पेगासस जासूसी मामला : सुप्रीम कोर्ट ने कहा- केंद्र रुख स्पष्ट करता तो अलग होती स्थिति, हमें राजनीतिक दलदल में नहीं पड़ना
पेगासस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अपना आदेश की शुरूआत बिहार के मोतिहारी में जन्मे अंग्रेज लेखक जॉर्ज ऑर्वेल के कथन ‘आप कोई राज रखना चाहते हैं तो उसे खुद से भी छिपाकर रखिए’ से की। कोर्ट ने कहा कि वह नागरिकों के मूल अधिकारों का हनन रोकने से पीछे भी नहीं रहेगा। याचिकाकर्ताओं ने कुछ ऐसी सामग्री को रिकॉर्ड पर रखा जो प्रथमदृष्टया विचार करने योग्य हैं।
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विस्तार
पेगासस मामले में केंद्र सरकार की दलील पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सरकार को मांगी गई जानकारी गुप्त रखे जाने का तर्क साबित करना चाहिए कि इसके खुलासे से राष्ट्रीय सुरक्षा पर असर पड़ेगा।उसे अदालत के सामने रखे जाने वाले पक्ष को भी सही ठहराना चाहिए। शीर्ष अदालत ने कहा, अगर केंद्र सरकार 16 अगस्त को एक सीमित हलफनामा दाखिल करने के बजाय इस मामले में अपना रुख स्पष्ट कर देती तो यह एक अलग स्थिति होती।
पीठ ने कहा कि याचिकाकर्ताओं ने कुछ ऐसी सामग्री को रिकॉर्ड पर रखा है जो प्रथमदृष्टया सर्वोच्च न्यायालय द्वारा विचार करने योग्य हैं। पीठ ने कहा कि यह देखते हुए कि आरोपों पर केंद्र ने कोई खंडन नहीं किया इसलिए हमारे पास याचिकाकर्ताओं द्वारा लगाए गए आरोपों की जांच की मांग को स्वीकार करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। शीर्ष अदालत ने 13 सितंबर को इस मामले में अपना आदेश सुरक्षित रख लिया था क्योंकि केंद्र सरकार ने कहा था कि वह यह सार्वजनिक नहीं कर सकती कि उसकी एजेंसियों ने इस्राइल के स्पाइवेयर का इस्तेमाल किया है या नहीं, क्योंकि इस तरह का खुलासा राष्ट्रीय हित के खिलाफ होगा।
सियासी शोर-शराबे से प्रभावित हुए बिना कानून का शासन बनाए रखने की कोशिश
पेगासस जासूसी कांड में विशेषज्ञ समिति नियुक्त करने वाली सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में बुधवार को कहा कि उसकी कोशिश राजनीतिक शोर-शराबे से प्रभावित हुए बगैर कानून का शासन बनाए रखना है। वह तकनीक के उपयोग, जरूरत और दुरुपयोग के आरोपों का विश्लेषण कर रही है। संविधान की आकांक्षाओं को यथावत रखने की कोशिश भी कर रही है, क्योंकि जासूसी मामले में दायर याचिकाएं ऑर्वेलियन चिंता जताती हैं।
‘अगर आप कोई राज रखना चाहते हैं तो उसे खुद से भी छिपाकर रखिए’, मुख्य न्यायाधीश जस्टिस एनवी रमण, जस्टिस सूर्य कांत और जस्टिस हिमा कोहली ने आदेश बिहार के मोतिहारी में जन्मे अंग्रेज उपन्यासकार जॉर्ज ऑर्वेल के उपन्यास 1984 के इस कथन से शुरू किया। उन्हाेंने कहा, याचिकाएं ऑर्वेलियन चिंताएं जताती हैं। ऑर्वेलियन यानी सर्वसत्तावादी सरकार का प्रॉपेगैंडा, कड़ी निगरानी, भ्रामक सूचनाओं, झूठ व ऐतिहासिक व्यक्तित्वों की साख बिगाड़कर व नाम दबाकर नागरिकों पर शासन करना।
ऑर्वेल ने इसे स्वतंत्र व खुले समाज के लिए हानिकारक बताया था। कोर्ट ने कहा, अदालत हमेशा सजग रही है कि वह सियासी दलदल में नहीं फंसे, लेकिन नागरिकों के मूल अधिकारों का शोषण रोकने से भी पीछे नहीं हटी है। कोर्ट की समिति पूरी तरह से स्वतंत्र है। न्याय होना जरूरी है और न्याय होते दिखना भी जरूरी है। निजता के अधिकार की रक्षा हर कोई चाहता है। तकनीक का इस्तेमाल जनहित में किया जाना चाहिए।
निजता है तो विकल्प चुनने की क्षमता और आजादी है
