सफाईकर्मियों के पैर धोकर जातिवादी राजनीति पर बड़ी चोट कर गए प्रधानमंत्री मोदी
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‘जातिवाद’ वर्तमान भारत की सबसे बड़ी समस्याओं में से एक है। सभी विशेषज्ञ इसे भारत के समग्र विकास में सबसे बड़ी बाधा मानते हैं। लेकिन भारतीय राजनीति का कड़वा सच यही है कि हर दल की चुनावी राजनीति के केंद्र में जाति प्रमुख भूमिका निभाती है। उम्मीदवारों के चयन से लेकर संसद में कानून बनाने तक राजनीतिक दलों की भूमिका उनके वोटरों के जातीय समीकरण साधने की कोशिश करती हुई दिखती है।
ऐसे में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार को प्रयागराज में सफाईकर्मियों के पैर धुले, और उन्हें सच्चा ‘कर्मयोगी’ बताया, तो इसकी व्याख्या भी अलग-अलग दृष्टिकोण से होने लगी। कुछ लोगों ने पीएम के इस कदम को 2019 के चुनाव से जोड़कर देखा तो कुछ ने इसे उनकी सामाजिक समरसता और कर्म को प्रधानता देने वाली सोच का परिणाम बताया। ऐसे में यह देखना ज्यादा जरूरी है कि क्या सच में भारतीय समाज में जातिगत बंधन कमजोर पड़ रहे हैं? और क्या प्रधानमंत्री का सफाईकर्मियों का पैर धुलना किसी बड़े सामाजिक बदलाव की तरफ इशारा कर रहा है?
अनुसूचित जाति के युवकों का उपनयन, पुजारी के रूप में नियुक्ति
जातिवाद कमजोर पड़ रहा है या नहीं, इसे मापने का पैमाना क्या होना चाहिए? क्या जाति के आधार पर समाज में छुआछूत कमजोर पड़ी है? क्या सभी अवसरों पर सभी वर्गों को एक समान अवसर मिल रहे हैं? विश्व हिंदू परिषद के केरल प्रांत प्रमुख वेंकटेश्वर अमर उजाला से कहते हैं कि हिंदू समाज में जाति व्यवस्था तेजी से कमजोर पड़ रही है। दलित समाज की सबसे बड़ी शिकायत यही थी कि उन्हें मंदिरों में प्रवेश नहीं मिलता, और मंदिरों के पुजारियों में एक जाति का वर्चस्व रहता है।
इस पर वेंकटेश्वर बताते हैं कि अब हालात बहुत बदल गए हैं। विहिप अकेले केरल प्रांत में हर साल दो से तीन सौ पुजारियों को प्रशिक्षित करता है। सनातन धर्म के अनुसार दिए जाने वाले इस प्रशिक्षण में सामान्य जाति के आलावा एससी, एसटी और ओबीसी समुदाय के युवक होते हैं। सबसे पहले सभी युवकों का उपनयन संस्कार होता है। इसके बाद उन्हें प्रशिक्षित कर मंदिरों में पुजारी के रूप में नियुक्त किया जाता है। इसके बदले में उन्हें प्रतिमाह वेतन भी मिलता है।
इसी प्रकार तमिलनाडु, ओडिशा और अन्य दक्षिणी राज्यों में भी प्रयास हो रहा है और उसका सकारात्मक परिणाम भी मिल रहा है। हालांकि, वेंकटेश्वर इस बात पर निराशा भी जताते हैं कि कुछ राजनीतिक दल अपने वोट बैंक की लालच में जातिवाद को बढ़ावा देते रहते हैं जो सामाजिक विघटन को बढ़ावा देता है। अगर राजनीतिक दलों का साथ मिलता तो जाति व्यवस्था को कमजोर करने में बड़ी मदद मिलती।
‘मनुवाद इतिहास की बात’
विहिप के अंतरराष्ट्रीय जॉइंट जनरल सेकेट्री सुरेंद्र जैन ने इस मुद्दे पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि भारतीय समाज ने मनुवाद और ब्राह्मणवाद की सोच को बहुत पीछे छोड़ दिया है। लेकिन कुछ राजनीतिक दल मनुवाद के 'भूत' को जिंदा रखने की कोशिश कर रहे हैं क्योंकि उनकी राजनीति को यही सूट करता है।
उन्हें लगता है कि बिना विकास किए सिर्फ जातिवाद के सहारे उनकी राजनीति चलती रहेगी। लेकिन अब उन्हें यह समझना चाहिए कि अब जातिवादी राजनीति से काम नहीं चलेगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने काम को सम्मान देने की जो परंपरा शुरू की है, उसमें सभी जातिगत समीकरण ध्वस्त हो जाएंगे। उनके मुताबिक अब केवल राष्ट्रवाद और विकास की राजनीति होनी चाहिए। यही देश-दुनिया और हर समाज के हित में है।
दलित समाज के कुछ लोगों पर हुए हमलों पर उनकी क्या प्रतिक्रिया है, यह पूछने पर जैन कहते हैं कि जिस अनुसूचित जाति के समुदाय को अलग करके दिखाने की कोशिश की जाती है, सच्चाई यह है कि विहिप के अनेक कार्यक्रमों को आगे बढ़ाने में सबसे बड़ी भूमिका यही दलित युवक निभाते हैं। जैन उन्हें ‘सच्चे हिंदू’ बताते हैं। उन्होंने कहा कि कुछ लोगों की 'विकृत सोच' को हिंदू समाज की सोच नहीं बताया जा सकता।
‘कुंभ स्नान के पहले किसकी जाति पूछी गई?’
