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गणतंत्र दिवस 2020: अदालत में अभिव्यक्ति... सबसे बड़े गणतंत्र में सबसे बड़ा अधिकार और पांच चुनौतियां

Sun, 26 Jan 2020 06:21 AM IST
योगेश साहू मनीष शर्मा, नई दिल्ली
मनीष शर्मा, नई दिल्ली Published by: योगेश साहू Updated Sun, 26 Jan 2020 06:21 AM IST
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Republic Day 2020: Right To expression in court in biggest republican country and Five challenges
गणतंत्र दिवस 2020 - फोटो : Amar Ujala

देश 71वां गणतंत्र दिवस मना रहा है। सात दशक पहले आज ही के दिन संविधान लागू हुआ था और भारत का लोकतांत्रिक गणराज्य के रूप में उदय हुआ। संविधान ने नागरिकों को आजाद जीवन जीने के तमाम मौलिक अधिकार दिए। इन्हीं में से एक अहम अधिकार है-अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता। संविधान ने इसके तहत नागरिकों को मर्यादा के साथ बोलने, लिखने या कहने की स्वतंत्रता दी थी, लेकिन आज देश में एक शोर है कि संविधान की मूल भावना पर कुठाराघात किया जा रहा है।

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हालांकि यह आरोप लगाने वाले खुद अभिव्यक्ति की आजादी के अधिकार की मूल भावना को आत्मसात नहीं कर रहे। इस अधिकार में आजादी है तो एक बंधन और सीमा भी है और दोनों ही आवश्यक हैं। जैसे एक सिक्के के दो पहलू होते हैं, वैसे ही सहमति और असहमति, दोनों लोकतंत्र के दो महत्वपूर्ण पहलू हैं। समझना होगा कि संविधान हमें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार देता है न कि स्वच्छंदता का।
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स्वतंत्रता और स्वच्छंदता में बेहद बारीक अंतर होता है, लेकिन इस अंतर में गहरी खाई भी है। स्वतंत्रता का उपयोग जिम्मेदारी के साथ किया जाता है जबकि स्वच्छंदता दूसरों की सुविधा या असुविधा नहीं देखती। अमेरिका के 16वें राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन का कथन उपयुक्त है-‘जो लोग दूसरों की आजादी बाधित करते हैं, वे स्वयं उस आजादी के हकदार नहीं हैं।’ भारत में करीब डेढ़ माह में ऐसा ही कुछ देखने को मिला।
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जहां राज्यों में हिंसक प्रदर्शनों, नेटबंदी या धारा-144 लगने के दरमियान अभिव्यक्ति की आजादी का इस्तेमाल व दुरुपयोग और उस पर सरकारी कार्रवाई बहस के केंद्र में रही। इसी दौरान इस अधिकार का दायरा भी विस्तृत हुआ, जब कश्मीर में इंटरनेट पर पाबंदी मामले की सुनवाई पर सुप्रीम कोर्ट ने पहली बार इसे अनुच्छेद 19 से जोड़ा। बहरहाल, अधिकारों की आड़ में नागरिकों के कर्तव्य पथ से भटकने और सरकार पर दमन के आरोपों के बीच इस गणतंत्र दिवस पर यह सवाल मौजूं है कि संविधान से मिली अभिव्यक्ति की आजादी के सही मायने क्या हैं और उसका दुरुपयोग कैसे रुके?

चुनौती-1 : मर्यादाओं में आजादी का सुख

संविधान के अनुच्छेद 19(1) (क) में सभी नागरिकों को अभिव्यक्ति की आजादी है। हमें अपना मत, विचार, भावनाएं या अभिव्यक्ति जाहिर करने का पूरा अधिकार मिला। लेकिन संविधान निर्माताओं को मालूम था कि इस स्वतंत्रता के नाम पर कुछ भी कहने, करने या लिखकर सामाजिक ताने-बाने को बिगाड़ने की इजाजत नहीं दी जा सकती। लिहाजा, अनुच्छेद 19(2) में निश्चित बाध्यताएं भी लगाई गईं।

