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Hindi News ›   Bihar ›   Pashupati Paras Profile The RLJP leader once Point Person of Ram Vilas Paswan Uncle of Chirag Paswan NDA break

कहानी पशुपति पारस की: कभी थे भाई रामविलास का 'संपर्क केंद्र', BJP की 'चिराग' की तलाश ने कैसे किया NDA से दूर?

Wed, 16 Apr 2025 04:18 PM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र Updated Wed, 16 Apr 2025 04:18 PM IST
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सार
पशुपति पारस हैं कौन? बिहार और देश की सियासत में वे कितना बड़ा चेहरा हैं? एनडीए से उनके अलग होने की वजह क्या है? ये फैसला कितना असरदार हो सकता है? आइये जानते हैं...
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Pashupati Paras Profile The RLJP leader once Point Person of Ram Vilas Paswan Uncle of Chirag Paswan NDA break
पशुपति कुमार पारस और पीएम नरेंद्र मोदी। - फोटो : X/PashupatiParas

विस्तार

पूर्व केंद्रीय मंत्री और राष्ट्रीय लोक जनशक्ति पार्टी के मुखिया पशुपति कुमार पारस ने एनडीए का साथ छोड़ने का एलान कर दिया है। इतना ही नहीं पशुपति ने महागठबंधन में भी जगह न बनती देख, बिहार विधानसभा चुनाव में सभी 243 सीटों पर उम्मीदवार उतारने की भी बात कही है। पारस कुछ समय पहले तक भाजपा के लिए बेहद अहम सहयोगी के तौर पर देखे जाते थे। वजह थी रामविलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा), जिस पर बडे़ भाई के निधन के बाद पशुपति का ही सबसे ज्यादा प्रभाव था। पार्टी जब दो फाड़ हुई तो भजीते चिराग को छोड़कर अन्य सभी सांसद पारस के साथ चले गए थे। हालांकि, 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद चीजें पूरी तरह बदल गईं। अब पारस खाली हाथ रह गए हैं। 


ऐसे में यह जानना अहम है कि आखिर पशुपति पारस हैं कौन? बिहार और देश की सियासत में वे कितना बड़ा चेहरा हैं? एनडीए से उनके अलग होने की वजह क्या है? ये फैसला कितना असरदार हो सकता है? आइये जानते हैं...

कौन हैं राष्ट्रीय लोक जनशक्ति पार्टी के प्रमुख पशुपति पारस?
पशुपति पारस की एक पहचान यह है कि वह लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा) के संस्थापक रहे दिवंगत रामविलास पासवान के भाई हैं। 



 

1977 में पशुपति पारस ने चुनावी राजनीति में कदम रखा। आपतकाल के बाद हुए लोकसभा चुनाव में रामविलास पासवान हाजीपुर लोकसभा सीट से जीतकर सांसद बने। इसके बाद बिहार में नए सिरे से विधानसभा के चुनाव हुए। इस चुनाव में अलौली सीट से पहली बार चुनाव लड़े और जीते। अलौली वो सीट थी जहां से रामविलास पासवान ने चुनावी राजनीति में कदम रखा था।  हालांकि, पशुपति को भाई की विरासत बचाने में सफलता 1980 में भी नहीं मिली थी। दरअसल, तब जनता पार्टी (सेक्युलर) के टिकट पर चुनाव लड़ रहे पशुपति को हार का सामना करना पड़ा था।  कांग्रेस (आई) के मिश्री सदा से वापस इस सीट पर कब्जा किया और पशुपति पारस को 9,440 वोट से हरा दिया। 

पशुपति पारस ने इसके बाद 1985 में विधानसभा में वापसी की और फिर 1990, 1995, 2000, फरवरी 2005 और अक्तूबर 2005 के विधानसभा चुनाव में भी अलौली सीट से जीत हासिल की। लेकिन उन्होंने यह सब रामविलास के नेतृत्व में रहते हुए ही किया। वह तीन बार बिहार सरकार में मंत्री पद पर भी पहुंचे। हालांकि, बड़े भाई का उन पर कितना जोर था, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जैसे-जैसे रामविलास ने पार्टियां बदलीं, वैसे-वैसे पशुपति की पार्टियां भी बदलती रहीं। 

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राजनीतिक जगत में कैसी रही पहचान?
बिहार की सियासत के कई जाने-माने चेहरे यह मानते हैं कि रामविलास पासवान की छवि के आगे पशुपति पारस खुद अपनी अलग पहचान नहीं बना पाए। राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के नेता श्याम रजक ने कुछ साल पहले एक मीडिया संस्थान से बातचीत के दौरान कहा था कि पहले जब कभी राजनीतिक दलों की बैठक होती थी, तब हम उन्हें (पशुपति पारस) को रामविलास के भाई के तौर पर ही जानते थे। उन्होंने कहा कि पशुपति बैठकों में बिना कुछ बोले ही बैठे रहते थे। 