- सुप्रीम कोर्ट ने कहा, हम सूचना क्रांति युग में जी रहे हैं। व्यक्ति का समस्त जीवन क्लाउड स्टोरेज या किसी डिजिटल फाइल में सुरक्षित रखे जा सकते हैं। हमें समझना होगा कि तकनीक जहां जीवन सुधार रही है, हमारी निजता भी भंग कर सकती है। केवल पत्रकार या सामाजिक कार्यकर्ता ही नहीं, एक लोकतांत्रिक सभ्य समाज के सभी सदस्य निजता अक्षुण्ण रखना चाहते हैं। इसी के बल पर हम विकल्प चुनने की क्षमता व स्वतंत्रता का उपयोग कर सकते हैं।
- सुप्रीम कोर्ट ने अमेरिका व इंग्लैंड में निजता अधिकारों का उल्लेख करते हुए कहा कि वहां इसे लोगों के बजाय संपत्ति केंद्रित रखा गया। ऐतिहासिक सेमेन केस में कहा गया ‘हर व्यक्ति का घर उसका किला है।’ इसी के बल पर लोगों की गैर-कानूनी तलाशी रोकने का कानून बना।
गरीब की झोपड़ी में बारिश का पानी आ सकता है, राजा नहीं
ब्रिटिश राजनीतिज्ञ विलियम पिट के कथन का उल्लेख कर सुप्रीम कोर्ट ने कहा, ‘सबसे गरीब आदमी अपनी झोपड़ी में रहकर भी बादशाह की समस्त शक्तियों की अवज्ञा कर सकता है। उसकी छत कच्ची हो सकती है, तूफानी हवा उसे थरथरा सकती है, बारिश का पानी भीतर आ सकता है, लेकिन इंग्लैंड का राजा भीतर नहीं आ सकता। घर चाहे खंडहर हो जाए, राजा की समस्त सेना उसकी दहलीज लांघ भीतर नहीं आ सकती। यही कानून है।’
जीवन व निजता आपस में जुड़े हैं
सुप्रीम कोर्ट ने कई उदाहरणों के परिप्रेक्ष्य में कहा, भारत में निजता के अधिकार जीवन के अधिकार से जुड़े हैं। हमारे संविधान ने जीवन के अधिकार को रूढ़िवादियों की तरह सीमित न रखकर इसे विस्तृत परिभाषा दी है। इसमें जीवन का ऊंचा स्तर भी समाहित है, इसे पशु की भांति केवल अस्तित्व बनाए रखने की तरह नहीं देखा गया।
सिफारिश : राष्ट्रीय साइबर सुरक्षा व जांच एजेंसी बनाने पर मांगे सुझाव
- कानून निर्माण व सुधार : समिति अपनी सिफारिशें निगरानी से जुड़े नए कानून बनाने या मौजूदा कानूनों में सुधार व संशोधन के लिए दे सकती है। इससे निजता के अधिकार को और पुख्ता किया जा सकेगा। देश की सुरक्षा खासतौर से साइबर मामलों में बेहतर होगी।
- निजता की सुरक्षा : नागरिकों की निजता में घुसपैठ रोकने के लिए सिफारिशें देगी। गैरकानूनी जासूसी के खिलाफ शिकायत दर्ज करवाने की व्यवस्था सुझाएगी।
- स्वतंत्र एजेंसी का गठन : समिति पूर्ण क्षमतायुक्त राष्ट्रीय एजेंसी की स्थापना पर सिफारिश देगी। एजेंसी साइबर सुरक्षा से जुड़ी खामियों व कमजोरियों की जांच करेगी। साइबर हमलों व खतरों की पहचान व जांच करेगी।
- तात्कालिक उपाय : तात्कालिक उपाय सुझाएगी, जो नागरिक अधिकारों को सुरक्षित रख सके।
कब क्या हुआ
- 18 जुलाई : इस्राइली कंपनी के बनाए सैन्य-स्तर के स्पाईवेयर (जासूसी सॉफ्टवेयर) पेगासस से भारत सहित कई देशों में जासूसी का खुलासा।
- 22 जुलाई : सुप्रीम कोर्ट में अपनी निगरानी में एसआईटी बनाने की याचिका दायर की।
- 27 जुलाई : पत्रकार एन राम और शशि कुमार ने भी सुप्रीम कोर्ट में स्वतंत्र जांच करवाने की याचिका दी।
- 5 अगस्त : कोर्ट ने याचिका पर सुनवाई शुरू की।
- 16 अगस्त : सरकार ने संक्षिप्त हलफनामे में आरोपों, अनुमानों को अपुष्ट मीडिया रिपोर्ट पर आधारित बताया।
- 17 अगस्त : याचिकाओं पर केंद्र को नोटिस जारी।
- 13 सितंबर : कोर्ट ने निर्णय सुरक्षित किया।
इनकी निगरानी में होगी जांच
- जस्टिस आरवी रवींद्रन: अंबानी मामले में सुनवाई से खुद को अलग किया क्योंकि मुकेश अंबानी को सलाह देने वाली फर्म में उनकी बेटी काम करती थी
- सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जस्टिस राजू वरदराजुलु रवींद्रन ने मार्च 1968 में वकील के तौर पर कॅरिअर शुरू किया।