आरएसएस के प्रवक्ता राजीव तुली कहते हैं कि इस समय प्रयागराज में हिंदुओं का सना बता सकते हैं जहां स्नान करने वालों से उनकी जाति पूछी गई, या जाति के आधार पबसे बड़ा पर्व कुंभ चल रहा है। अब तक कुंभ में लगभग 22 करोड़ लोगों के स्नान करने की खबर है। उन्होंने पूछा, क्या आप एक भी ऐसी घटर कुंभ स्नान करने वालों से भेदभाव किया गया?
अगर नहीं तो फिर ये कैसे कहा जा सकता है कि हिंदू धर्म में जातिवाद भारी है? राजीव तुली कहते हैं कि हिंदू धर्म में जाति का प्रभाव नहीं रहा। यह केवल कुछ राजनीतिक दलों की वोट की फसल काटने की साजिश है जो अब बेपर्दा हो रही है। आने वाले समय में यह सोच जल्दी ही खत्म हो जाएगी।
आरएसएस के एक अन्य प्रमुख पदाधिकारी का कहना है कि जातिगत सोच से पहले तो हिंदुत्व कमजोर पड़ता है, उसके बाद यह पूरे राष्ट्र को खोखला करता है। ऐसे में आरएसएस का हमेशा से यह प्रयास रहा है कि हिंदु समाज खुद को सिर्फ हिंदु और भारतीय की दृष्टि से देखे, जातिगत दृष्टि से नहीं। इसके लिए उनके अनुषांगिक संगठनों के माध्यम से अनेक कार्यक्रम हमेशा चलाए जाते रहे हैं। और इसके काफी सकारात्मक परिणाम भी देखने को मिले हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का स्वच्छताकर्मियों का सम्मान यही संदेश देता है कि अब व्यक्ति को उसके कार्य के लिए सम्मानित किया जाना चाहिए।
इस राजनीति से कमजोर होगी जातिगत सोच
भाजपा प्रवक्ता सुदेश वर्मा कहते हैं कि प्रधानमंत्री के इस कदम को बड़े अर्थों में समझने की कोशिश होनी चाहिये। मंडल युग की शुरूआत के साथ ही एक जाति को दूसरी जाति के खिलाफ खड़ा कर दिया गया। लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गरीब सवर्णों को दस फीसदी आरक्षण देकर सबको आरक्षण के दायरे में ला दिया। इससे जातिगत वैमनस्यता में कमी आएगी क्योंकि अब सबको आरक्षण मिल रहा है और कोई किसी दूसरे पर आरोप नहीं लगा सकता।
सुदेश कहते हैं कि नरेंद्र मोदी की राजनीति एक सरकार और एक नागरिक के संबंध के रूप में देखी जानी चाहिए क्योंकि व्यक्ति चाहे जिस समाज का हो, उसे अपने बच्चों के लिए स्कूल, भोजन और निवास चाहिए। अगर सरकार सबके लिए इसी तरह की योजना लाती है और सबको उसका लाभ मिलता है तो इससे सामाजिक भेदभाव कमजोर पड़ेंगे और समाज जातिगत राजनीति को नकारेगा। पीएम की राजनीति इसी दिशा में आगे बढ़ रही है।
पीएम ने खींची बड़ी लकीर
आरएसएस, भाजपा और नरेंद्र मोदी की नीतियों के कट्टर आलोचक दलित नेता अशोक भारती का कहना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सफाईकर्मियों के पैर धुलकर राजनीति में एक बड़ी लकीर खींची है। यह ब्राह्मणवाद और जातिवाद को पीछे छोड़ने वाला कदम है। इसका स्वागत किया जाना चाहिए। अंबेडकरवादी अशोक भारती ने कहा, लेकिन जब तक समाज के सभी वर्गों में रोटी-बेटी का संबंध स्थापित नहीं होता, जातिवाद का पूर्ण खात्मा संभव नहीं है। हालांकि वे स्वीकारते हैं कि समाज में यह बदलाव आने में अभी लंबा समय लगेगा।