इनमें कानून-व्यवस्था के लिए खतरा होने और वैमनस्यता पैदा करने की स्थितियों में दंडात्मक कार्रवाई करने का प्रावधान रखा गया। इन दोनों ही पहलुओं को सुप्रीम कोर्ट भी प्रमुखता से स्पष्ट कर चुका है। एक मामले में शीर्ष अदालत ने अभिव्यक्ति की आजादी को लोकतंत्र का आधार बताया तो एक अन्य मामले में इसकी मर्यादाओं पर कहा, एक व्यक्ति का अधिकार दूसरों के अधिकार को बाधित करने की कतई इजाजत नहीं देता।

अधिकार  सर्वोपरि पर जिम्मेदारी  के साथ 14 मई 2015, (एक आदेश में सुप्रीम कोर्ट)

  • एक व्यक्ति का अधिकार दूसरों के अधिकार को बाधित करने की इजाजत नहीं देता
  • अभिव्यक्ति की आजादी का अधिकार असीमित) नहीं है। इसका इस्तेमाल सांविधानिक मर्यादाओं के भीतर ही होना चाहिए। यह अधिकार पूर्ण नहीं है।

चुनौती-2 : हिंसा और तोड़फोड़ अभिव्यक्ति का मखौल

प्रदर्शनकारी आए दिन यातायात रोककर, पत्थरबाजी करके, बसों-सार्वजनिक संपत्तियों को आग लगाकर, हमलावर होकर अभिव्यक्ति के अधिकार को कठघरे में खड़ा कर देते हैं। इस कृत्य से आमजन का जीवन जीने का अधिकार भी बाधित होता है। संविधान विशेषज्ञ सुभाष कश्यप कहते हैं, अभिव्यक्ति के नाम पर कानून का उल्लंघन संविधान की आत्मा के खिलाफ है। 

  • सार्वजनिक संपत्तियों को जलाया जा रहा हो तो हम प्रशासन को चुप रहने को भी नहीं कह सकते। उनके हाथ नहीं बांध सकते। -24 जनवरी, 2020, सुप्रीम कोर्ट 
  • देश मुश्किल दौर से गुजर रहा है। बहुत हिंसा हुई है। शांति स्थापित हो तभी सुनवाई होगी।  -09 जनवरी, 2020, सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी

चुनौती-3 : शक्ति का दुरुपयोग या रक्षात्मक कदम

अभिव्यक्ति की आजादी पर लगाम लगाने वाली ‘धारा-144’ के उपयोग पर भी सवाल उठाए जाते हैं।  औपनिवेशिक काल से चल रहा यह कानून राज्य सरकारों और स्थानीय पुलिस को कई विवेकाधिकार देता है, लेकिन लोगों को विरोध जताने से रोकने के लिए सरकारों द्वारा इसे हथियार के रूप में इस्तेमाल करने का आरोप भी लगता है। सीएए विरोधी प्रदर्शनों में भी यह कुछ हद तक देखने को मिला। 

  • कानून के नाम पर लोगों के मौलिक अधिकारों का हनन न हो, धारा 144 का दुरुपयोग नहीं किया जा सकता है। इसे लंबे वक्त तक जारी नहीं रख सकते हैं, इसके लिए जरूरी तर्क होना चाहिए। - 10 जनवरी 2020, सुप्रीम कोर्ट की कश्मीर में पाबंदियों पर टिप्पणी

चुनौती-4 : संपत्ति नुकसान की भरपाई तो हो...पर बदला नहीं

हाल ही में यूपी सरकार ने सीएए विरोधी प्रदर्शनों के दौरान हुए नुकसान की भरपाई हिंसक तत्वों से ही शुरू करने की पहल की। इसे लेकर सीएम योगी आदित्यनाथ की आलोचना हुई तो उनके इस कदम को सराहा भी गया। राजनीतिक बिरादरी और बुद्धिजीवी इस पर बंटे नजर आए। हालांकि विधि और संविधान के जानकारों ने इस कदम को कानून सम्मत करार दिया।

