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बैंक और ऑडिटर की मिलीभगत से हुआ PNB Scam! RBI ने बनाई समिति

Fri, 23 Feb 2018 03:11 AM IST
शरद गुप्ता, अगर उजाला, नई दिल्ली
शरद गुप्ता, अगर उजाला, नई दिल्ली Updated Fri, 23 Feb 2018 03:11 AM IST
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PNB scam from collusion of bank and auditor, RBI formed committee

क्या ऐसा संभव है कि किसी परीक्षार्थी को अपना परीक्षक चुनने की छूट दे दी जाए और बाद में शिकायत की जाए कि परीक्षा में अनियमितता हुई है? सरकारी बैंकों के ऑडिट में एकदम यही हो रहा है। उन्हें न सिर्फ अपना ऑडिटर चुनने की आजादी है बल्कि उसके काम के समीक्षा करने की भी। ऐसा न होता तो शायद 2011 से चल रहा पीएनबी का नीरव मोदी घोटाला शायद काफी पहले ही पकड़ में आ जाता। यह प्रणाली छह-सात साल पहले बदली। इससे पहले भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) सार्वजनिक क्षेत्र के हर बैंक के लिए खुद ऑडिटर नामित करता था।

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बैंक को अपना ऑडिटर चुनने की आजादी

आरबीआई ने प्रक्रिया की समीक्षा के लिए बनाई समिति


अब आरबीआई चार्टर्ड अकाउंटेंट्स (सीए) का एक पैनल बनाकर सभी सरकारी बैंकों को भेज देता है। मार्च के अंतिम सप्ताह में ये बैंक अपनी शाखाओं के ऑडिट के लिए इस पैनल से ऑडिटर चुन लेते हैं। अप्रैल के पहले सप्ताह में ऑडिटर को अपनी जांच रिपोर्ट बैंक को जमा करनी होती है। चार्टर्ड अकाउंटेंट्स का मानना है कि इस प्रक्रिया में कई छिद्र हैं जिनका फायदा बैंक अफसर और ऑडिटर दोनों ही उठा रहे हैं। खुद केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली ने मंगलवार को पीएनबी घोटाले के लिए चंद बैंक अफसरों और ऑडिटरों को दोषी बताया था। उन्होंने कहा था, बैंक प्रबंधन और ऑडिटर अपने गिरेबान में झांके कि वे कई सालों से चल रहे घोटाले का क्यों नहीं पकड़ पाए।
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प्रक्रिया में ये हैं खामी

कई ऑडिटर बैंक अफसरों के साथ लॉबी कर बड़ी शाखाओं का काम लेते हैं जिनकी फीस ज्यादा है। वे ऑडिट में बैंक की अकाउंटिंग की गड़बड़ियों को छिपा कर बैंक अफसरों के मन मुताबिक रिपोर्ट बना देते हैं। ऐसे में सख्त मिजाज सीए को कोई काम ही नहीं देना चाहता और अगर देना ही हो तो छोटी-मोटी शाखा का ऑडिट दे दिया जाता है।
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ये है प्रक्रिया

नियमानुसार एक सीए की स्वामित्व वाली कंपनी को छोटी शाखा का ऑडिट दिया जाता है। एक वर्ष में उसे केवल दो शाखाओं का ऑडिट सौंपा जा सकता है। दो सीए की पार्टनरशिप फ र्म के उससे बड़ी 4-5 शाखाओं का ऑडिट दिया जाता है। इस प्रकार सीए की पांच कैटेगरी हैं जिन्हें उनके आकार, अनुभव और दक्षता के अनुरूप सैकड़ों शाखाओं का ऑडिट सौंपा जा सकता है।

फीस और कूलिंग ऑफ

उनकी फीस भी बैंक ही निर्धारित करते हैं जो पचास हजार रुपये से शुरू हो कई करोड़ तक जाती है। दिल्ली, मुंबई जैसे बड़े शहरों में बैंक शाखाओं के मुकाबले सीए की संख्या ज्यादा होने की वजह से उन्हें हर चार साल के बाद दो साल का कूलिंग ऑफ पीरियड दिया जाता है।

किसका होगा ऑडिट

ऑडिट केवल उसी शाखा का हो सकता है जिसने कम से कम 100 करोड़ रुपये का कर्ज दे रखा हो। 2014 से पहले यह सीमा केवल तीन करोड़ की थी हालांकि अब बैंक चाहते हैं कि कम से कम 200 करोड़ के कर्ज वाली शाखा का ही ऑडिट हो।


जांच समिति बनाई

रिजर्व बैंक के एक वरिष्ठ अफसर से प्रक्रिया में बदलाव की वजह पूछने पर उन्होंने कहा कि हम बैंकों को काम करने की स्वतंत्रता देते हुए उन्हें और जिम्मेदार बनाना चाहते थे। लेकिन नहीं मालूम था कि इसका दुरुपयोग होगा। यही वजह है कि हमने कल आरबीआई के पूर्व निदेशक एचवाइ मालेगम के नेतृत्व में पांच सदस्यीय समिति बनाई है जो बैंकों की प्रबंधन, ऑडिट और निगरानी प्रक्रिया की समीक्षा कर अपनी रिपोर्ट सौंपेगी। हालांकि अभी रिपोर्ट जमा करने की तारीख नहीं बताई गई है। कमेटी में केनरा बैंक के पूर्व सीएमडी को छोड़ कर अन्य सभी सदस्य आरबीआई के पूर्व निदेशक ही हैं। 
 

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