Air Quality Index: वायु प्रदूषण से बचना है तो पहले जान लें कि हवा ‘खराब’ है या ‘बहुत खराब’, तब निकलें घर से बाहर
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विस्तार
दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषण के बेकाबू हालात के बीच आज सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई। सुप्रीम कोर्ट की सख्ती के बाद वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (सीएक्यूएम) ने दिल्ली और उसके पड़ोसी राज्यों के साथ बैठक कर मंगलवार देर रात प्रदूषण से निपटने के आपात उपायों की घोषणा की। बैठक में उत्तर प्रदेश, दिल्ली, पंजाब, हरियाणा और राजस्थान के शीर्ष अधिकारी शामिल हुए। दिल्ली-एनसीआर के सभी राज्यों को 21 नवंबर तक अपने दफ्तरों में 50 प्रतिशत कर्मचारियों की उपस्थिति के साथ काम करने के लिए कहा है।
इसके अलावा अगले आदेश तक सभी स्कूल बंद रहेंगे। एनसीआर के सभी राज्यों के मुख्य सचिवों को इन उपायों की निगरानी की जिम्मेदारी सौंपी गई है। वहीं, पंजाब ने बताया कि उसने पराली जलाने वाले किसानों पर 15 हजार रुपये तक का जुर्माना लगाया है। दिल्ली के 300 किमी के दायरे में आने वाले 11 तापीय बिजली संयंत्रों में से छह को 30 नवंबर तक बंद करने का आदेश दिया गया है
मौसम वैज्ञानिक आर के जेनामानी ने एक न्यूज चैनल को बताया कि दिसंबर में जब पराली जलाना बंद हो जाएगा उस समय भी हवा की गुणवत्ता खतरनाक श्रेणी में पहुंच सकती है। उनके मुताबिक हवा का रुख नॉर्थ वेस्ट यानी पंजाब-हरियाणा से दिल्ली की ओर है। ऐसे में फिलहाल दिल्ली-एनसीआर से प्रदूषण कम होने की संभावना कम दिखाई दे रही है। लिहाजा लोगों को सतर्कता बरतने की जरूरत है।
क्या है एयर क्वालिटी इंडेक्स
एयर क्वालिटी इंडेक्स या वायु गुणवत्ता सूचकांक (एक्यूआई) दैनिक आधार पर वायु गुणवत्ता की रिपोर्ट करने के लिए एक सूचकांक है। AQI का उद्देश्य लोगों को यह जानने में मदद करना है कि स्थानीय वायु गुणवत्ता उनके स्वास्थ्य को कैसे प्रभावित करती है। सार्वजनिक स्वास्थ्य की सुरक्षा के लिए देश में राष्ट्रीय वायु गुणवत्ता सूचकांक 17 सितंबर, 2014 को स्वच्छ भारत अभियान के तहत दिल्ली में शुरू किया गया था।
यह एक ऐसा मानक है जो लोगों को वायु की गुणवत्ता की स्थिति के बारे में बताता है। साथ ही यह जानकारी भी मिलती है कि वायु में नाइट्रोजन डाइऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड और सल्फर डाइऑक्साइड की मात्रा विश्व स्वास्थ्य संगठन की ओर से तय किए गए मापदंड से अधिक है या नहीं।
पर्यावरण संरक्षण एजेंसी (ईपीए) इन पांच प्रमुख वायु प्रदूषकों के लिए एक्यूआई की गणना करती है।
1. जमीनी स्तर ओजोन- जहां सफाई के कार्य होते हैं वहां यह पैदा होती है। यह एक खास तीखी गंध वाली पीली नीली गैस होती है।
2. कण प्रदूषण/पार्टिकुलेट मैटर (PM2.5/pm 10)- दिल्ली में 2.5 से 10 माइक्रोन प्रदूषण के लिए मुख्य तौर पर जिम्मेदार हैं। ये कण बहुत छोटे होते हैं।
3. कार्बन मोनोऑक्साइड- यह जहरीली गैस वाहनों में ईंधन जलने और उनके इंजन चलने से उत्सर्जित होती है।
4. सल्फर डाइऑक्साइड- मुख्य रूप से ईंधन के जलने, बिजली से चलने वाले यंत्र और औद्योगिक प्रक्रिया से पैदा होती है और वायु प्रदूषण के लिए जिम्मेदार है।
5. नाइट्रोजन ऑक्साइड- यह लकड़ी और ईंधन जलाने से पैदा होता है।
एक्यूआई मान जितना अधिक होता है, वायु प्रदूषण का स्तर उतना ही अधिक माना जाता है और स्वास्थ्य संबंधी चिंताएं भी उतनी ही अधिक रहती हैं। पिछले तीन दशकों में कई विकसित देशों में एक्यूआई की अवधारणा का व्यापक रूप से उपयोग किया जा रहा है, जो वास्तविक समय में वायु गुणवत्ता की जानकारी तुरंत देता है।
AQI की गणना कैसे की जाती है?
