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तो इसलिए कोई भी शहर शामिल नहीं हो सका यूनेस्को की वर्ल्ड हेरिटेज सिटी में
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Updated Sun, 29 Jul 2018 05:34 PM IST
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ताजमहल
मुहब्बत की निशानी के तौर पर दुनियाभर में ख्यात ताजमहल को देखने सबसे ज्यादा विदेशी पर्यटक भारत आते हैं। विश्व धरोहर ताजमहल की खोती चमक चिंता का सबब बन चुकी है। सुप्रीम कोर्ट ने धरोहरों को लेकर केन्द्र और राज्य सरकार के रवैये पर तल्ख टिप्पणी की है। लेकिन उपेक्षा की स्थिति में ताजमहल ही नहीं भारत की कई और ऐतिहासिक धरोहरें भी हैं। आपको ये जानकर हैरानी होगी कि हमारी धरोहरों के रख-रखाव के प्रति सरकारों के उदासीन और लापरवाही भरे रवैये की वजह से एक भी ऐतिहासिक शहर विश्व धरोहर में शामिल होने के बाद भी हेरिटेज सिटी में शामिल नहीं है।
ये जानना भी जरूरी है कि ताज नगरी आगरा दुनिया भर के लिए आकर्षण का केंद्र होते हुए भी वर्ल्ड हेरिटेज सिटी में शामिल क्यों नहीं है? वैश्विक स्तर पर तो हम पिछड़े हुए हैं लेकिन देश के लिए ताज का रख-रखाव क्यों जरूरी है ये समझना भी बेहद जरूरी है।
ताजमहल क्यों जरूरी है देश के लिए?
मानसून सत्र में पूछे गए एक सवाल के जवाब में बताया गया कि ताजमहल की वजह से सरकार को हर साल काफी मुनाफा होता है। साल 2013 से 2016 के बीच ताजमहल की टिकट बिक्री से 67.7 करोड़ की कमाई हुई है । 2013-14 में ये कमाई 22.5 करोड़, 2014-15 में 21.3 करोड़ और 2015-16 में 23.9 करोड़ रुपए रही। सफेद संगमरमर से बने ताजमहल की खूबसूरती को देखने के लिए हर साल 9 से 10 लाख पर्यटक भारत आते हैं। यानी देखा जाए तो पर्यटन और देश की अर्थव्यवस्था दोनों के लिए ताजमहल बेहद जरूरी है। यही वजह है कि सुप्रीम कोर्ट ने सरकार और ताज ट्रैपेजियम जोन (टीटीजेड) प्राधिकरण की निंदा की और सवाल किया कि अगर यूनेस्को इस स्मारक से विश्व धरोहर का दर्जा वापस ले ले तो क्या होगा? लेकिन ताज के साथ और भी धरोहर हैं जिनकी हालत दिन-ब-दिन खस्ता होती जा रही है।
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ज्यादतर धरोहर खतरे में
यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल होने की दौड़ से दिल्ली का लोटस टेंपल यानी कमल मंदिर पहले ही बाहर हो चुका है क्योंकि इसके लिए जरूरी दस्तावेज पेश नहीं किए जा सके थे। यूनेस्को ने 1052 स्थलों को विश्व धरोहर घोषित किया हुआ है। इनमें 203 प्राकृतिक धरोहरों की श्रेणी में आती हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक करीब 100 प्राकृतिक श्रेणी की विश्व धरोहर खतरे में हैं। इन पर कई तरह के संकट मंडरा रहे हैं। यूनेस्को वर्ल्ड हेरिटेज के दो तिहाई क्षेत्र ऐसे हैं जो पेयजल के लिए महत्वपूर्ण साधन हैं, जबकि आधे ऐसे हैं जो प्राकृतिक आपदाओं से वहां के लोगों की सुरक्षा करते हैं। अनियोजित औद्योगिक विकास इन धरोहरों को तेजी से नुकसान पहुंचा रहा है।
