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प्रधानमंत्री मुद्रा योजना पर उठे सवाल, जरूरत है कुछ बदलाव की
डॉ. नीरज मील, सीकर
Updated Sun, 27 May 2018 12:09 PM IST
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भारत के छोटे उद्यमियों की सहायता करना भारतीय अर्थव्यवस्था के विकास और समृद्धि में सहायक बनने का सबसे बड़ा माध्यम है। प्रधानमंत्री मुद्रा योजना का लक्ष्य है ‘जिसके पास धन नहीं है, उसे धन उपलब्ध कराना’ है, लेकिन सवाल इस योजना पर भी उठ रहे हैं। इसका आशय यह नहीं है कि यह फ्लॉप हो गई या अब सफल नहीं हो सकती।
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इस योजना के तहत महिला स्व-सहायता समूहों में से ऋण लेने वालों में जो ईमानदारी और निष्ठा देखी गई है, वह किसी अन्य क्षेत्र में विरले ही दिखती है। इसलिए यह योजना सही है, जरूरत है कुछ बदलाव की। हालांकि इसके लिए वर्तमान ढांचों में कोई बहुत बड़ा बदलाव करने की आवश्यकता नहीं होगी, थोड़ी सी हमदर्दी, थोड़ी सी समझबूझ और एक छोटी सी पहल की जरूरत है। ताकि हम गरीब से गरीब इंसान की भरपूर मदद करने में सक्षम हो सकें।
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इस प्रयास से स्थापित वित्तीय प्रणालियां जल्द ही कामकाज के मुद्रा मॉडल को अपना लेंगी यानी ऐसे उद्यमियों को सहायता देंगी, जो कम से कम राशि में बड़ी संख्या में लोगों को रोजगार दे सकें। जरूरत है कि हम बेरोजगारों के भले के लिए सोचें, न कि दुष्परिणामों को लेकर बैठे रहें। हमारे देश में ऐसा महसूस होता है कि बहुत सी चीजें सिर्फ दृष्टिकोण के आसपास मंडराती हैं, लेकिन वास्तविकता इससे बिल्कुल अलग होती है।
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बड़े उद्योगों द्वारा रोजगार के ज्यादा अवसर सृजित किए जाने संबंधी दृष्टिकोण भी इसी तरह से गलत है। वास्तविकता पर नजर डालने से पता चलता है कि बड़े उद्योगों में सिर्फ 1 करोड़ 25 लाख लोगों को रोजगार मिलता है, जबकि देश के 12 करोड़ लोग छोटे उद्यमों में काम करते हैं।
इसी के चलते यह योजना बेरोजगारों के बीच नहीं आ पाई। यही स्थिति ऋणों को लेकर है, जिनमें बड़े ऋण में जोखिम अधिक होता है और छोटे ऋणों में वसूली की संभावनाएं ज्यादा। इसलिए हमें अपने दृष्टिकोण में भी बदलाव करते हुए उस बिंदु पर भी विश्वास आजमाना चाहिए जो अभी तक उपेक्षित ही था।