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दलित राष्ट्रपति से दलितों का नहीं होगा फ़ायदा
बीबीसी हिन्दी
Updated Thu, 20 Jul 2017 04:12 PM IST
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गुरुवार को राष्ट्रपति चुनाव के नतीजे आ जाएंगे और दलितों की राजनीति के चलते देश को एक नया दलित राष्ट्रपति मिल जाएगा। लेकिन क्या इससे दलितों को कोई ख़ास फ़ायदा होगा। संविधान के अनुसार राष्ट्रपति को कोई ख़ास अधिकार नहीं होते. कुछ एक मामले को छोड़ दिया जाए तो जो सरकार चाहती है, उन्हें वो करना होता है। भारतीय राष्ट्रपति की कमोबेश वही स्थिति होती है जो इंग्लैंड में महारानी की होती है।
कहने को वो मोनार्क हैं लेकिन उन्हें भी कोई अधिकार नहीं होते।1950 में जब भारत में संविधान बना तो इंग्लैंड की ही तर्ज़ पर राष्ट्रपति के पद की अवधारणा की गई थी. यहां राजा महाराजा तो नहीं थे जो चाहते थे कि उन्हें यहां का मोनार्क घोषित किया जाए। लेकिन जब आख़िर में संविधान बनकर तैयार हुआ तो इस पद को राष्ट्रपति कहा गया, जो सिर्फ़ नाम के ही होते हैं। उन्हें कोई अधिकार नहीं होता।
एक दलित के राष्ट्रपति बनने से दलितों को कोई फ़ायदा होगा ऐसा नहीं है। लेकिन ऐसा करने से पार्टी को दलितों के वोटों की शक्ल में फ़ायदा ज़रूर पहुंचेगा। भारत के पहले दलित राष्ट्रपति के आर नारायणन अपने कार्यकाल में काफ़ी प्रभावी माने जाते थे। वो फॉरेन सर्विस से थे।
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भारत के राजनयिक रह चुके थे और अकादमिक क्षेत्र से भी थे तो उन्होंने अपनी आज़ादी दिखाने की कोशिश की थी। संविधान के अनुसार राष्ट्रपति सरकार को मशविरा दे सकते हैं। सरकार से पुनर्विचार करने के लिए कह सकते हैं। लेकिन अगर सरकार इनकार कर दे तो उन्हें हस्ताक्षर करने ही होंगे।
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कहने को वो मोनार्क हैं लेकिन उन्हें भी कोई अधिकार नहीं होते।1950 में जब भारत में संविधान बना तो इंग्लैंड की ही तर्ज़ पर राष्ट्रपति के पद की अवधारणा की गई थी. यहां राजा महाराजा तो नहीं थे जो चाहते थे कि उन्हें यहां का मोनार्क घोषित किया जाए। लेकिन जब आख़िर में संविधान बनकर तैयार हुआ तो इस पद को राष्ट्रपति कहा गया, जो सिर्फ़ नाम के ही होते हैं। उन्हें कोई अधिकार नहीं होता।
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एक दलित के राष्ट्रपति बनने से दलितों को कोई फ़ायदा होगा ऐसा नहीं है। लेकिन ऐसा करने से पार्टी को दलितों के वोटों की शक्ल में फ़ायदा ज़रूर पहुंचेगा। भारत के पहले दलित राष्ट्रपति के आर नारायणन अपने कार्यकाल में काफ़ी प्रभावी माने जाते थे। वो फॉरेन सर्विस से थे।
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भारत के राजनयिक रह चुके थे और अकादमिक क्षेत्र से भी थे तो उन्होंने अपनी आज़ादी दिखाने की कोशिश की थी। संविधान के अनुसार राष्ट्रपति सरकार को मशविरा दे सकते हैं। सरकार से पुनर्विचार करने के लिए कह सकते हैं। लेकिन अगर सरकार इनकार कर दे तो उन्हें हस्ताक्षर करने ही होंगे।
presidential candidate
नारायणन लंबे समय के लिए राजनयिक रह चुके थे तो उन्होंने अपना अलग स्टाइल रखा था लेकिन उसके कारण आगे के लिए कोई नज़ीर बनी हो ऐसा नहीं था। लेकिन अब जो राष्ट्रपति बन कर आ रहे हैं यानी कोविंद से तो कोई उम्मीद ना ही रखी जाए। कोविंद को कोई जानता नहीं। हमने भी उनका नाम नहीं सुना था। ना उनकी कोई भारी भरकम शख्सियत है नो कोई भारी क्वालिफ़िकेशन है। उन्हें तो वही करना है। जो सरकार कहेगभारत के पहले राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद और जवाहरलाल नेहरू के बीच वैचारिक मतभेद हो गए थे।
