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अद्वैत उत्सव: भारत के भाल पर उभरे चंद्र की स्तुति का अनुभव

Tue, 10 Dec 2019 10:01 PM IST
Mohit Mudgal विजय मनोहर तिवारी
विजय मनोहर तिवारी Published by: Mohit Mudgal Updated Tue, 10 Dec 2019 10:01 PM IST
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programme organised for university and gurukul teachers on Adi Shankar, Advaita Vedanta philosophy
adi shankaracharya

यह विश्वविद्यालयों में होने वाले सेमिनारों और कार्यशालाओं से अलग आभा का आयोजन है। ऐसा पहली बार हुआ है जब किसी विश्वविद्यालय में भारत की सनातन ज्ञान परंपरा के गुरुकुलों के आचार्य और आधुनिक विश्वविद्यालयों के अध्यापक एक मंच पर हों। तीन दिन के इस एकात्म अनुष्ठान का निमित्त हैं आदि शंकर और अद्वैत वेदांत दर्शन। आज से 1200 साल पहले आदि शंकर का कालखंड है। वे भारत के सांस्कृतिक पुनर्जागरण के अग्रदूत हैं। उनके बाद के एक हजार साल भारत में गुलामी का लंबा समय है, जब इस देश ने अपने बचे रहने के लिए विकट संघर्ष किया। लेकिन शंकर की शिक्षाएं गुरुकुल परंपरा में एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक जीवंत रहीं।

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देश के कोने-कोने से दशकों से अद्वैत की शिक्षा प्रणाली गुरुकुल परंपरा में जारी है। अद्वैत उत्सव में इनके प्रतिष्ठित आचार्यों को सुनना सदियों पुरानी उसी चमक को अनुभव करना है, जो हमारी स्मृतियों में या तो धुंधली है या है ही नहीं। सब आचार्य इस बात पर एकमत हैं कि आदि शंकराचार्य ही एकमात्र वह अंतिम विभूति हैं, जिन्होंने भारत के सनातन धर्म को एक संगठनात्मक स्ट्रक्चर में बांधा। जैसे-देश के चार कोनों पर चार मठों की स्थापना, उनका संचालन विधान, दसनाम संन्यास परंपरा, जिसके दायरे में ही देश के लाखों संन्यासी दीक्षा लेते हैं और सामुदायिक एकता के लिए पंचायन पूजा पद्धति, जिसके पहले अलग-अलग पंथाें में बिखरे समुदाय अपने-अपने देवों और पूजा पद्धतियों को लेकर कर्कश कलह में पड़े थे। यह समय के साथ आया स्वभाविक पतन था। वैदिक धर्म पर चढ़ी धूल को साफ करके केरल मूल का वह महामानव केवल 32 साल की उम्र में संसार से विदा हुआ। आबू के स्वामी संवित सोमगिरि कहते हैं कि शंकर का संन्यास किसी राष्ट्र की सेवा से ज्यादा सनातन परंपराओं को सिद्ध करने के लिए था।
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सागर की ऐतिहासिक भूमि पर ये तीन दिन भारतीय संस्कृति के उस महानायक के प्रति श्रद्धा प्रकट करने का एक अवसर है, जो खुद स्मृतियों के परदे पर न के बराबर सामने है। हम उनके बारे में ज्यादा कुछ जानते ही नहीं। जबकि इसी मध्यप्रदेश में वे आठ साल की उम्र में आए थे और यहीं नर्मदा किनारे ओंकारेश्वर में उन्हें अपने गुरू गोविंदपाद मिलते हैं। मध्यप्रदेश आदि शंकर की पवित्र गुरुभूमि है। वे यहां लगभग तीन साल रहे। वे भारत के इतिहास के ऐसे मोड़ पर चमकी बिजली की कौंध हैं, जिनके बाद दूर तक एक गहरा अंधेरा है। उस अंधेरे में गुलामी के भयावह अंधड़ हैं, जिनसे निकलकर भारत एक बदली हुई शक्ल में टूट-फूटकर दुनिया के सामने आया। लेकिन अद्वैत वेदांत का वह विचार चेतना के किसी गहरे तल पर लगातार बहता रहा। वह रूमी और बुल्ले शाह जैसे सूफियों के कंठ से झरा। एक ऐसा विचार जो धरती को एक परिवार होने की घोषणा करता है। कोई अलग नहीं है। कोई  दूसरा नहीं है। सोने के आभूषण नाम-रूप में ही अलग हैं। मूलत: वह स्वर्ण ही है। अद्वैत का संदेश यही है।
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आदत से हम आम भारतीय अपने महापुरुषों और महान परंपराओं के प्रति एक किस्म की उदासी के स्वभाव वाले हैं। इस दृष्टि से एक विश्वविद्यालय में अद्वैत उत्सव का आयोजन देश-दुनिया से आए विद्वानों को कुछ अजीब भी लगा। यह शोधपत्रों से लैस कोई कागजी कार्यशाला नहीं है। यह यूनिवर्सल वननेस के लिए एक ऐसी पहल है, जहां से बात दूर तक जाएगी। योग दुनिया को भारत की देन है और हाल ही में दुनिया ने विश्व योग दिवस के रूप में हमारी योग परंपरा को सम्मान से स्वीकार किया। उसी तरह अद्वैत का विचार आज की अशांत और आतंक से भरी दुनिया को "यूनिवर्सल वननेस' की ओर ले जाने में सक्षम है। तीन दिन के विचार मंथन से एक अमृत पत्र इसी दिशा में प्रेरित करेगा। सागर का अद्वैत उत्सव भारत के भाल पर चंद्रमा की तरह उभरे आदि शंकर की स्तुति का आध्यात्मिक अनुभव है। शिक्षा संस्थानों के सूखे शोधपत्रों और नीरस व्याख्यानों से कुछ गहरी बात!

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