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पंडित जसराज : शास्त्रीय गायकी को सरल बनाने वाले संगीत मार्तंड की जीवन यात्रा

Mon, 17 Aug 2020 09:05 PM IST
गौरव पाण्डेय न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: गौरव पाण्डेय Updated Mon, 17 Aug 2020 09:05 PM IST
सार

  • 28 जनवरी 1930 को हरियाणा में हुआ था जाने-माने शास्त्रीय गायक पंडित जसराज का जन्म
  • अंतिम प्रस्तुति नौ अप्रैल को हनुमान जयंती पर वाराणसी के संकटमोचन मंदिर के लिए दी थी
  • चार साल के थे तब हो गया था पिता का देहांत, बड़े भाई पंडित मणिराम ने किया पालन-पोषण
  • संगीत की दुनिया में बिताए 80 से अधिक साल, पद्मश्री और पद्मविभूषण समेत जीते कई पुरस्कार
  • पंडित जसराज के नाम पर हुआ ग्रह का नामकरण, यह सम्मान पाने वाले पहले भारतीय कलाकार

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Pandit Jasraj passed away know all about his musical journey
पंडित जसराज - फोटो : twitter.com/airnewsalerts

विस्तार

भारतीय शास्त्रीय संगीत के पुरोधाओं में शुमार प्रसिद्ध शास्त्रीय गायक पंडित जसराज का निधन हो गया। 90 वर्षीय पंडित जसराज का निधन अमेरिका के न्यूजर्सी में हुआ। पंडित जसराज का सबसे बड़ा योगदान शास्त्रीय संगीत को जनता के लिए सरल और सहज बनाना रहा जिससे उसकी लोकप्रियता बढ़ी। उन्होंने ख्याल गायकी में ठुमरी का पुट डाला जो सुनने वालों के कानों में मिसरी घोल जाता था। वह बंदिश भी अपने जसरंगी अंदाज में गाते थे ।

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एक दिन में सौ बार सुन गए थे जगजीत सिंह की गजल
शास्त्रीय संगीतकार होने के बावजूद उन्हें नए दौर के संगीत से गुरेज नहीं था। वह दुनिया भर का संगीत सुनते थे और सराहते थे। जगजीत सिंह की गजल ‘सरकती जाए रुख से नकाब’ उनकी पसंदीदा थी और कहते हैं कि एक बार दिन भर में वह सौ बार इसे सुन गए थे। भारत, कनाडा, अमेरिका समेत दुनिया भर में संगीत सिखाने वाले पंडित जसराज खुद अपने शिष्यों से सीखने को लालायित रहते थे।
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जब ग्रह का नाम पंडित जसराज के नाम पर रखा गया
28 जनवरी 1930 को हरियाणा के हिसार में जन्मे मेवाती घराने के अग्रणी गायक पंडित जसराज ने आठ दशक से अधिक के अपने सुनहरे सफर में यूं तो कई सम्मान और पुरस्कार हासिल किए लेकिन पिछले साल इंटरनेशनल एस्ट्रोनॉमिकल यूनियन (IAU) ने अगस्त में सौरमंडल में एक छोटे ग्रह का नाम उनके नाम पर रखा।  
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पिछले साल सितंबर में सौरमंडल में एक ग्रह का नाम उनके नाम पर रखा गया था और यह सम्मान पाने वाले वह पहले भारतीय कलाकार बने थे। इंटरनेशनल एस्ट्रोनामिकल यूनियन :आईएयू: ने 'माइनर प्लेनेट' 2006 वीपी 32 (नंबर 300128) का नामकरण पंडित जसराज के नाम पर किया था जिसकी खोज 11 नवंबर 2006 को की गई थी।

यह सम्मान पाने वाले वह पहले भारतीय कलाकार बने। उनसे पहले सिर्फ मोजार्ट, बीथोवन और टेनर लूसियानो पावारोत्ति को यह सम्मान मिला था। उन्होंने इस बारे में कहा था, मुझे तो ईश्वर की असीम कृपा दिखती है। सूर्य की प्रदक्षिणा कर रहा है यह ग्रह। भारत और भारतीय संगीत के लिए ईश्वर का आशीर्वाद है।

नई जुगलबंदियां और रागों की रचना की, भजन भी गाए
शास्त्रीय संगीत के सशक्त हस्ताक्षर होने के साथ पंडित जसराज ने अर्ध शास्त्रीय शैली जैसे हवेली संगीत को भी लोकप्रिय बनाया। उन्होंने मंदिरों में भजन गाए और उनके गाए कृष्ण भजन खासकर ‘ओम नमो भगवते वासुदेवाय’ दुनिया भर में लोकप्रिय हुए। उन्होंने नई तरह की जु्गलबंदी ‘जसरंगी’ भी रची और 'अबीरी तोड़ी' व 'पटदीपकी' जैसे नए रागों का सृजन किया ।

'हजारों ख्वाहिशें ऐसी कि हर ख्वाहिश पे दम निकले'
उम्र के नौ दशक पार करने के बाद जब उनसे पूछा गया कि क्या कोई ख्वाहिश अभी भी अधूरी है , तो उनका जवाब था, 'गालिब ने कहा है .... हजारों ख्वाहिशें ऐसी कि हर ख्वाहिश पे दम निकले । इतने बड़े शायर जब यह बात कह गए, तो हम तो बहुत पीछे हैं । किसी भी इंसान की ख्वाहिश कभी पूरी नहीं होती ।'

उन्होंने कहा था, 'मैंने कभी सोचा या चाहा भी नहीं, वो चीजें भगवान से मिल गईं तो अब क्या चाहूं या क्या कहूं। पद्मश्री मिला तो मेरी आधी जान निकल गई थी। उसके बाद पद्मविभूषण तक मिला। बिना सोचे यहां तक आ गए तो आगे पता नहीं ईश्वर ने क्या लिखा है, उन्हीं पर छोड़ देते हैं।'

जब नेपाल नरेश ने पुरस्कार में दी थीं 5000 मोहरें
पंडित जसराज कहते थे कि जब वह गाते हैं तो ईश्वर को सामने खड़ा पाते हैं और फिर उन्हें किसी अन्य का भान नहीं रहता। पंडित जसराज उस वाकये का जिक्र हमेशा करते थे जब 1952 में तत्कालीन नेपाल नरेश त्रिभुवन विक्रम के सामने दी गई प्रस्तुति पर उन्हें पुरस्कार में मोहरें मिली थीं।


उन्हें करीब 5000 मोहरें दी गई थीं और वह यह जानकर लगभग अचेत हो गए थे कि गाने के लिए पैसे भी मिलते हैं। देश के दूसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्मविभूषण (2000 में) से नवाजे जा चुके जसराज को 1975 में पद्मश्री सम्मान मिला था जिस पर वह इतने हैरान हुए थे कि उन्होंने चुप्पी ही साध ली थी।

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