हार्दिक को 2 साल की सजा: 38 साल पुराना है पाटीदार आंदोलन, इनकी वजह से शुरू हुआ था विवाद
पाटीदार यानी पटेल समुदाय के लिए आरक्षण की मांग करने वाले उनके सबसे बड़े नेता हार्दिक पटेल को दंगा कराने के मामले में कोर्ट ने 2 साल की सजा सुनाई है। यह मामला मेहसाणा में हुई हिंसा के दौरान भाजपा विधायक ऋषिकेश के दफ्तर पर तोड़फोड़ से जुड़ा है। हालांकि बाद में उन्हें जमानत भी मिल गई। हार्दिक पटेल पाटीदारों के लिए आरक्षण की मांग की लंबे समय से कर रहे हैं।
बता दें कि पटेल समुदाय गुजरात का एक बड़ा वोटबैंक है। यह समुदाय राज्य की आबादी का कुल 14 फीसदी है। वैसे तो अधिकतर पटेल सुशिक्षित हैं, लेकिन उनका मानना है कि आरक्षण न होने की वजह से अक्सर वो सरकारी नौकरियों की रेस से बाहर हो जाते हैं।
ज्ञात हो कि गुजरात में 146 समुदायों को (अन्य पिछड़ा वर्ग) ओबीसी के तहत आरक्षित किया गया है, जिसमें मुस्लिम समुदाय भी शामिल है। ओबीसी समुदाय को सरकारी नौकरियों में 27 फीसदी का आरक्षण मिलता है, जबकि एससी को 7.5 फीसदी और एसटी को 15 फीसदी का आरक्षण मिलता है।
गुजरात में कब हुई थी आरक्षण की शुरुआत
गुजरात में आरक्षण की शुरुआत साल 1981 में हुई थी। तत्कालीन मुख्यमंत्री माधव सिंह सोलंकी के नेतृत्व वाली सरकार ने जस्टिस ए. आर. बख्शी आयोग की सिफारिशों के आधार पर सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े जातियों के लिए आरक्षण की शुरुआत की थी। उस समय भी इसको लेकर राज्य भर में पाटीदारों ने आंदोलन किया था। इन आंदोलनों ने धीरे-धीरे दंगे का रूप ले लिया था, जिसमें सौ से ज्यादा लोगों की मौत हो गई थी।
इस घटना के बाद कुछ सालों तक मामला थोड़ा शांत रहा, लेकिन 2012 में एक बार फिर पाटीदारों का मन बदला और उन्होंने फिर आरक्षण की मांग उठाई।
इस बीच 2015 में हार्दिक पटेल का पाटीदारों के सबसे बड़े नेता के रूप में उदय हुआ। दरअसल, 2015 में हार्दिक पटेल की बहन मोनिका राज्य सरकार की छात्रवृति पाने में असफल रही थी। इसी कारण हार्दिक पटेल ने पाटीदार अनामत आंदोलन समिति का गठन किया, जिसका लक्ष्य अन्य पिछड़ा वर्ग में शामिल होना था। बता दें कि पाटीदार समुदाय ओबीसी श्रेणी के तहत सरकारी नौकरी और शिक्षा में आरक्षण चाहते हैं।
हार्दिक पटेल ने इस दौरान पाटीदारों के लिए आरक्षण की मांग तेज कर दी और 6 जुलाई को मेहसाणा में सार्वजनिक प्रदर्शन किया गया। लेकिन धीरे-धीरे ये आंदोलन हिंसक हो गया और इसने दंगे का रूप ले लिया। पूरे राज्य में हुए इस भीषण दंगे में 9 लोग मारे गए थे।
हालांकि बाद में गुजरात सरकार ने आर्थिक तौर पर कमजोर वर्ग के लिए सरकारी नौकरी और शिक्षण संस्थानों में 10 फीसदी आरक्षण की अधिसूचना जारी की थी। इसके तहत 6 लाख रुपये तक की सालाना आय वाले पाटीदारों, ब्राह्मणों और बनिया समुदाय के लोगों को आरक्षण मिलना था। लेकिन गुजरात हाईकोर्ट ने सरकार की इस अधिसूचना को रद्द कर दिया था। दरअसल, कोर्ट का कहना था कि सरकार की इस अधिसूचना से आरक्षण 50 फीसदी से ऊपर चला जाएगा, जबकि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के मुताबिक किसी भी राज्य सरकार द्वारा 50 फीसदी से ज्यादा आरक्षण नहीं दिया जा सकता।