हालांकि वैश्विक स्तर पर भारत हेरिटेज साइट्स को लेकर कुछ अच्छी स्थिति में है। फिलहाल यूनेस्को ने भारत के 35 महत्वपूर्ण स्थलों को विश्व धरोहर घोषित किया हुआ है। लेकिन आश्चर्य की बात तो यह है कि भारत का एक भी शहर वर्ल्ड हेरिटेज सिटी में शामिल नहीं है। वहीं दुनियाभर के 287 शहर हेरिटेज सिटी हैं।
यूनेस्को की वर्ल्ड हेरिटेज कमेटी ने 55 धरोहरों को खतरे की सूची में रखा है। इनमें प्रमुख तौर पर अफगानिस्तान की बामियान वैली, इजिप्ट का अबू मेना, यरूशलम शहर एवं दीवार, डोमेस्टिक रिपब्लिक ऑफ द कांगो की पांच धरोहरें, सीरियन अरब रिपब्लिक की छह एवं कई देशों के नेशनल पार्क शामिल हैं।
संरक्षण का अभाव
माना जाता है कि भारत के लोगों में गौरवशाली अतीत से रूबरू कराने वाली धरोहरों को लेकर खास लगाव नहीं है। यही वजह है कि भारत में ऐतिहासिक धरोहरें खंडहर में तब्दील होती जा रही है। भारत में ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण की जिम्मेदारी भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण संस्थान (एएसआई) निभा रहा है। देश भर में फैली ऐतिहासिक धरोहरों के खजाने को एएसआई बस किसी तरह संभाल रहा है। संसाधनों की कमी को यूनेस्को जैसी विश्व संस्थाओं की मदद से पूरा करने में काफी मदद भी मिलती है। इसके बाद भी इन इमारतों का पुराना वैभव नहीं लौट पा रहा है।
विश्व विरासत कहलाने से फायदा
वर्ल्ड हेरिटेज सिटी में शुमार होना गौरव की बात है। इससे उस शहर का नाम विश्व पर्यटन के मानचित्र पर उभर जाता है। इससे पर्यटन को बढ़ावा मिलता है। भारी संख्या में विदेशी पर्यटक उस स्थान को देखने और उसकी विशेषता को जानने के लिए वहां आते हैं। विदेशी पर्यटकों के लिए वहां सभी सुविधाएं जुटाई जाती हैं। इन सुविधाओं का फायदा सभी को मिलता है। खास तौर से स्थानीय शहर और उस राज्य को तथा कई लोगों को राेजगार मिलता है। विदेशी पर्यटक देश की संस्कृति से रूबरू होते हैं। 1972 में यूनेस्को ने इन धरोहरों की सुरक्षा के लिए कुछ नियम भी बनाए थे।
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ये जानना भी जरूरी है कि ताज नगरी आगरा दुनिया भर के लिए आकर्षण का केंद्र होते हुए भी वर्ल्ड हेरिटेज सिटी में शामिल क्यों नहीं है? वैश्विक स्तर पर तो हम पिछड़े हुए हैं लेकिन देश के लिए ताज का रख-रखाव क्यों जरूरी है ये समझना भी बेहद जरूरी है।
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ताजमहल क्यों जरूरी है देश के लिए?
