वायुसेना की ताकत में खरीद प्रक्रिया और आधुनिकीकरण सबसे बड़ी बाधा
- 18 साल में 126 एमएमआरसीए विमानों की जरूरत भी नहीं हो सकी पूरी
- कैग ने राफेल पर ऑडिट रिपोर्ट में जटिल खरीद प्रक्रिया को बताया घातक
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) ने कहा है कि रक्षा मंत्रालय की मौजूदा खरीद प्रणाली वायुसेना की ताकत बढ़ाने और आधुनिकीकरण में तेजी लाने की दिशा में सबसे बड़ी बाधा है। कैग ने सरकार को चेताया कि दुश्मन देशों की तैयारियों के मुकाबले भारत की पूंजीगत खरीद की सुस्त चाल देश के लिए घातक साबित हो सकती हैं। खरीद प्रणाली की इन्हीं जटिलताओं का नतीजा है कि वायुसेना की अत्यधिक जरूरत के बावजूद राफेल जैसे मिडियम मल्टी रोल कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (एमएमआरसीए) पर फैसले में 18 साल लग गए। जबकि ऐसे फैसले अधिकतम तीन साल की अवधि में ले लिया जाना चाहिए था।
संसद में बुधवार को पेश राफेल पर कैग की ऑडिट रिपोर्ट में कहा गया कि वायुसेना एमएमआरसीए श्रेणी के लड़ाकू विमान के लिए मिराज-2000 का आधुनिक ग्रेड-2 वर्जन चाहती थी। कारगिल युद्ध में मिराज-2000 की शानदार उपलब्धि के मद्देनजर वायुसेना ने तत्काल 126 नए विमानों की खरीद की के लिए सरकार से सिफारिश की थी। मंत्रालय की तरफ से राफेल, यूरोफाइटर और एफ-35 जैसे तकनीकी तौर पर उन्नत विमानों के विकल्प पर विचार करने को कहा गया। इनमें एकल वेंडर, कम्पिटिटिव टेंडरिंग और सिंगल सोर्स प्रोक्योरमेंट जैसी जटिल प्रक्रिया आड़े आती रही।
रिपोर्ट के मुताबिक, इन्हीं जटिलताओं में उलझ कर जून, 2001 से जनवरी, 2004 तक तत्कालीन वाजपेयी सरकार इस पर फैसला नहीं कर सकी। कैग ने कहा कि वाजपेयी सरकार ने चार साल इसी मसले पर निकाल दिया कि विमान की खरीद सिंगल सोर्स से की जाए या कम्पिटिटिव टेंडरिंग के आधार पर। लंबी मशक्कत के बाद मनमोहन सिंह की यूपीए सरकार 2007 में राफेल और यूरोफाइटर के बीच चुनाव करने के नतीजे पर पहुंची। हालांकि, यूपीए सरकार के दस साल के कार्यकाल में भी इस पर कोई ठोस फैसला नहीं लिया जा सका। इसके बाद मोदी सरकार 126 की जगह महज 36 विमान खरीदने पर फैसला कर पाई।
खरीद प्रक्रिया में बदलाव की जरूरत
कैग ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि खरीद प्रक्रिया कम से कम 12 स्तरों से गुजरती है और आगे बढ़ने के लिए हर स्तर पर अनुमोदन की जरूरत होती है। इनमें से किसी भी स्तर पर खरीद प्रस्ताव को किसी भी तकनीकी कारणों से खारिज भी किया जा सकता है। लिहाजा रक्षा मंत्रालय को जल्द से जल्द इन जटिलताओं को दूर कर इसे आसान करना होगा। कैग ने कहा कि जटिलता कम करने में मंत्रालय के महानिदेशक (खरीद) का इन मामलों में अहम रोल होना चाहिए। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। खरीद में वायुसेना मुख्यालय और मंत्रालय के अन्य विभागों का अहम रोल देखा गया है।