- 1993 में कर्नाटक हाईकोर्ट में स्थायी जज और 2004 में मध्यप्रदेश हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस बने। सितंबर 2005 में सुप्रीम कोर्ट में प्रमोट हुए। यहां अक्तूबर 2011 तक यानी करीब 6 साल सेवाएं दीं। इस दौरान केंद्रीय शिक्षण संस्थानों में ओबीसी आरक्षण का कानून बनाए रखने जैसे कई मील का पत्थर कहे जाने वाले निर्णय दिए।
- यूपी, गुजरात, हरियाणा, गोवा के राज्यपालों को राष्ट्रपति के हटाए जाने पर जनहित याचिका पर निर्णय देने वाली पांच सदस्यीय सांविधानिक पीठ में शामिल थे। पीठ ने जुलाई 2004 में निर्णय दिया कि राज्यपालों को इस आधार पर नहीं हटाया जा सकता कि वे केंद्र में सत्ताधारी राजनीतिक दल की नीतियों या विचारधारा के अनुरूप नहीं हैं।
- 2009 में जस्टिस रवींद्रन ने अंबानी बंधुओं के गैस विवाद के मुकदमे से खुद को यह कहते हुए अलग कर लिया कि उनकी बेटी ऐसी लॉ फर्म के लिए काम करती हैं, जो मुकेश अंबानी समूह को एक अन्य किसी मामले में सलाह देती है।
- बीसीसीआई में सुधार के लिए बनी आरएम लोढ़ा समिति के सदस्य रहे। 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने हादिया मामले में राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) की जांच की निगरानी सौंपी थी। इसमें एक मुस्लिम युवक से निकाह के बाद हादिया के जबरन धर्म परिवर्तन के आरोप थे। उन्होंने इस जिम्मेदारी से इनकार कर दिया।
ये अधिकारी होंगे निगरानी समिति प्रमुख के सहायक
- आलोक जोशी : 1976 बैच के आईपीएस अधिकारी (सेवानिवृत्त)। जोशी को तकनीकी क्षेत्र में गहन जानकारी रखने वाला अधिकारी माना जाता है। इंटेलिजेंस ब्यूरो के संयुक्त निदेशक रहे हैं। खुफिया एजेंसी रॉ के सचिव और नेशनल टेक्निकल रिसर्च ऑर्गेनाइजेशन में अध्यक्ष पद भी संभाल चुके हैं।
- डॉ. संदीप ओबेरॉय : अंतरराष्ट्रीय मानक संगठन, अंतरराष्ट्रीय इलेक्ट्रो-टेक्निकल कमीशन व संयुक्त तकनीकी समिति की सह समिति के अध्यक्ष। समिति सॉफ्टवेयर उत्पादों व सिस्टम के मानक तैयार करती है। दिल्ली के इंद्रप्रस्थ इंस्टीट्यूट ऑफ इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी के साइबर सुरक्षा शिक्षा व शोध केंद्र के सलाहकार।
जांच समिति की विशेषज्ञ त्रिमूर्ति : प्रो. नवीन कुमार चौधरी : साइबर सुरक्षा में 20 साल का अनुभव
गांधीनगर के राष्ट्रीय फॉरेंसिक साइंस विश्वविद्यालय के डीन। साइबर सुरक्षा व डिजिटल फॉरेंसिक के प्रोफेसर नवीन 20 साल से अकादमिक क्षेत्र में हैं। साथ ही, साइबर सुरक्षा, साइबर नीति, नेटवर्क में खामियां तलाशने वाले विशेषज्ञ भी हैं।
प्रो. प्रभारन पी : सुरक्षा खामियां तलाशने की विशेषज्ञता
अमृता विश्व विद्यापीठ केरल में इंजीनियरिंग के प्रोफेसर। दो दशक से कंप्यूटर साइंस व सुरक्षा पर काम कर रहे हैं। डिवाइस में मालवेयर की पहचान, बुनियादी सुरक्षा, जटिल बाइनेरी विश्लेषण, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस व मशीन लर्निंग के विशेषज्ञ।
अश्विन अनिल गुमस्ते : 20 पेटेंट और 150 प्रकाशन हैं इनके नाम
आईआईटी बॉम्बे के कंप्यूटर साइंस एंड इंजीनियरिंग इंस्टीट्यूट में एसोसिएट प्रोफेसर। 20 अमेरिकी पेटेंट हासिल। 150 शोधपत्र प्रतिष्ठित जर्नलों में प्रकाशित। तीन पुस्तकें भी लिखी हैं। विक्रम साराभाई अवॉर्ड व एसएस भटनागर पुरस्कार विजेता।

इन बिंदुओं पर होगी पड़ताल
- क्या पेगासस का फोन व अन्य डिवाइस में उपयोग हुआ? इन डिवाइस में स्टोर डाटा तक पहुंचने, माइक्रोफोन से बातचीत सुनने, सूचनाएं हासिल करने जैसी चीजें हुईं?