मानसून सत्र में पूछे गए एक सवाल के जवाब में बताया गया कि ताजमहल की वजह से सरकार को हर साल काफी मुनाफा होता है। साल 2013 से 2016 के बीच ताजमहल की टिकट बिक्री से 67.7 करोड़ की कमाई हुई है । 2013-14 में ये कमाई 22.5 करोड़, 2014-15 में 21.3 करोड़ और 2015-16 में 23.9 करोड़ रुपए रही। सफेद संगमरमर से बने ताजमहल की खूबसूरती को देखने के लिए हर साल 9 से 10 लाख पर्यटक भारत आते हैं। यानी देखा जाए तो पर्यटन और देश की अर्थव्यवस्था दोनों के लिए ताजमहल बेहद जरूरी है। यही वजह है कि सुप्रीम कोर्ट ने सरकार और ताज ट्रैपेजियम जोन (टीटीजेड) प्राधिकरण की निंदा की और सवाल किया कि अगर यूनेस्को इस स्मारक से विश्व धरोहर का दर्जा वापस ले ले तो क्या होगा? लेकिन ताज के साथ और भी धरोहर हैं जिनकी हालत दिन-ब-दिन खस्ता होती जा रही है।
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ज्यादतर धरोहर खतरे में
यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल होने की दौड़ से दिल्ली का लोटस टेंपल यानी कमल मंदिर पहले ही बाहर हो चुका है क्योंकि इसके लिए जरूरी दस्तावेज पेश नहीं किए जा सके थे। यूनेस्को ने 1052 स्थलों को विश्व धरोहर घोषित किया हुआ है। इनमें 203 प्राकृतिक धरोहरों की श्रेणी में आती हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक करीब 100 प्राकृतिक श्रेणी की विश्व धरोहर खतरे में हैं। इन पर कई तरह के संकट मंडरा रहे हैं। यूनेस्को वर्ल्ड हेरिटेज के दो तिहाई क्षेत्र ऐसे हैं जो पेयजल के लिए महत्वपूर्ण साधन हैं, जबकि आधे ऐसे हैं जो प्राकृतिक आपदाओं से वहां के लोगों की सुरक्षा करते हैं। अनियोजित औद्योगिक विकास इन धरोहरों को तेजी से नुकसान पहुंचा रहा है।
हालांकि वैश्विक स्तर पर भारत हेरिटेज साइट्स को लेकर कुछ अच्छी स्थिति में है। फिलहाल यूनेस्को ने भारत के 35 महत्वपूर्ण स्थलों को विश्व धरोहर घोषित किया हुआ है। लेकिन आश्चर्य की बात तो यह है कि भारत का एक भी शहर वर्ल्ड हेरिटेज सिटी में शामिल नहीं है। वहीं दुनियाभर के 287 शहर हेरिटेज सिटी हैं।
यूनेस्को की वर्ल्ड हेरिटेज कमेटी ने 55 धरोहरों को खतरे की सूची में रखा है। इनमें प्रमुख तौर पर अफगानिस्तान की बामियान वैली, इजिप्ट का अबू मेना, यरूशलम शहर एवं दीवार, डोमेस्टिक रिपब्लिक ऑफ द कांगो की पांच धरोहरें, सीरियन अरब रिपब्लिक की छह एवं कई देशों के नेशनल पार्क शामिल हैं।
संरक्षण का अभाव
माना जाता है कि भारत के लोगों में गौरवशाली अतीत से रूबरू कराने वाली धरोहरों को लेकर खास लगाव नहीं है। यही वजह है कि भारत में ऐतिहासिक धरोहरें खंडहर में तब्दील होती जा रही है। भारत में ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण की जिम्मेदारी भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण संस्थान (एएसआई) निभा रहा है। देश भर में फैली ऐतिहासिक धरोहरों के खजाने को एएसआई बस किसी तरह संभाल रहा है। संसाधनों की कमी को यूनेस्को जैसी विश्व संस्थाओं की मदद से पूरा करने में काफी मदद भी मिलती है। इसके बाद भी इन इमारतों का पुराना वैभव नहीं लौट पा रहा है।
