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क्यों नहीं थम रहा दशकों पुराना संघर्ष?: बलूचिस्तान में फिर भड़की हिंसा, डर के साए में कट रही लोगों की जिंदगी

Mon, 02 Feb 2026 11:27 PM IST
शुभम कुमार वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, बलूचिस्तान
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, बलूचिस्तान Published by: शुभम कुमार Updated Mon, 02 Feb 2026 11:27 PM IST
सार

पाकिस्तान का सबसे बड़ा लेकिन उपेक्षित प्रांत बलूचिस्तान एक बार फिर हिंसा की आग में जल रहा है। बलूच लड़ाके के हमलों और सुरक्षा बलों की सख्त कार्रवाई में दर्जनों लोगों की जान गई है। हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि कई इलाकों में स्कूल-दुकानें बंद हैं और हजारों परिवार सुरक्षित जगहों की तलाश में पलायन को मजबूर हैं।

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Pakistan Rather than addressing Balochi woes continues to dominate drawing on its resources
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : ANI

विस्तार

पाकिस्तान का सबसे बड़ा लेकिन सबसे गरीब प्रांत बलूचिस्तान एक बार फिर भीषण हिंसा की चपेट में है। हाल के दिनों में यहां बलूच लड़ाके और पाकिस्तानी सुरक्षा बलों के बीच भारी टकराव देखने को मिला है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, पिछले सप्ताहांत बलूचिस्तान के कई इलाकों में एक साथ हमले किए गए, जिनमें 15 सुरक्षाकर्मी और 18 आम नागरिक मारे गए।

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वहीं जवाबी कार्रवाई में पाकिस्तानी सुरक्षा बलों ने कम से कम 41 लोगों को मारने का दावा किया है। इन हमलों की जिम्मेदारी बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी (बीएलए) और उससे जुड़े अन्य अलगाववादी संगठनों ने ली है। इन हमलों में पुलिस थानों, सेना के काफिलों और सरकारी इमारतों को निशाना बनाया गया।
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डर की साए में आम लोग
बलूचिस्तान में लगातार हो रही हिंसा की वजह से हालात बेहद खराब हो गए हैं। कई इलाकों में स्कूल और दुकानें बंद हैं। हजारों परिवार अपने घर छोड़कर क्वेटा और कराची जैसे शहरों में शरण लेने को मजबूर हो गए हैं। इसके चलते लोग हर वक्त डर में जी रहे हैं। 
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समय-समय पर कैसे भड़कता है बलूचिस्तान?
देखा जाए तो बलूचिस्तान की समस्या नई नहीं है। इसकी जड़ें दशकों पुरानी हैं। बलूच लोगों का कहना है कि उन्हें राजनीतिक रूप से हाशिये पर रखा गया। उनकी जमीन के प्राकृतिक संसाधनों का फायदा उन्हें नहीं मिलता। इतना ही नहीं बलूचिस्तान का गैस, कोयला, तांबा और सोना जैसे संसाधनों से होने वाली कमाई इस्लामाबाद और बाहरी कंपनियों को जाती है।


टकराव की असली वजह?
बता दें कि 1952 में बलूचिस्तान के सूई इलाके में गैस मिलने के बाद हालात और बिगड़े। बलूच लोगों का आरोप है कि गैस पूरे पाकिस्तान को मिली, लेकिन बलूचिस्तान खुद गरीबी में डूबा रहा। दूसरी ओर बलूचिस्तान चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (सीपीईसी) के लिए बेहद अहम है, खासकर ग्वादर बंदरगाह की वजह से। कारण है कि पाकिस्तान सरकार सीपीईसी को आर्थिक विकास का जरिया मानती है, लेकिन बलूच लड़ाके इसे शोषण का प्रतीक मानते हैं। यही टकराव हिंसा को और बढ़ा रहा है। 
 
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इतिहास में बार-बार उठा विद्रोह

बलूचिस्तान का इतिहास हजारों साल पुराना है। यहां मेहरगढ़ जैसी सभ्यताएं थीं, जो 7000 ईसा पूर्व की मानी जाती हैं। वहीं आधुनिक इतिहास में ब्रिटिश काल में यह इलाका रणनीतिक कारणों से कब्जे में लिया गया। 1947 में पाकिस्तान में शामिल होने के बाद इसका विरोध शुरू हुआ। अब तक यहां पांच बड़े विद्रोह हो चुके हैं, 1948,1958–59, 1962–63,1973–77 और 2004 से अब तक यह विद्रोह जारी है। इन सभी विद्रोह में बलूच लड़ाकों की हर बार मांगें वही रहीं, स्वायत्तता, संसाधनों पर हक और सम्मान। 

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