विभिन्न देश वायु गुणवत्ता की रिपोर्ट करने के लिए विभिन्न बिंदु पैमानों का उपयोग करते हैं। उदाहरण के लिए, अमेरिका 500 अंक के पैमाने का उपयोग करता है, जिसमें 0 और 50 के बीच की रेटिंग को अच्छा माना जाता है। 301 से 500 रेंज के बीच की रेटिंग खतरनाक मानी जाती है। भारत भी 500 अंक के रेटिंग का अनुसरण करता है। हर दिन प्रमुख प्रदूषकों की रिकॉर्ड सांद्रता पर नजर रखी जाती है।
वायु गुणवत्ता सूचकांक की छह कैटेगरी
हवा की गुणवत्ता के आधार पर इस इंडेक्स में छह केटेगरी बनायीं गयीं हैं। जैसे अच्छी, संतोषजनक, मध्यम रूप से प्रदूषित, खराब, बहुत खराब और गंभीर। जैसे- जैसे हवा की गुणवत्ता खराब होती जाती है वैसे ही रैंकिंग अच्छी से खराब और फिर गंभीर की श्रेणी में पहुंच जाती है। मौजूदा समय में दिल्ली में औसत वायु गुणवत्ता सूचकांक 450 से ऊपर दर्ज किया जा रहा है जो एक स्वस्थ शरीर को बीमार करने के लिए काफी खतरनाक है और शरीर को अंदर ही अंदर खोखला तक कर सकता है।
अच्छा (0-50) - न्यूनतम प्रभाव
संतोषजनक (51-100) - संवेदनशील लोगों में सांस लेने में मामूली कठिनाई हो सकती है।
मध्यम रूप से प्रदूषित (101-200) - अस्थमा जैसे फेफड़ों की बीमारी वाले लोगों में सांस लेने में कठिनाई हो सकती है, और हृदय रोग वाले लोगों, बच्चों और बड़े वयस्कों को परेशानी हो सकती है।
खराब (201-300) - लंबे समय तक संपर्क में रहने वाले लोगों में सांस लेने में कठिनाई और हृदय रोग वाले लोगों को परेशानी हो सकती है
बहुत खराब (301-400) - लंबे समय तक ‘बहुत खराब हवा’ के संपर्क में रहने वाले लोगों में सांस की बीमारी हो सकती है। फेफड़े और हृदय रोग वाले लोग ज्यादा प्रभावित हो सकते हैं।
गंभीर- (401 से 500 के बीच) गंभीर रूप से बीमार पड़ने का खतरा होता है, लोगों को बाहर न निकलने की सलाह जी जाती है
डॉक्टरों का कहना है कि दमघोंटू या जहरीली हवा न केवल उन लोगों के लिए स्वास्थ्य का जोखिम बढ़ा देता है जो सांस संबंधी बीमारियों से पीड़ित हैं बल्कि यह किसी सेहतमंद आदमी को भी अपनी चपेट में ले सकता है। प्रदूषण का खतरनाक स्तर एक सेहतमंद इंसान के रोग प्रतिरोधक क्षमता को भी घटा देता है।
ग्लोबल बर्डन ऑफ डिजीज की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में 2019 में वायु प्रदूषण मौत के प्रमुख कारणों में एक था। एक अनुमान के मुताबिक 2019 में वायु प्रदूषण से 16 लाख 70 हजार लोगों की मौत हुई। लिहाजा वायु प्रदूषण के दैनिक स्तरों के बारे में जागरूकता महत्वपूर्ण है, खासकर उन लोगों के लिए जो वायु प्रदूषण के संपर्क में आने से होने वाली बीमारियों से पीड़ित हैं। यह बीमार लोगों के लिए एक अलार्म की तरह है।
वायु गुणवत्ता सूचकांक के उद्देश्य क्या हैं
विभिन्न स्थानों/शहरों में वायु गुणवत्ता की स्थिति की तुलना की जा सकती है।
यह दोषपूर्ण मानकों और अपर्याप्त निगरानी कार्यक्रमों की पहचान करने में भी मदद करता है।
हवा की गुणवत्ता में बदलाव (सुधार या गिरावट) का विश्लेषण करने में मदद मिलती है।
वायु गुणवत्ता सूचकांक से पर्यावरण की स्थिति के बारे में आम आदमी को सूचना मिलती है।
डॉक्टरों के मुताबिक प्रदूषण के खतरे को समझना जरूरी है क्योंकि मानव शरीर पर इसके दुष्प्रभाव पड़ते हैं। फेफड़े की कोशिकाओं को नुकसान पहुंचता है और रोग प्रतिरोधक क्षमता घटने लगती है। वायु प्रदूषण से यह आंख, नाक, गला, फेफड़ा, ह्दय, लीवर, किडनी, रक्त और त्वचा को नुकसान पहुंचत सकता है।
वायु प्रदूषण से सबसे ज्यादा खतरा अस्थमा, क्रोनिक ब्रोंकाइटिस और फेफड़ों की बीमारियों वाले लोगों को है। किशोरों सहित छोटे बच्चे, सभी उम्र के सक्रिय लोग जो बाहर व्यायाम करते हैं या खुली जगह में काम करते हैं, वायु प्रदूषण उनके लिए भी बहुत नुकसानदेह है।