विश्व विरासत कहलाने से फायदा
वर्ल्ड हेरिटेज सिटी में शुमार होना गौरव की बात है। इससे उस शहर का नाम विश्व पर्यटन के मानचित्र पर उभर जाता है। इससे पर्यटन को बढ़ावा मिलता है। भारी संख्या में विदेशी पर्यटक उस स्थान को देखने और उसकी विशेषता को जानने के लिए वहां आते हैं। विदेशी पर्यटकों के लिए वहां सभी सुविधाएं जुटाई जाती हैं। इन सुविधाओं का फायदा सभी को मिलता है। खास तौर से स्थानीय शहर और उस राज्य को तथा कई लोगों को राेजगार मिलता है। विदेशी पर्यटक देश की संस्कृति से रूबरू होते हैं। 1972 में यूनेस्को ने इन धरोहरों की सुरक्षा के लिए कुछ नियम भी बनाए थे।
ताजमहल
कैसे तय होती है धरोहर
जो भी देश इस सूची में अपने स्थलों को नामांकित कराना चाहता है, उसे सर्वप्रथम अपनी महत्वपूर्ण सांस्कृतिक और प्राकृतिक धरोहरों की एक सूची बनानी होती है। विश्व धरोहर केन्द्र इस फाइल को बनाने में सलाह देता और सहायता करता है। इस सूची का निरीक्षण अंतरराष्ट्रीय स्मारक, स्थल परिषद और विश्व संरक्षण संघ करते हैं। इसके बाद यह संस्थाएं विश्व धरोहर समिति से सिफारिश करती हैं। समिति साल में एक बार समीक्षा और मूल्यांकन सभा का आयोजन करती है। सभा यह निर्णय लेती है, कि प्रत्येक नामांकित सम्पदा को विश्व धरोहर सूची में सम्मिलित करना है या नहीं?
भारत की राह के रोड़े
यूरोप और दुनिया के अन्य विकसित देशों को सरकार और जनता की सहज भागीदारी से अपनी मुट्ठीभर एेतिहासिक धरोहरों को सहेजकर आसानी से यूनेस्को की विरासत सूची में जगह दिला पाने में कामयाबी मिल है। लेकिन भारत में यह काम सरकार से लिए टेढ़ी खीर और सफेद हाथी साबित हो रहा है। पिछले कई सालों और तमाम कोशिशों के बावजूद अब तक किसी भी शहर को विश्व विरासत शहर का तमगा हासिल नहीं हो पाया है। जन भागीदारी का अभाव और सरकारी तंत्र का गैरजिम्मेदाराना रवैया इस राह का सबसे बड़ा रोड़ा है।
जो भी देश इस सूची में अपने स्थलों को नामांकित कराना चाहता है, उसे सर्वप्रथम अपनी महत्वपूर्ण सांस्कृतिक और प्राकृतिक धरोहरों की एक सूची बनानी होती है। विश्व धरोहर केन्द्र इस फाइल को बनाने में सलाह देता और सहायता करता है। इस सूची का निरीक्षण अंतरराष्ट्रीय स्मारक, स्थल परिषद और विश्व संरक्षण संघ करते हैं। इसके बाद यह संस्थाएं विश्व धरोहर समिति से सिफारिश करती हैं। समिति साल में एक बार समीक्षा और मूल्यांकन सभा का आयोजन करती है। सभा यह निर्णय लेती है, कि प्रत्येक नामांकित सम्पदा को विश्व धरोहर सूची में सम्मिलित करना है या नहीं?
भारत की राह के रोड़े
यूरोप और दुनिया के अन्य विकसित देशों को सरकार और जनता की सहज भागीदारी से अपनी मुट्ठीभर एेतिहासिक धरोहरों को सहेजकर आसानी से यूनेस्को की विरासत सूची में जगह दिला पाने में कामयाबी मिल है। लेकिन भारत में यह काम सरकार से लिए टेढ़ी खीर और सफेद हाथी साबित हो रहा है। पिछले कई सालों और तमाम कोशिशों के बावजूद अब तक किसी भी शहर को विश्व विरासत शहर का तमगा हासिल नहीं हो पाया है। जन भागीदारी का अभाव और सरकारी तंत्र का गैरजिम्मेदाराना रवैया इस राह का सबसे बड़ा रोड़ा है।