Supreme Court: कश्मीरी हिंदुओं और सिखों के पुनर्वास की मांग, सुप्रीम कोर्ट ने कहा- केंद्र के पास जाएं
इसके साथ ही शीर्ष कोर्ट ने याचिकाकर्ता को केंद्र सरकार के समक्ष यह मांग करने को कहा।इससे पहले 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने 'रूट्स इन कश्मीर' नाम की संस्था की ऐसी ही याचिका सुनने से इनकार कर दिया था। तब कोर्ट ने कहा था कि 1990 में हुए नरसंहार के इतने साल बाद सबूत जुटाना संभव नहीं होगा।
विस्तार
कश्मीरी हिंदुओं और सिखों के पुनर्वास की मांग करने वाली एक एनजीओ की याचिका को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया। याचिकाकर्ता संस्था 'वी द सिटीजन्स' ने जम्मू कश्मीर में 1990 से 2003 के बीच हुए हिंदू और सिखों के नरसंहार की एसआईटी जांच और विस्थापितों के पुनर्वास की मांग की थी।
शीर्ष कोर्ट ने याचिकाकर्ता को केंद्र सरकार के समक्ष यह मांग करने को कहा। इससे पहले 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने 'रूट्स इन कश्मीर' नाम की संस्था की ऐसी ही याचिका सुनने से इनकार कर दिया था। तब कोर्ट ने कहा था कि 1990 में हुए नरसंहार के इतने साल बाद सबूत जुटाना संभव नहीं होगा।
Supreme Court begins hearing an NGO's plea seeking rehabilitation of Kashmiri Hindus, Sikhs. SC directs the petitioner to withdraw the petition and asks the petitioner to make a representation before the Centre. pic.twitter.com/1q0OxM1td2
विज्ञापन विज्ञापन— ANI (@ANI) September 2, 2022
एक अन्य याचिका पर सुनवाई के लिए सहमत
सुप्रीम कोर्ट ने जम्मू-कश्मीर में न्यायिक संस्थानों में 'पिछले दरवाजे से नियुक्तियों' का आरोप लगाने वाली याचिका पर सुनवाई के लिए तैयार हो गया है। याचिका में आरोप लगाया है कि जम्मू-कश्मीर में न्यायिक संस्थानों और अदालतों में नियुक्तियों में पूर्व न्यायाधीशों और कर्मचारियों के रिश्तेदारों को फायदा पहुंचाया गया। जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस हेमा कोहली की पीठ ने मामले में नोटिस जारी कर जम्मू-कश्मीर उच्च न्यायालय से उसके प्रशासनिक पक्ष पर जवाब मांगा। कोर्ट ने कहा कि उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश द्वारा इसकी जांच की जानी चाहिए। याचिका पर छह सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने को कहा गया है।
सार्वजनिक हित जरूरी हों तो निजी हित छोड़ देना चाहिए : सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कार्ट ने शुक्रवार को एक मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि जब सार्वजनिक हित एकदम स्पष्ट और अत्यावश्यक हों तो निजी हितों को पीछे रखना चाहिए। शीर्ष अदालत ने कहा कि विधि के शासन से संचालित लोकतांत्रिक समाज में व्यक्ति के अधिकारों का अत्यधिक महत्व होता है। उसी मूलभूत सांचे पर हमारा कानूनी, सामाजिक और राजनीतिक परिवेश फलता-फूलता है। जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस अभय एस ओका की पीठ ने साथ ही कहा कि अदालत को इस तथ्य से भी नहीं चूकना चाहिए कि कई परिस्थितियों में बहुत लोगों की जरूरत को कुछ लोगों की जरूरत पर तरजीह दी जानी चाहिए।
अदालत ने ये टिप्पणियां एक मुकदमे का फैसला सुनाते हुए कीं जिसमें कुछ लोगों ने अपनी जमीन पर सड़क निर्माण का विरोध किया था। महाकाली केव्स से सेंट्रल एमआईडीसी तक ट्रैफिक जाम से बचने के लिए यह सड़क शुरुआती तौर पर 1976 में मुंबई के डेवलपमेंट प्लान में प्रस्तावित की गई थी। जिन व्यक्तियों की जमीन से प्रस्तावित सड़क गुजरनेवाली है उन्होंने इसके निर्माण का प्रस्ताव रद्द करने की मांग करते हुए शीर्ष अदालत का दरवाजा खटखटाया था।
संविधान की प्रस्तावना से समाजवाद, धर्मनिरपेक्षता शब्दों को हटाने संबंधी याचिका पर 23 को सुनवाई
राज्यसभा सांसद डॉ. सुब्रह्मण्यम स्वामी के संविधान की प्रस्तावना से समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता शब्दों को हटाने की मांग वाली रिट याचिका पर सुप्रीम कोर्ट 23 सितंबर को सुनवाई करेगा। जस्टिस इंदिरा बनर्जी और जस्टिस एमएएम सुंदरेश की पीठ ने स्वामी की याचिका को इसी तरह की एक अन्य याचिका के साथ जोड़ा।
दूसरी याचिका देश के चीफ जस्टिस (सीजेआई) जस्टिस यूयू ललित की पीठ के समक्ष सूचीबद्ध है। स्वामी ने अपनी याचिका में वर्ष 1976 में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के कार्यकाल में 42वें संविधान संशोधन के माध्यम से प्रस्तावना से समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता शब्दों को सम्मिलित करने की वैधता को चुनौती दी है।