलूस और भड़काऊ नारेबाजी ने ऐसे हालात पैदा किए और खासकर पूरे देश में हिन्दू संगठनों के 18 फरवरी से 31 मार्च तक अलग अलग तरीके से मनाए जा रहे ‘राम महोत्सव’ और इसके जुलूस ने स्थिति बिगाड़ी। लेकिन इन जगहों पर शुरूआती दौर में न तो पुलिस हरकत में आई और न ही जिला प्रशासन।
हर बार दंगों के पीछे की एक ही कहानी होती है। पूरे इलाके तबाह होते हैं, सैकड़ों जानें जाती हैं, बस्तियां उजड़ जाती हैं, दिलों के फासले बढ़ जाते हैं, लोग पलायन को मजबूर होते हैं, देश के आम लोगों का ध्यान मूल समस्याओं से हटकर इस भावनात्मक खेल में उलझा दिया जाता है और फिर सिंकती है वोट की रोटी और शुरू होता है मरहम के नाम पर सियासत का घिनौना खेल।
विकास के एजेंडे पर चुनाव लड़ने और देश को डिजिटल बनाकर दुनियाभर में अपना परचम लहराने के खोखले दावे और विदेशी निवेश की कहानियां और खूबसूरत सपनों का देश बना देने वाले घोषणापत्रों का चुनावी खेल।