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लापता नागरिकता बोध पर लिपटी हादसों और लापरवाही की चादर

Sun, 21 Oct 2018 03:29 AM IST
जयदीप कर्णिक
जयदीप कर्णिक Updated Sun, 21 Oct 2018 03:29 AM IST
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punjab train accident- administrative loopholes in railways and people carelessness

हम पुतले के रावण जलाते रहेंगे और मन के रावण को मारने के भाषण देते रहेंगे। विकास के तमाम दावों और नारों के बीच हम लगातार आगे की दिशा में चलते हुए पीछे की ओर सफर तय करने का रिकॉर्ड कायम कर रहे हैं। आज दशहरे के दिन पंजाब के अमृतसर में जौड़ा फाटक के पास हुए हादसे ने हमारी अश्लील असभ्यता को नंगा कर दिया है। हम पढ़े-लिखे अशिक्षितों की एक लंबी जमात हैं। पढ़ाई हमें शिक्षित भी नहीं करती और जागरूक भी नहीं।

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हम लाल बत्ती पर निकलने में अपनी शान समझते हैं, हम हेलमेट नहीं पहनना चाहते, सीट बेल्ट नहीं लगाते, उल्टी दिशा में गाड़ी चलाते हैं, सड़क पर कचरा न फेंकने के लिए हमें कितना समझाना पड़ता है...और वो भी सब बेकार!! हमें जान से ज्यादा जरूरी मोबाइल कॉल लगती है। 
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...और इन सब हदों को तोड़ते हुए हम पटरी पर बैठ कर रावण दहन देखते हैं, बिना इस बात की परवाह किए कि इस दौरान वहां से ट्रेन ना गुज़रने की कोई अनुमति, कोई व्यवस्था हुई भी है कि नहीं? इस आयोजन में नेता-मंत्री भी मौजूद हैं, प्रशासनिक अमला भी लगा हुआ है और फिर भी ऐसी शर्मनाक लापरवाही कि 50 से ज्यादा जानें चली जाएं! 
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जो लोग इस आयोजन की प्रशासनिक व्यवस्था से जुड़े हैं उन पर तो इस आपराधिक लापरवाही का मुक़दमा चलना ही चाहिए ताकि नज़ीर कायम हो। पर सवाल ये भी है कि जो लोग उत्सव के उल्लास में अपने बहुत जरूरी नागरिकता बोध को सूली पर चढ़ा चुके हैं उन पर मुक़दमा दुनिया की किस अदालत में चलाया जा सकेगा? क्या हम सचमुच इतने मासूम भी हैं और निरीह भी कि कोई ट्रेन हमें यों कुचल कर चली जाए। हम कब तक इस तरह की लापरवाही, भगदड़ और हादसों का शिकार होते रहेंगे?

इन आधा सैकड़ा से ऊपर की मौतों पर मातम मनाने से ज्यादा जरूरी है उन कारणों की तफ्तीश जिन्होंने इस हादसे को अंजाम दिया। आख़िर बिना इजाज़त के इतना बड़ा आयोजन हो कैसे गया? लोग पटरी पर बैठे तब पुलिस कहां थी? और लोग पटरी पर बैठे ही क्यों थे?

जब तक हम अपने इस लापता नागरिकता बोध की पहचान कर उसे लौटा नहीं लाते, हम ऐसे हादसों के शिकार होते रहेंगे। दशहरे के रावण जलाने के बावजूद हम शायद सब कुछ राम भरोसे ही चलाते रहेंगे। इस हादसे को लेकर तमाम किंतु परंतु के बीच इन सवालों का जवाब तो चाहिए ही होगा - 


1. क्या प्रशासन को इतने बड़े आयोजन की जानकारी नहीं थी?

2. आयोजक क्यों लापरवाह बने रहे, रेलवे को बाकायदा सूचना क्यों नहीं दी गई?

3. लोग पटरी तक चले गए तब पुलिस कहां थी?


इन सवालों के जवाब भी उसी नागरिकता बोध से जुड़े हैं जिसमें अपनी जिम्मेदारियों को बिना कोताही समझना और पूरा करना जरूरी है। ये निश्चित ही बहुत गंभीर प्रशासनिक लापरवाही है।

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