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जब पीएम मोदी ने कहा था, हिंदी न आती तो मैं कभी देश का प्रधानमंत्री नहीं बन पाता

Mon, 03 Jun 2019 08:39 PM IST
Amit Digital अमित शर्मा, नई दिल्ली
अमित शर्मा, नई दिल्ली Published by: Amit Digital Updated Mon, 03 Jun 2019 08:39 PM IST
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PM Modi had said that if i did not know Hindi, I would never be the Prime Minister of the country
पीएम मोदी (फाइल फोटो) - फोटो : सोशल मीडिया

वर्ष 2015 में भोपाल में विश्व हिंदी सम्मेलन का आयोजन हुआ था। इस कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी आमंत्रित किया गया था। पीएम मोदी ने कार्यक्रम में दिए अपने भाषण में कहा था कि अगर उन्हें हिंदी नहीं आती होती तो वे कभी इस देश के प्रधानमंत्री नहीं बन पाते। इस कार्यक्रम में एक हिंदी विद्वान के रूप में शामिल रहे व्यंगकार आलोक पुराणिक के मुताबिक हिंदी की ताकत को बयान करने के लिए इससे बेहतर उदाहरण हाल के समय में नहीं मिल सकता।

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उन्होंने कहा कि दक्षिणी राज्यों में हिंदी का विरोध राजनीतिक कारणों से ज्यादा होता है, जबकि जमीनी सच्चाई यह है कि बाजार में हिंदी की मजबूती के कारण वहां के लोग स्वयं अपने बच्चों को हिंदी की शिक्षा देते हैं। अगर बच्चे को उत्तर भारतीय राज्यों में सफल होना है तो हिंदी उसकी मजबूरी बन जाती है। यही कारण है कि आज तमिलनाडु और केरल सहित अनेक दक्षिण भारतीय राज्यों के अच्छे पब्लिक स्कूलों में भी हिंदी पढ़ाई जाती है।
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प्रसिद्ध व्यंगकार आलोक पुराणिक ने अमर उजाला से कहा कि हिंदी को आगे बढ़ाने के लिए किसी राजनैतिक बैसाखी की जरुरत नहीं है। उसमें स्वयं यह ताकत है कि वह दूसरों को इसे पढ़ने के लिए मजबूर कर दे। ऐसे में सरकार को किसी भी राज्य पर इसे थोपने की जरूरत नहीं है। इसका अध्ययन वैकल्पिक कर दिया जाना चाहिए। बच्चों में विकास को ध्यान में रखते हुए उसकी मातृभाषा, एक संपर्क भाषा और एक अन्य भाषा पढ़ने का विकल्प दिया जाना चाहिए।
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'उत्तर भारत में भी लागू हो त्रिभाषा फॉर्मूला'

हिंदी विद्वान सुभाष चंदर ने कहा कि दक्षिण भारत में हिंदी के विरोध की बड़ी वजह यह है कि वे इसे अपने ऊपर सांस्कृतिक हमले की तरह देखते हैं। इसलिए उनका विश्वास जीतना सबसे पहली प्राथमिकता होनी चाहिए। उनके मुताबिक त्रिभाषा फार्मूला सिर्फ दक्षिणी राज्यों पर ही नहीं लागू किया जाना चाहिए, बल्कि इसे उत्तर भारतीय राज्यों में भी लागू किया जाना चाहिए और यहां भी दक्षिण भारतीय भाषाओं को पढ़ाया जाना चाहिए। इससे एक तो हिंदी का विरोध खत्म हो जाएगा, दूसरे इससे हिंदी का साहित्य भी समृद्ध होगा। 

उन्होंने कहा कि दक्षिण भारत के जो राजनेता-फिल्मकार हिंदी का विरोध करते हैं वे स्वयं अपने बच्चों को हिंदी जरूर पढ़वाते हैं क्योंकि उन्हें मालूम है कि बॉलीवुड में सफल होने के लिए हिंदी जानना बेहद जरूरी है। कमल हासन इसके सबसे बड़े उदाहरण हैं जो स्वयं हिंदी जानते हैं, अपनी बेटी श्रुति हसन को भी हिंदी सिखाते हैं क्योंकि उसे हिंदी फिल्मों में सफल होना है, लेकिन यही कमल हासन तब हिंदी का विरोध करते दिख जाते हैं जब वे राजनीतिक जमीन पर बात कर रहे होते हैं।

'रोजगार से जोड़े बिना मजबूत नहीं होगी हिंदी'

जबकि, हिंदी विद्वान संतोष त्रिवेदी का कहना है कि किसी भी भाषा को मजबूत बनाने के लिए उसे रोजगार से जोड़ना बेहद जरूरी है। बिना रोजगार से जोड़े कोई भी भाषा ज्यादा समय तक संजोई नहीं जा सकती, चाहे वह संस्कृत हो या हिंदी, उर्दू या पंजाबी। उन्होंने कहा कि आज जमाना बहुराष्ट्रीय कंपनियों का है। 


यहां उम्मीदवारों के चयन में कंपनियां ध्यान रखती हैं कि उसे हिंदी, अंग्रेजी के साथ एक स्थानीय भाषा भी आनी चाहिए क्योंकि उनका माल बेचने के लिए ग्राहकों को आकर्षित करने में स्थानीय भाषा जितनी कारगर हो सकती है, कोई दूसरी भाषा नहीं हो सकती। उन्होंने कहा कि सरकारी पदों पर भी हिंदी को वरीयता देने से इसको मजबूती मिलेगी।

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