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क्या कारण रहे लखनऊ में महिलाओं की मस्जिद बनने के पीछे?
टीम डिजिटल/अमर उजाला, नई दिल्ली
Updated Sat, 11 Feb 2017 01:36 PM IST
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मस्जिद के लिए शाइस्ता को कई लोगों से जूझना पड़ा
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साल 2000 की एक दोपहर में यह मुस्लिम महिला स्कूल जाने वाले अपने बेटे को लेकर स्कूटर पर कुछ ढूंढ रही थी। उन दिनों लखनऊ का तेलीबाग इलाका न तो इतना आबाद था और न ही इस महिला को कोई मस्जिद मिल रही थी।आखिरकार शाइस्ता अंबर को एक मस्जिद मिली लेकिन इमाम ने उनके बेटे को अपने पास बुलाते ही शाइस्ता से दूर जाने को कहा।
शाइस्ता याद करतीं हैं, "शौहर सरकारी अफसर थे और कहीं पोस्टेड थे। मुझे लगा कि बेटे को मैं ही ले जा कर नमाज पढ़वा दूं, लेकिन जितनी हिकारत से मुझे मस्जिद के दरवाजे से हटने को कहा गया बस मैंने ठान लिया की महिलाओं के लिए भी मस्जिद होनी चाहिए"।
शाइस्ता उन दिनों को याद कर के भावुक हो उठती हैं। नम आंखों से कहा, "पति से लेकर मेरे अपने पिता से भी मेरी तकरार होती रही। मुझे बाहर से धमकियाँ मिलती रहीं। मेरी कार के टायर पंचर कर दिए जाते थे, लेकिन बस मन में कहीं एक भरोसा था कि जो कर रहीं हूँ उसे ऊपर वाला समझ रहा होगा"।
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शाइस्ता याद करतीं हैं, "शौहर सरकारी अफसर थे और कहीं पोस्टेड थे। मुझे लगा कि बेटे को मैं ही ले जा कर नमाज पढ़वा दूं, लेकिन जितनी हिकारत से मुझे मस्जिद के दरवाजे से हटने को कहा गया बस मैंने ठान लिया की महिलाओं के लिए भी मस्जिद होनी चाहिए"।
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शाइस्ता उन दिनों को याद कर के भावुक हो उठती हैं। नम आंखों से कहा, "पति से लेकर मेरे अपने पिता से भी मेरी तकरार होती रही। मुझे बाहर से धमकियाँ मिलती रहीं। मेरी कार के टायर पंचर कर दिए जाते थे, लेकिन बस मन में कहीं एक भरोसा था कि जो कर रहीं हूँ उसे ऊपर वाला समझ रहा होगा"।
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मुस्लिम महिलाओं ने दी मौलवियों को चुनौती
यहां जमीन लेकर वर्ष 2005 में अंबर मस्जिद बन कर तैयार हुई और पहले महिलाओं और फिर पुरुषों ने भी यहाँ साथ-साथ नमाज पढ़नी शुरू कर दिया। ट्रिपल तलाक जैसे मामलों पर ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड से इत्तेफाक न रखने वाली शाइस्ता और उनकी सोच वाली कुछ और महिलाओं ने एक और साहसी कदम उठाया।
इन्होंने ऑल इंडिया मुस्लिम वुमन पर्सनल लॉ बोर्ड की स्थापना कर दी जिससे 'महिलाओं के हितों की रक्षा की जा सके'। पिछले 10 वर्षों से हर शुक्रवार इस मस्जिद में महिलाओं के लिए कई तरह के कैंप लगते हैं जिनमें राशन कार्ड से लेकर बेटियों को स्कूल भेजने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है।
हाल ही में इस मस्जिद में कुछ गैरसरकारी संगठनों की मदद से एक सोलर पावर प्लांट भी लगवाया गया है।
पर्यावरण मामलों की जानकार सीमा जावेद ने बताया कि इसके पीछे कोशिश यही थी कि प्रार्थना करने की ये जगह भी ग्रीन या पर्यावरण का बचाव करने वाली हो। उन्होंने कहा, "चूंकि मस्जिद के प्रांगण में बाहर लोग रहते हैं। दिन भर काम चलता रहता है तो बिजली का खर्च भी कम हो सकेगा, लेकिन उससे महत्वपूर्ण ये है कि पर्यावरण बचाव में ये योगदान भी दे सकेगी"।
इन्होंने ऑल इंडिया मुस्लिम वुमन पर्सनल लॉ बोर्ड की स्थापना कर दी जिससे 'महिलाओं के हितों की रक्षा की जा सके'। पिछले 10 वर्षों से हर शुक्रवार इस मस्जिद में महिलाओं के लिए कई तरह के कैंप लगते हैं जिनमें राशन कार्ड से लेकर बेटियों को स्कूल भेजने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है।
हाल ही में इस मस्जिद में कुछ गैरसरकारी संगठनों की मदद से एक सोलर पावर प्लांट भी लगवाया गया है।
पर्यावरण मामलों की जानकार सीमा जावेद ने बताया कि इसके पीछे कोशिश यही थी कि प्रार्थना करने की ये जगह भी ग्रीन या पर्यावरण का बचाव करने वाली हो। उन्होंने कहा, "चूंकि मस्जिद के प्रांगण में बाहर लोग रहते हैं। दिन भर काम चलता रहता है तो बिजली का खर्च भी कम हो सकेगा, लेकिन उससे महत्वपूर्ण ये है कि पर्यावरण बचाव में ये योगदान भी दे सकेगी"।
अब इस मस्जिद में पुरुष और महिलाएं दोनों अदा करते हैं नमाज़
मस्जिद में नियमित आने वाले कई पुरुषों ने भी इस बात की हामी भरी कि यहाँ महिलाओं के उत्थान के लिए उठाए जा रहे कदम सराहनीय हैं।फिलहाल जब उत्तर प्रदेश में विधान सभा चुनाव जारी हैं
तब यहाँ पर प्रार्थना करने वाली कुछ महिलाओं ने अपनी बेबसी के बारे में भी बताया।
36 वर्षीय मुनीरन ने कहा, "तीन साल हो गए, यहाँ से बस दो किलोमीटर दूर रहते हैं। तीन बार फॉर्म भी भरा लेकिन वोटर आईडी आज तक नहीं बनवा सके हैं"।
नूरजहाँ नामक एक दूसरी महिला की शिकायत उन नेताओं से है जो प्रचार के समय वादे कर बाद में भूल जाते है।आखिरकार शाइस्ता ने ज्यादातर का दर्द ये कह कर समेटा कि, "संसद में कितनी महिलाएं हैं? इन चुनावों में कितनी महिलाओं को टिकट मिला? हमें बराबरी चाहिए, रहम नहीं"।
तब यहाँ पर प्रार्थना करने वाली कुछ महिलाओं ने अपनी बेबसी के बारे में भी बताया।
36 वर्षीय मुनीरन ने कहा, "तीन साल हो गए, यहाँ से बस दो किलोमीटर दूर रहते हैं। तीन बार फॉर्म भी भरा लेकिन वोटर आईडी आज तक नहीं बनवा सके हैं"।
नूरजहाँ नामक एक दूसरी महिला की शिकायत उन नेताओं से है जो प्रचार के समय वादे कर बाद में भूल जाते है।आखिरकार शाइस्ता ने ज्यादातर का दर्द ये कह कर समेटा कि, "संसद में कितनी महिलाएं हैं? इन चुनावों में कितनी महिलाओं को टिकट मिला? हमें बराबरी चाहिए, रहम नहीं"।