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सुप्रीम कोर्ट में केंद्रः कानून बनाने में संसद के अधिकार का प्रयोग, बाहरी प्राधिकार जारी नहीं कर सकता निर्देश
Mon, 17 Oct 2022 11:01 PM IST
Amit Mandal
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: Amit Mandal
Updated Mon, 17 Oct 2022 11:01 PM IST
सार
केंद्र ने पिछले सप्ताह दायर एक हलफनामे में कहा कि कानून की एक तय स्थिति है और विभिन्न निर्णयों में कहा गया है कि हमारी संवैधानिक योजना के तहत, संसद को कानून बनाने के लिए संप्रभु शक्ति है।
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सुप्रीम कोर्ट
- फोटो : ani
विस्तार
केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में दायर एक हलफनामे में कहा है कि संसद कानून बनाने के लिए संप्रभु अधिकार का प्रयोग करती है और कोई भी बाहरी प्राधिकार इसे कानून बनाने का निर्देश जारी नहीं कर सकती है। अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय द्वारा दायर याचिकाओं के जवाब में केंद्र ने ये दलील दी जिसमें सरकार को तलाक, गोद लेने, संरक्षकता, उत्तराधिकार, विरासत, रखरखाव, शादी की उम्र और गुजारा भत्ता के लिए धर्म और लिंग-तटस्थ समान कानून बनाने का निर्देश देने की मांग की गई थी।
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केंद्र ने पिछले सप्ताह दायर एक हलफनामे में कहा कि कानून की एक तय स्थिति है और विभिन्न निर्णयों में कहा गया है कि हमारी संवैधानिक योजना के तहत, संसद को कानून बनाने के लिए संप्रभु शक्ति है और कोई भी बाहरी शक्ति या प्राधिकार किसी खास कानून के लिए निर्देश नहीं दे सकता है।
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हलफनामे में कहा गया है कि यह लोगों द्वारा निर्वाचित प्रतिनिधियों के निर्णय का नीतिगत मामला है और इस संबंध में अदालत द्वारा कोई निर्देश नहीं जारी किया जा सकता है। यह विधायिका पर है कि वह कोई कानून बनाए या नहीं बनाए। इसके अलावा आदेशों में यह माना गया है कि जनहित याचिका (पीआईएल) सिर्फ समाचार पत्रों की खबरों के आधार पर नहीं दायर की जानी चाहिए। उपाध्याय ने वकील अश्विनी कुमार दुबे के जरिए ऐसे कानूनों का अनुरोध करते हुए पांच अलग-अलग याचिकाएं दायर की हैं।
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उपाध्याय ने अगस्त 2020 में संविधान और अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों की भावना को ध्यान में रखते हुए सभी नागरिकों के लिए तलाक के समान आधार की मांग करते हुए जनहित याचिका दायर की थी। उन्होंने एक और जनहित याचिका दायर कर संविधान और अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों की भावना के अनुसार सभी नागरिकों के लिए भरण-पोषण और गुजारा भत्ता के लिए एक समान आधार लिंग और धर्म-तटस्थ की मांग की थी।