सरकारी किताबें नदारद, निजी प्रकाशकों की चांदी
- किताबों की छपाई के लिए यूपी बोर्ड ने अभी अधिकृत ही नहीं किए प्रकाशक
- सीबीएसई के स्कूलों में रेफरेंस बुक के नाम पर महंगी किताबों पर जोर
विस्तार
स्कूल खुल गए हैं। पढ़ाई भी शुरू हो गई है मगर हमेशा की तरह किताबें बाजार से नदारद हैं। पढ़ने वालों की मजबूरी है कि सस्ती सरकारी किताबें बाजार में आने का इंतजार करने की बजाय वे निजी प्रकाशकों की किताबें खरीदें। हालांकि अधिकृत प्रकाशकों की किताबों के मुकाबले ये कई गुना महंगी हैं। अधिकृत प्रकाशकों की किताबों की अधिकतम कीमत 70 रुपये है, जबकि निजी प्रकाशकों की वही किताबें 150 से 170 रुपये की हैं।
तमाम प्रशासनिक दावों के उलट नए सत्र की शुरुआत में विद्यार्थियों को किताबों का यह संकट झेलना ही पड़ता है, चाहे यूपी बोर्ड हो या सीबीएसई। यूपी बोर्ड की किताबों की छपाई के लिए प्रकाशकों से आवेदन मांगने और उन्हें अधिकृत करने की प्रक्रिया ही अभी पूरी नहीं हो सकी है। ऐसे में दुकानों पर किताबों की उपलब्धता के फिलहाल कोई आसार नहीं।
सीबीएसई के स्कूलों में एनसीईआरटी की किताबों से ही पढ़ाई की अनिवार्यता है मगर इन स्कूलों में रेफरेंस बुक के नाम पर निजी प्रकाशकों की महंगी किताबें खरीदवाने का चलन है। विद्यार्थियों के महंगी किताबें खरीदने से स्कूलों को क्या फायदा है, यह तो वे ही जानें मगर इससे निजी प्रकाशकों को होने वाला मोटा मुनाफा जगजाहिर है। दिल्ली के स्कूलों में नया सत्र शुरू हुए बीस दिन हो चुके हैं। दसवीं की इतिहास, भूगोल व संस्कृत की किताबें, नौवीं की इतिहास की और पांचवीं की गणित की किताबें ढूंढे़ नहीं मिल रही हैं।
एनसीईआरटी की कुछ विषयों की किताबें भी गायब हैं। कई प्राइवेट स्कूल अभिभावकों को निजी प्रकाशकों की पुस्तकें बेच रहे हैं, जो एनसीईआरटी की किताबों के मुकाबले में काफी महंगी हैं। पिछले साल के मुकाबले में निजी प्रकाशकों की किताबें खरीदने पर पांच सौ से एक हजार रुपये ज्यादा देने पड़ रहे हैं। हालांकि एनसीईआरटी का दावा है कि मांग से 15 से 20 फीसदी अधिक किताबें प्रकाशित होती हैं ताकि किताबों की कमी से निपटा जा सके।
ई-पाठशाला पर सभी विषयों की किताबें नि:शुल्क उपलब्ध
यह मशविरा भी है कि अगर एनसीईआरटी की किताबें बाजार में न मिलें तो एनसीईआरटी की वेबसाइट से किताब डाउनलोड कर सकते हैं। पिछले हफ्ते ही सीबीएसई ने स्कूलों को कहा है कि अभिभावकों को ई-पाठशाला डॉट निक के बारे में बताएं। ई-पाठशाला पर सभी विषयों की किताबें नि:शुल्क उपलब्ध हैं।
स्कूलों से यह भी कहा गया है कि निजी प्रकाशकों की किताबें खरीदने का दबाव न बनाएं। सहारनपुर में जिला विद्यालय निरीक्षक राधाकृष्ण तिवारी और बेसिक
शिक्षाधिकारी बुद्धप्रिय सिंह का कहना है कि माध्यमिक और परिषदीय विद्यालयों की किताबों की छपाई न होने की वजह से दिक्कत है। जिन स्कूलों में निजी
प्रकाशकों की किताबें लगाई गई हैं, उनके खिलाफ अभियान चलाकर कार्रवाई की जाएगी।
बिजनौर में एनसीईआरटी की कक्षा 11 की गणित, बायोलॉजी, फीजिक्स, केमिस्ट्री की किताबें ढूंढ़े नहीं मिल रही हैं। कक्षा नौ व दस की किताबें बाजार में बहुत कम हैं। वाराणसी में भी यूपी बोर्ड की किताबों की किल्लत है। इस बार 11-12वीं का कोर्स अलग-अलग हो गया है, ऐसे में विद्यार्थी पुरानी किताबें भी नहीं खरीद सकते। पिछले साल माध्यमिक की किताबें अप्रैल के अंतिम सप्ताह और सीबीएसई की किताबें मई में बाजार में आ गई थी।
इस बार तो यह अंदाज लगाना भी मुश्किल है। यूपी में परिषदीय विद्यालयों के बच्चों को भी नई किताबें नहीं मिल सकीं। नई किताबों की छपाई का काम पूरा नहीं होने के कारण सरकार की ओर से सभी जिलों में बेसिक शिक्षा अधिकारियों से बच्चों से पुरानी किताबें वापस लेकर नए सत्र के बच्चों को देने के लिए कहा गया है। बरेली में विभाग के अफसरों का कहना है कि नई किताबें शीघ्र ही आ जाएंगी।