- केंद्र ने 2019 में भारतीयों के व्हाट्सएप अकाउंट पेगासस के जरिये हैक होने की सूचना के बाद क्या कदम उठाए?
- क्या भारत सरकार, किसी राज्य सरकार या इन दोनों की किसी एजेंसी ने पेगासस स्पाईवेयर किसी भारतीय नागरिक पर उपयोग करने के लिए हासिल किया?
- अगर उन्होंने हासिल किया तो इसका नागरिकों पर उपयोग किस कानून, नियम, गाइडलाइन, प्रोटोकॉल या कानूनी प्रक्रिया के तहत हुआ? किसी अन्य भारतीय नागरिक या संस्था ने इसका उपयोग किया तो क्या यह अधिकृत था?
- इससे जुड़े अन्य पहलू, जिन्हें समिति उपयोगी माने।
जांच के क्रम में किसी भी व्यक्ति के बयान दर्ज करने की होगी इजाजत
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया है कि तकनीकी समिति को पेगासस मामले की जांच के क्रम में किसी भी व्यक्ति के बयान दर्ज करने और किसी भी अथॉरिटी या व्यक्ति से रिकॉर्ड तलब करने की इजाजत होगी, साथ ही समिति को किसी भी तरह की जांच की स्वतंत्रता होगी, जो उसे उचित लगे। इसमें कोई बाध्यता नहीं होगी।
राजनीति नहीं, लोकतांत्रिक ढांचे पर हमला है पेगासस : कांग्रेस
सुप्रीम कोर्ट के पेगासस मामले की जांच के लिए कमेटी गठन के आदेश का कांग्रेस ने स्वागत किया है। राहुल गांधी ने कहा कि ये हरगिज राजनीतिक मामला नहीं है, देश के लोकतांत्रिक ढांचे, सांविधानिक संस्थाओं और लोगों की आजादी पर हमला है। राहुल ने आरोप लगाया कि ये काम प्रधानमंत्री और गृहमंत्री के अलावा तीसरा कोई नहीं कर सकता।
अगर ऐसा किया गया है तो आपराधिक मामला है। सरकार ने देश में राजनीतिक कंट्रोल और ब्लैकमेल करने एवं लोकतांत्रिक प्रक्रिया को प्रभावित करने के लिए ऐसा किया है। उन्होंने कहा, सुप्रीम कोर्ट का ये बड़ा कदम है। मुझे विश्वास है सत्य जरूर सामने आएगा।
यह फैसला स्वार्थी तत्वों का झूठ सामने लाने के लिए सही: भाजपा
सत्तारूढ़ भाजपा ने फैसले को सरकार के रुख के अनुरूप ही बताया है। भाजपा प्रवक्ता संबित पात्रा ने कहा कि केंद्र सरकार तो सुप्रीम कोर्ट में पहले ही कह चुकी है कि कुछ निहित स्वार्थी तत्वों के झूठ को सामने लाने के लिए यही सही रहेगा कि विशेषज्ञों की एक समिति मामले की निष्पक्ष जांच करे। कोर्ट ने केंद्र की सलाह ही मानी।
पात्रा से पूछा गया कि सुप्रीम कोर्ट ने तो सरकारी जांच कमेटी के गठन को खारिज कर दिया है तो उन्होंने कहा इससे फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि विशेषज्ञ तो विशेषज्ञ ही होता है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी का मजाक बनाते हुए कहा कि उन्हें झूठ बोलने की आदत पड़ चुकी है।
सरकार की सहयोगी जदयू ने फैसले को बताया ऐतिहासिक
केंद्र सरकार की सहयोगी जदयू ने पेगासस पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को ऐतिहासिक करार दिया है। पार्टी ने कहा कि इस अहम मुद्दे पर सरकार का रुख स्पष्ट न होने के कारण ही कमेटी का गठन करना पड़ा है। पार्टी महासचिव केसी त्यागी ने कहा, हम शुरू से इस मामले की जांच की मांग कर रहे थे। बिहार के सीएम नीतीश कुमार ने सच्चाई सामने लाने के लिए जांच कराने का सुझाव दिया था।