प्रकृति को बचाने निकले पद्म भूषण डॉ. अनिल जोशी: नेपाल से दिल्ली तक साइकिल से सफर, क्या जागरूक होगा आम नागरिक?
पद्म भूषण से सम्मानित डॉ. अनिल प्रकाश जोशी 2 अक्तूबर से नेपाल के जानकीपुर से 3,000 किलोमीटर लंबी 'प्रकृति पथ' साइकिल यात्रा शुरू करने जा रहे हैं। दो देशों और सात राज्यों से गुजरने वाली यह यात्रा हवा, मिट्टी, पानी और बिगड़ते मौसम के संकट पर जनचेतना जगाएगी। जब ग्लोबल वार्मिंग पूरी दुनिया के लिए गंभीर खतरा बन चुकी है, तो क्या महज साइकिल यात्रा से लोगों की सोच बदलेगी? क्या हम प्रकृति को सबसे बड़ा धर्म मान पाएंगे? नेपाल से दिल्ली तक 3000 किलोमीटर की साइकिल यात्रा क्यों शुरू हो रही है? आइए, सबकुछ विस्तार से जानते हैं...
विस्तार
पिछले वर्षों की तरह इस वर्ष भी पर्यावरण संरक्षण, स्वास्थ्य और स्वच्छता का संदेश देने के उद्देश्य से एक विशाल साइकिल यात्रा निकाली जा रही है। पद्म भूषण पुरस्कार से सम्मानित और 'नेचरमैन' के नाम से पहचाने जाने वाले डॉ. अनिल प्रकाश जोशी के नेतृत्व में 'प्रकृति पथ' यानी 'पेडल फॉर नेचर' का आयोजन किया जा रहा है। यह यात्रा 2 अक्तूबर को नेपाल के जानकीपुर से शुरू होगी। यात्रा की शुरुआत के लिए 2 अक्तूबर का दिन इसलिए चुना गया है क्योंकि महात्मा गांधी के विचार समाज, स्वराज और स्वस्थ पारिस्थितिकी से पूरी तरह जुड़े हुए थे। यह पूरी यात्रा 'प्रकृति ही प्रवृत्ति', 'प्रकृति प्रभु समान', 'प्रकृति सर्वोपरि धर्म' और 'प्रकृति ही कल की चुनौती' के मूल मंत्र पर आधारित है।
दो देशों और सात राज्यों से होकर कैसे गुजरेगी यह पूरी यात्रा?
यह साइकिल यात्रा दो देशों और सात प्रमुख राज्यों व क्षेत्रों से होकर गुजरेगी। इसमें नेपाल के अलावा भारत के बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली जैसे राज्य व क्षेत्र शामिल हैं। करीब 50 से 55 दिनों तक चलने वाली इस यात्रा में लगभग 3,000 किलोमीटर की दूरी साइकिल से तय की जाएगी। यात्रा में शामिल दल प्रतिदिन 50 से 60 किलोमीटर की साइकिलिंग करेगा। रास्ते में विभिन्न शहरों, कस्बों और गांवों में पड़ाव डालकर आम जनता के साथ सीधा संवाद स्थापित किया जाएगा, ताकि समाज के हर वर्ग को इस मुहिम से सीधे जोड़ा जा सके।
हवा, पानी और मिट्टी की उपेक्षा से मानव जीवन पर क्या संकट आ गया है?
- ग्लोबल वार्मिंग का खतरा... आज इंसान हवा, पानी, मिट्टी और जंगलों की लगातार अनदेखी कर रहा है, जिसकी भारी कीमत ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन जैसी विकराल समस्याओं के रूप में चुकानी पड़ रही है।
- जीवन का मूल आधार... इंसान अपनी भौतिक सुख-सुविधाओं और आर्थिक गतिविधियों में पूरी तरह खो चुका है, जबकि इन सभी गतिविधियों का अस्तित्व तभी संभव है जब जीवन के साथ प्रकृति सुरक्षित रहे।
- अधूरी समझ का नुकसान... दुनिया का कोई ऐसा गांव या शहर नहीं है जहाँ लोग भगवान को न पूजते हों, लेकिन प्रकृति को लेकर लोगों की समझ आज भी बेहद आधी-अधूरी और सीमित बनी हुई है।
- प्रकृति की नाराजगी... लगातार हो रहे दोहन और उपेक्षा के कारण ही आज प्रकृति हमारे प्रति कठोर और आक्रामक रूप धारण कर चुकी है।
'प्रकृति ही प्रभु और सबसे बड़ा धर्म है' का संदेश जन-जन तक कैसे पहुंचेगा?
इस यात्रा का सबसे बड़ा लक्ष्य लोगों के दिलों में यह बात गहराई से बैठाना है कि प्रकृति ही ईश्वर है और इसके बिना जीवन किसी भी हाल में संभव नहीं है। सच्चाई यह है कि ईश्वर भी प्रकृति की ही शरण में हैं, इसलिए मानव का सबसे पहला कर्तव्य प्रकृति की रक्षा करना बनता है। मनुष्य ने प्रकृति के प्रति अपनी वास्तविक चिंता जताने के बजाय हमेशा उन संसाधनों और सुविधाओं को जुटाने पर जोर दिया जो उसने प्रकृति से छीने हैं। डॉ. अनिल जोशी का कहना है कि प्रकृति को हमारी नहीं, बल्कि हमारी आवश्यकता प्रकृति को है। यह यात्रा सभी वर्गों को एक नए सिरे से प्रार्थना, प्रभु और पारिस्थितिकी से जोड़कर आने वाले सुरक्षित भविष्य की नींव रखेगी।
क्या प्रकृति संरक्षण को सर्वोच्च कर्तव्य मानकर सुरक्षित कल का निर्माण होगा?
'नेचर नेटवर्क' के तत्वावधान में आयोजित यह अभियान 'कनेक्ट, कम्युनिकेट, कोलैबोरेट और कंजर्व' यानी जुड़ने, संवाद करने, सहयोग करने और संरक्षण की दिशा में आगे बढ़ने का आह्वान करता है। 'एक पृथ्वी, एक प्रकृति और एक भविष्य' के विचार के साथ यह यात्रा यह तय करने का प्रयास करेगी कि आने वाली पीढ़ियां प्रकृति को ही अपना सर्वोपरि धर्म और पहला कर्तव्य समझें। यदि समाज अब भी नहीं जागा और पर्यावरण को अपने दैनिक आचरण में शामिल नहीं किया, तो प्राकृतिक असंतुलन की मार से बचना किसी के लिए भी संभव नहीं होगा।