वहीं, राजद के एक और नेता दावा करते हैं कि 1990-95 के बीच जब लालू प्रसाद यादव मुख्यमंत्री थे, तब उन्होंने वेतन के मामले पर प्रदर्शन कर रहे सरकारी कर्मियों से बातचीत करने के लिए एक पैनल बनाया था। तब किसी ने लालू को सुझाव दिया कि सामाजिक कल्याण मंत्री पशुपति पारस को भी पैनल का हिस्सा बनाना चाहिए। इस पर लालू ने सिर्फ एक वाक्य कहा- पारस और बैठकें, यह संभव नहीं। राजद के इस नेता ने कहा कि पारस के पास लोग उस दौर में सिर्फ तब जाते थे, जब उन्हें राम विलास पासवान से बात करनी होती थी।  



कहा जाता है कि अपनी चार दशक की सियासत में पशुपति पारस कभी भाई रामविलास के साये से बाहर नहीं निकल सके। हालांकि,  रामविलास पासवान के निधन के बाद से पशुपति और चिराग में रामविलास की विरासत पर कब्जे की लड़ाई में उन्होंने खूब सुर्खियां बटोरीं।  

रामविलास के निधन के बाद कैसे बदली पासवान परिवार की सियासत?
रामविलास पासवान के निधन के बाद लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा) के उत्तराधिकार को लेकर पासवान परिवार में ही टूट दिखी। दरअसल, पशुपति पारस 2019 में ही लोजपा का गढ़ मानी जाने वाली हाजीपुर लोकसभा सीट से सांसद बने थे। इससे पहले इस सीट पर 1977 से लेकर 2019 तक रामविलास पासवान खुद जीतकर सांसद रहे थे। ऐसे में बड़े भाई की विरासत पर पहले हक का दावा पशुपति पारस ने ही किया। 

पशुपति ने अपने भाई की जगह लेते हुए पार्टी कैडर का समर्थन अपने प्रति होने की बात कही। तब वे लोजपा की बिहार इकाई के प्रमुख थे, लेकिन बढ़ी महत्वाकांक्षाओं के मद्देनजर उन्होंने पार्टी का नियंत्रण अपने हाथ में लिया और चार और सांसदों के समर्थन से भतीजे चिराग को पार्टी के संसदीय दल के नेतृत्व से हटा दिया। पशुपति ने जून 2021 में लोजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष का पद भी हासिल कर लिया। इसी महीने चिराग पासवान ने भी पार्टी कार्यकर्ताओं के समर्थन का दावा किया और सभी पांच बागी सांसदों को लोजपा की प्राथमिक सदस्यता से निकाल दिया।  

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हालांकि, उनके इस कदम का कोई खास असर नहीं हुआ, क्योंकि लोकसभा में पशुपति ने सांसदों से मिले समर्थन के जरिए खुद को लोजपा नेता के तौर पर स्थापित कर लिया, लेकिन चिराग ने लोजपा पर अधिकार को चुनाव आयोग में चुनौती दे दी। आखिरकार चुनाव आयोग ने लोजपा के नाम और चुनाव चिह्न- बंगले के इस्तेमाल पर रोक लगा दी और पार्टी के अलग-अलग धड़ों को दो अलग नाम और चुनाव चिह्न मुहैया कराए। पशुपति के धड़े को नाम मिला राष्ट्रीय लोक जनशक्ति पार्टी (रालोजपा) और चिराग के गुट को नाम मिला लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास)।

हालांकि, उनके इस कदम का कोई खास असर नहीं हुआ, क्योंकि लोकसभा में पशुपति ने सांसदों से मिले समर्थन के जरिए खुद को लोजपा नेता के तौर पर स्थापित कर लिया, लेकिन चिराग ने लोजपा पर अधिकार को चुनाव आयोग में चुनौती दे दी। आखिरकार चुनाव आयोग ने लोजपा के नाम और चुनाव चिह्न- बंगले के इस्तेमाल पर रोक लगा दी और पार्टी के अलग-अलग धड़ों को दो अलग नाम और चुनाव चिह्न मुहैया कराए। पशुपति के धड़े को नाम मिला राष्ट्रीय लोक जनशक्ति पार्टी (रालोजपा) और चिराग के गुट को नाम मिला लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास)।

कितना असरदार हो सकता है पशुपति पारस का फैसला?
  • पशुपति पारस ने आंबेडकर जयंती के दिन एलान कर दिया कि वह अब एनडीए के साथ नहीं रहेंगे। इसके बाद से ही कयास लगाए जा रहे हैं कि वे बिहार विधानसभा चुनाव से पहले राज्य में महागठबंधन के साथ जा सकते हैं। 
  • रामविलास पासवान के नेतृत्व में उनकी पार्टी बिहार की आबादी में शामिल 19.65% दलितों के अच्छे खासे वोट बटोर लेती थी। इनमें पासवान समुदाय, जिनकी संख्या 5.3% है, के लगभग पूरे वोट अविभाजित लोजपा को मिलते थे। पार्टी में हुई टूट से इन वोटों का भी बिखराव हो सकता है।
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