Pranab Mukherjee: राष्ट्रपति कोविंद, प्रधानमंत्री सहित कई गणमान्य हस्तियों ने दी प्रणब मुखर्जी को श्रद्धांजलि
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राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद, उपराष्ट्रपति एम वेंकैया नायडू, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और तीनों सेनाओं के प्रमुखों सहित विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं और कई गणमान्य व्यक्तियों ने मंगलवार को पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी को श्रद्धांजलि अर्पित की। भारत रत्न मुखर्जी का सोमवार की शाम सेना के रिसर्च एंड रेफरल अस्पताल में निधन हो गया। वह 84 वर्ष के थे। उन्हें गत 10 अगस्त को अस्पताल में भर्ती कराया गया था। उसी दिन उनके मस्तिष्क की सर्जरी की गई थी।
अस्पताल से पूर्व राष्ट्रपति के पार्थिव शरीर को फुलों से सुसज्जित एक सफेद वाहन में आज उनके सरकारी निवास 10, राजाजी मार्ग लाया गया, जहां गणमान्य व्यक्तियों ने उन्हें श्रद्धांजलि दी। केंद्र सरकार ने पूर्व राष्ट्रपति के निधन पर 31 अगस्त से छह सितंबर तक सात दिन के राजकीय शोक की घोषणा की है।
लंबे समय तक कांग्रेस के नेता रहे मुखर्जी की गिनती सार्वजनिक जीवन में सबसे सम्मानित नेताओं में होती है। इसका नजारा आज उनके सरकारी आवास पर देखने को मिला जब राजनीति से परे सभी दलों के नेता और सामान्य जन ने भी उन्हें भावभीनी विदाई दी।
कोविड महामारी के मद्देनजर मास्क लगाए और उचित दूरी का पालन करते हुए पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला, पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत, भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा, दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, केंद्रीय मंत्री निर्मला सीतारमण और हर्ष वर्धन, कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी, भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी के महासचिव डी राजा ने भी दिवंगत नेता को श्रद्धासुमन अर्पित किए।
इन नेताओं ने मुखर्जी की तस्वीर पर पुष्पांजलि अर्पित कर उन्हें श्रद्धांजलि दी। उनका पार्थिव शरीर दूसरे कमरे में रखा गया था।
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, प्रमुख रक्षा अध्यक्ष जनरल बिपिन रावत, थल सेना अध्यक्ष जनरल एम एम नरवणे, वायु सेना प्रमुख आर के एस भदौरिया, नौसेना प्रमुख करमबीर सिंह सहित अन्य प्रमुख हस्तियों ने भी मुखर्जी को श्रद्धांजलि अर्पित की।
राजा ने पत्रकारों से कहा, 'लोग उनसे सहमत हों या असहमत वे मुखरता से राष्ट्रहित में अपने विचार रखते थे।'
राज्यसभा के सदस्य और भाजपा नेता विजय गोयल ने कहा कि मुखर्जी ने कभी सत्ताधारी और विपक्षी दल के नेताओं में फर्क नहीं किया।
गोयल ने कहा, 'वह एक शानदार नेता और वक्ता थे। कांग्रेस के वह खेवनहार रहे। उन्होंने हर किसी का दिल जीता। हमारे प्रधानमंत्री उनका इतना सम्मान करते थे। इसी से आप समझ सकते है कि वह देश के लिए कितने महत्वपूर्ण थें। सही मायने में वह भारत रत्न थे।'
सबको अपना लेते थे प्रणब मुखर्जी: मोहन भागवत
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कहा, 'प्रणब मुखर्जी एक शून्य छोड़कर चले गए हैं। वे उदार और दयालु थे, जो मुझे यह भुला देते थे कि मैं भारत के राष्ट्रपति से बात कर रहा हूं। राजनीतिक मतभेदों के बावजूद, सभी को अपना बनाना उनकी प्रकृति में था। उन्हें हमेशा याद किया जाएगा।'
#PranabMukherjee has left a void. He was generous & kind, who used to make me forget that I am talking to President of India. It was in his nature to make everyone, his own, despite political differences. He'll be remembered always: Rashtriya Swayamsevak Sangh chief Mohan Bhagwat pic.twitter.com/qfrDNZzDoi
— ANI (@ANI) September 1, 2020
मुखर्जी अपने पीछे बेटे अभिजीत और पुत्री शर्मिष्ठा को छोड़ गए हैं।
अभिजीत ने मुखर्जी के अपने गांव से लगाव और निकटता को देखते हुए कहा, जंगीपुर में अपने घर में उनकी याद में मैं संग्रहालय, जिसमें पुस्तकालय भी हो, का निर्माण करने की योजना बना रहा हूं।
मुखर्जी 2012 से 2017 तक देश के 13वें राष्ट्रपति रहे। लंबे समय तक कांग्रेस के नेता रहे मुखर्जी सात बार सांसद भी रहे। भाजपा-नीत केंद्र सरकार ने साल 2019 में उन्हें देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से नवाजा था। उन्होंने इंदिरा गांधी, पी वी नरसिम्हा राव और मनमोहन सिंह जैसे प्रधान मंत्रियों के साथ काम किया।
मुखर्जी भारत के एकमात्र ऐसे नेता थे जो देश के प्रधानमंत्री पद पर न रहते हुए भी आठ वर्षों तक लोकसभा के नेता रहे। वे 1980 से 1985 के बीच राज्यसभा में भी कांग्रेस पार्टी के नेता रहे।
मुखर्जी जब 2012 में देश के राष्ट्रपति बने तो उस समय वे केंद्र सरकार के मंत्री के तौर पर कुल 39 मंत्री समूहों में से 24 का प्रतिनिधित्व कर रहे थे। साल 2004 से 2012 के दौरान उन्होंने 95 मंत्री समूहों की अध्यक्षता की।
वैसे तो उन्होंने सरकार में विभिन्न पदों को सुशोभित किया लेकिन साल 2004 में पहली बार उन्हें लोकसभा पहुंचने का सौभाग्य मिला। पश्चिम बंगाल की जंगीपुर संसदीय सीट से चुनाव जीत कर वे लोकसभा के सदस्य बने। इससे पहले उन्हें दो बार लोकसभा चुनावों में हार का मुंह देखना पड़ा था। साल 1977 में मालदा और 1980 में बोलपुर संसदीय क्षेत्र से वे चुनाव हार गए थे।
राष्ट्रपति के रूप में भी उन्होंने एक अमिट छाप छोड़ी। इस दौरान उन्होंने दया याचिकाओं पर सख्त रुख अपनाया। उनके सम्मुख 34 दया याचिकाएं आईं और इनमें से 30 को उन्होंने खारिज कर दिया।
जनता के राष्ट्रपति के रूप में अपनी पहचान बनाने वाले मुखर्जी को राष्ट्रपति भवन को जनता के निकट ले जाने के लिए उठाए गए कदमों के लिए भी याद किया जाएगा। उन्होंने जनता के लिए इसके द्वार खोले और एक संग्रहालय भी बनवाया।