राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की छवि करेगी नए राष्ट्रपति कोविंद का पीछा
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वर्तमान हमेशा भूत बनकर भविष्य का पीछा करता है। रायसीना हिल्स में पहुंचने वाले नए राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के साथ भी ऐसा होने की पूरी संभावना है। अगले सप्ताह राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी का कार्यकाल समाप्त हो रहा है। पिछले पांच साल में प्रणब मुखर्जी ने राष्ट्रपति के रूप में एक मानदंड स्थापित किया है।
वह देश के सामने हर चुनौती, कठिन परिस्थिति तथा आवश्यता को समझते हुए लगातार अपनी राय रखते रहे हैं। प्रणब ने जीवन भर कांग्रेस पार्टी कीराजनीति की लेकिन बतौर राष्ट्रपति वह लगातार तटस्थ और बेबाक रहे। प्रणब मुखर्जी 2012 में देश के राष्ट्रपति बने। तटस्थ रहने के साथ-साथ उन्होंने बेबाक राय रखने, सरकार के काम में बतौर राष्ट्रपति दखल देने से परहेज नहीं किया।
राष्ट्रपति बनने के कुछ ही महीने बाद उन्होंने 26 नवंबर 2008 को मुंबई में हुए आतंकी हमले के दोषी पाकिस्तानी आतंकवादी आमिर अजमल कसाब और संसद भवनपर हमले के दोषी अफजल गुरू की फांसी की सजा पर मुहर लगाई थी। इसी के साथ राष्ट्रपति किसी भी तरह के दिखावा, आडंबर, छवि बनाने की प्रक्रिया से लगातार दूररहे। सरकार को लेकपाल के मुद्दे पर ताकीद किया।
कोविंद के लिए होगी चुनैती
2014 में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में सरकार के गठन के बाद मुखर्जी ने बार-बार विपक्ष के संसद में हंगामा करने, सदन न चलने देने की भी आलोचना की।उन्होंने केन्द्र सरकार द्वारा बार-बार आध्यादेश लाने पर भी अपनी नाखुशी जाहिर की। देश में बढ़ रही असहनशीलता को कठघरे में खड़ा किया और सरकार पर इसका साफ असर देखा गया।
राष्ट्रपति ने हाल में भीड़तंत्र द्वारा लोगों को घेरकर मार देने पर भी अपनी राय रखी थी। उन्होंने कांग्रेस पार्टी के एक कार्यक्रम में इसे भारत जैसे लोकतांत्रिक देश के घृणित और अशोभनीय बताया था। इसका भी सरकार पर असर साफ देखा जा सकता है। मौजूदा समय में संसद में भी इस मुद्दे को लेकर चर्चा हो रही है।राष्ट्रपति प्रणब ने हर साल नवरात्र के महीने में अपने पैतृक गांव में जाकर पूजा-अर्चना के कार्यक्रम को जारी रखा। उन्होंने कामकाज में कभी भी खुद के कांग्रेस से जुड़ेहोने की छवि को आड़े नहीं आने दिया।
प्रधानमंत्री मोदी के साहसिक प्रयासों की तारीफ करने, केन्द्रीय मंत्रियों के कौशल की तारीफ करने में भी उन्होंने कोई संकोच नहीं किया। केन्द्र सरकार के विमुद्रीकरण को फैसले को राष्ट्रपति प्रणब ने एतिहासिक निर्णय बताया था।
कोविंद के लिए होगी चुनैती
भावी राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के लिए राष्ट्रपति प्रणब की यह छवि आने वाले समय में कड़ी चुनौती होगी। भाजपा की पृष्ठभूमि से देश के प्रथम नागरिक बनने वालेकोविंद क्या प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व वाली सरकार के कामकाज में जरूरत पडऩे पर दखल दे सकेंगे? क्या कोविंद तल्ख टिप्पणी भी कर सकेंगे? इस तरह के हालातपर पूरे देश की निगाह होगी। इतना ही नहीं प्रणब मुखर्जी के कामकाज के बरअक्स कोविंद के कामकाज की तुलना भी होगी।
देखना होगा आने समय में राष्ट्रपति कोविंदऐसी चुनौतियों से कैसे निबटते हैं। राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी अंतरराष्ट्रीय मामलों में भी अच्छी पकड़ रखते हैं। उनकी दुनिया के नेताओं में पहचान है। इसको लेकर भी वहकेन्द्र सरकार को ताकीद करते रहे हैं। नये राष्ट्रपति के लिए ऐसी स्थिति भी चुनौती बन सकती है।