संविधान विशेषज्ञ सुभाष कश्यप के मुताबिक, सार्वजनिक संपत्ति के निर्माण में हरेक नागरिक का योगदान होता है। कुछ अराजक तत्व इन्हें नष्ट करके सभी का नुकसान करते हैं, क्योंकि फिर से संपत्ति निर्माण नागरिकों के कर से ही किया जाता है। ऐसे में नुकसान की भरपाई करना न्यायसंगत है। हालांकि उन्होंने कहा कि इसका इस्तेमाल भय के रूप में हो तो ज्यादा बेहतर होगा। सरकार द्वारा इसका इस्तेमाल बदला लेने के लिए नहीं होना चाहिए।

  • अगर किसी प्रदर्शन के दौरान संपत्ति को नुकसान पहुंचाया जाता है तो पुलिस संबंधित व्यक्ति या दल के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करे। राज्य सरकार के चयनित अधिकारी संपत्ति के नुकसान का आकलन कर भरपाई करें। - 02 दिसंबर 2010 को इलाहाबाद हाईकोर्ट का आदेश
  • भीड़ हिंसा के लिए संबंधित राज्य का हाईकोर्ट नुकसान का आकलन करेगा और आरोपियों से क्षति की भरपाई कराएगा। - 2009 में सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन

चुनौती-5 : अब नेटबंदी नहीं, फायदा कम अधिकारों का उल्लंघन ज्यादा

आज इंटरनेट न सिर्फ अभिव्यक्ति का मजबूत माध्यम है, बल्कि आमजन से लेकर सरकारों, बाजार-उद्योगों का कामकाज भी इसके जरिए हो रहा है, लेकिन विरोध प्रदर्शनों के मद्देनजर नेटबंदी का चलन भी तेजी से बढ़ा है। इस पाबंदी पर सुप्रीम कोर्ट तक ने तल्ख टिप्पणी की है। शीर्ष अदालत ने जम्मू-कश्मीर के संदर्भ में कहा कि बिना वजह इंटरनेट पर रोक नहीं लगाई जा सकती। इससे भी बढ़कर कोर्ट ने इसे अभिव्यक्ति का मौलिक अधिकार बताते हुए अनुच्छेद 19(1) का हिस्सा बताया।

कोर्ट ने कहा कि पाबंदियों की पुख्ता वजह होना जरूरी है। संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद भी इंटरनेट को बुनियादी अधिकार बता चुकी है। हाल ही में सीएए पर विरोध के दौरान कई शहरों ने नेटबंदी का सामना किया, इससे देश हलकान रहा। इस पर सुप्रीम कोर्ट के वकील अपार गुप्ता का कहना है कि कारण बताकर इंटरनेट बंद होना चाहिए, लेकिन ऐसा होता नहीं है। वहीं, कुछ तकनीक मामलों के जानकारों का तर्क है कि नेटबंदी के जरिए लाभ कम बल्कि अधिकारों का उल्लंघन ज्यादा हो रहा है।

कुछ अर्थशास्त्री मानते हैं कि आए दिन नेटबंदी न सिर्फ अधिकारों का उल्लंघन है बल्कि कमजोर होती अर्थव्यवस्था के लिए भी अशुभ है। एक रिपोर्ट के मुताबिक पिछले साल भारत में करीब 4200 घंटे नेट बंद रहा, जो दुनिया में सबसे ज्यादा है। एक अनुमान के मुताबिक इस नेटबंदी से देश को पिछले पांच साल में करीब 21,000 करोड़ रुपये का नुकसान झेलना पड़ा है। जाहिर है कि नेटबंदी न सिर्फ लोगों के अधिकार को प्रभावित करती है बल्कि डिजिटल अर्थव्यवस्था के लिए भी नुकसानदेह साबित हो रही है। 

  • अनुच्छेद 19 (1) (क) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में इंटरनेट का अधिकार शामिल है। इंटरनेट पर प्रतिबंधों पर अनुच्छेद 19 (2) के तहत आनुपातिकता के सिद्धांतों का पालन करना होगा। अनिश्चितकाल के लिए इंटरनेट का निलंबन मंजूर नहीं है। - 10 जनवरी 2020, सुप्रीम कोर्ट की कश्मीर में पाबंदियों पर टिप्पणी
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