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Supreme Court: 'दिव्यांगों के अधिकारों को लेकर जागरूकता और संवेदनशीलता की जरूरत', जस्टिस मनमोहन की टिप्पणी

Sat, 02 Aug 2025 03:28 PM IST
पवन पांडेय न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: पवन पांडेय Updated Sat, 02 Aug 2025 03:28 PM IST
सार

दिव्यांगों के अधिकारों पर बोलते हुए सुप्रीम कोर्ट के जज मनमोहन ने कहा कि इस मामले में जागरुकता और संवेदनशीलता की जरूरत है। उन्होंने यह भी कहा कि बहुत लोग अब भी दिव्यांगों के अधिकारों को चैरिटी यानी दान के रूप में देखते हैं, जो कि गलत सोच है।

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Rights of persons with disabilities: SC judge highlights need to create sensitisation & awareness
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : एएनआई

विस्तार

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि कोई कर्मचारी नौकरी के दौरान दिव्यांग हो जाता है तो नियोक्ता को निकाल नहीं देना चाहिए। बल्कि उपयुक्त वैकल्पिक रोजगार प्रदान करके उसके हितों को संरक्षित करना चाहिए। इसके साथ ही शीर्ष कोर्ट ने आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के उस निर्णय को रद्द कर दिया जिसमें अपीलकर्ता को नौकरी से बर्खास्त करने की एपीआरटीसी की कार्रवाई को उचित ठहराया गया था।

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जस्टिस जेके माहेश्वरी और जस्टिस अरविंद कुमार की पीठ ने कहा, नौकरी के दौरान दिव्यांग होने वाले कर्मचारियों को पुनर्नियुक्ति का उचित अवसर दिए बिना न तो छोड़ा जाना चाहिए और न समय से पहले सेवानिवृत्त किया जाना चाहिए। ऐसे कर्मचारियों को उचित ढंग से समायोजित करने का दायित्व केवल प्रशासनिक अनुग्रह का मामला नहीं है बल्कि एक सांविधानिक और वैधानिक अनिवार्यता है, जो समानता, सम्मान और समान व्यवहार के सिद्धांतों पर आधारित है।
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शीर्ष कोर्ट ने इसके साथ आंध्र प्रदेश राज्य सड़क परिवहन निगम (एपीएसआरटीसी) में कार्यरत एक बस चालक को राहत प्रदान की, जिसे रंग-अंधता के कारण समय पूर्व ही सेवा से बर्खास्त कर दिया गया था। नियोक्ता ने उसे कोई वैकल्पिक रोजगार देने या इसकी संभावना तलाशने का कोई कोई प्रयास नहीं किया था। अपीलकर्ता बस चालक को रंग अंधता के कारण उसे चिकित्सकीय रूप से काम के अयोग्य घोषित कर दिया गया था। उसे विभाग में पुनः नियुक्ति का उचित अवसर दिए बिना ही समय से पहले ही नौकरी से निकाल दिया गया था, जबकि एपीएसआरटीसी 1979 के समझौता ज्ञापन के तहत ऐसा करने के लिए बाध्य था।
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कर्मचारी की गरिमा तक ही नियोक्ता का विवेकाधिकार  
शीर्ष कोर्ट की पीठ ने कहा कि जब किसी कर्मचारी को उसकी इच्छा के विरुद्ध किसी स्थिति की वजह से हटा दिया जाता है और जहां व्यवहार्य विकल्पों की अनदेखी की जाती है तो न्यायालय हस्तक्षेप करके कोई सीमा नहीं लांघ रहा बल्कि संविधान में निर्धारित सीमा को बरकरार रख रहा है। नियोक्ता का विवेकाधिकार वहीं समाप्त हो जाता है जहां कर्मचारी की गरिमा शुरू होती है। हालांकि, इसमें एपीएसआरटीसी ने तर्क था, अपीलकर्ता  लाभ का हकदार नहीं है क्योंकि 1979 के समझौता ज्ञापन को 1986 के ज्ञापन द्वारा रद्द कर दिया गया था।

आठ हफ्ते में उपयुक्त पद पर नियुक्त करने का निर्देश
एपीएसआरटीसी की दलीलों को ठुकराते हुए शीर्ष कोर्ट ने कहा कि मुख्य कानूनी दोष इस धारणा में निहित है कि किसी विशेष पद के लिए चिकित्सीय अयोग्यता स्वतः ही सार्वजनिक सेवा के लिए पूरी तरह से अयोग्यता का संकेत देती है। रंग-अंधता वाहन चलाने के लिए अयोग्यता है, पर किसी अन्य गैर-चालक भूमिका में सेवा करने के लिए अयोग्य नहीं बनाती है। शीर्ष कोर्ट ने अपील को स्वीकार करते हुए एपीएसआरटीसी को निर्देश दिया है कि वह आठ सप्ताह में नियुक्ति दें।
 
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