क़ानून के एक रिसर्च इंस्टीस्यूट के उद्घाटन के वक़्त राजेंद्र प्रसाद ने कहा था कि हम लोगों को आंखे बंद कर के ब्रिटेन के रिवाजों को नहीं अपनाना चाहिए बल्कि राष्ट्रपति के अपने अधिकार होने चाहिए। लेकिन हमारे यहां नेहरू का व्यक्तित्व इतना मज़बूत था कि उन्होंने राजेंद्र प्रसाद को 10 साल तक राष्ट्रपति तो रखा लेकिन कभी उनकी कोई बात नहीं मानी गई।
एक बार हिंदी या हिंदुस्तानी को राष्ट्रीय भाषा रखा जाए इस पर वोटिंग हुई थी तो वोट आधे-आधे पड़े थे। उस मामले में राजेंद्र प्रसाद ने कास्टिंग वोट दिया था और हिंदी यहां की सरकारी ज़ुबान बन गई थी राष्ट्रपति का बाद में क्या होना है वो भी तो सरकार को ही डिसाइड करना होता है।
तो ऐसे में राष्ट्रपति के लिए आसान नहीं होता सरकार से लड़ाई मोल लेना पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम बेहद क़ाबिल थे। और हर बिल पर सरकार को मशविरा देते थे। लेकिन सोनिया गांधी को एक महिला को राष्ट्रपति बना कर लाना था तो वो प्रतिभा पाटिल को ले आईं। उन्होंने कलाम को दूसरी बार राष्ट्रपति नहीं बनाया।
क़ानून के एक रिसर्च इंस्टीस्यूट के उद्घाटन के वक़्त राजेंद्र प्रसाद ने कहा था कि हम लोगों को आंखे बंद कर के ब्रिटेन के रिवाजों को नहीं अपनाना चाहिए बल्कि राष्ट्रपति के अपने अधिकार होने चाहिए। लेकिन हमारे यहां नेहरू का व्यक्तित्व इतना मज़बूत था कि उन्होंने राजेंद्र प्रसाद को 10 साल तक राष्ट्रपति तो रखा लेकिन कभी उनकी कोई बात नहीं मानी गई।
एक बार हिंदी या हिंदुस्तानी को राष्ट्रीय भाषा रखा जाए इस पर वोटिंग हुई थी तो वोट आधे-आधे पड़े थे। उस मामले में राजेंद्र प्रसाद ने कास्टिंग वोट दिया था और हिंदी यहां की सरकारी ज़ुबान बन गई थी राष्ट्रपति का बाद में क्या होना है वो भी तो सरकार को ही डिसाइड करना होता है।
तो ऐसे में राष्ट्रपति के लिए आसान नहीं होता सरकार से लड़ाई मोल लेना पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम बेहद क़ाबिल थे। और हर बिल पर सरकार को मशविरा देते थे। लेकिन सोनिया गांधी को एक महिला को राष्ट्रपति बना कर लाना था तो वो प्रतिभा पाटिल को ले आईं। उन्होंने कलाम को दूसरी बार राष्ट्रपति नहीं बनाया।
presidential candidate
भारत में संविधान के विरुद्ध भी सरकार कुछ कहती है तो राष्ट्रपति को उसे मानना होता है। इमरजेंसी के दौरान भी तो यही हुआ था। इंदिरा गांधी ने जो कहा, वही माना गया। पार्टियां अधिकतर नेताओं को ही राष्ट्रपति बनाती हैं। डॉ राधाकृष्णन और ज़ाकिर हुसैन अकादमिक धारा से थे। कलाम भी अकादमिक थे।
अब जो व्यक्ति आज आधी रात तक बीजेपी का सक्रिय सदस्य है और उसकी हर बात का समर्थन करता है कल राष्ट्रपति बनते ही उनकी सोच कैसे बदल जाएगी। दलित ख़ुश होंगे की उनके समुदाय से कोई राष्ट्रपति बना लेकिन राष्ट्रपति अपने फैसले से कोई फ़ायदा पहुंचाए ऐसा नहीं हो सकता। राष्ट्रपति रातोंरात अपने विचार बदल कर न्यूट्रल हो जाएं। ये करना आसान नहीं होता। ये करना तो अपनी पर्सनैलिटी पर निर्भर करता है।
इस बार जो एक नई और गंभीर बात होने जा रही है वो ये है कि इस बार राष्ट्रपति और उप राष्ट्रपति दोनों ही सत्तारूढ़ पार्टी के नेता ही होंगे। पहले तो उपरष्ट्रपति दूसरी पार्टी के होते थे लेकिन इस बार ऐसा नहीं होगा. तो ऐसे में कुछ भी हो जाए तो कम है।
अब जो व्यक्ति आज आधी रात तक बीजेपी का सक्रिय सदस्य है और उसकी हर बात का समर्थन करता है कल राष्ट्रपति बनते ही उनकी सोच कैसे बदल जाएगी। दलित ख़ुश होंगे की उनके समुदाय से कोई राष्ट्रपति बना लेकिन राष्ट्रपति अपने फैसले से कोई फ़ायदा पहुंचाए ऐसा नहीं हो सकता। राष्ट्रपति रातोंरात अपने विचार बदल कर न्यूट्रल हो जाएं। ये करना आसान नहीं होता। ये करना तो अपनी पर्सनैलिटी पर निर्भर करता है।
इस बार जो एक नई और गंभीर बात होने जा रही है वो ये है कि इस बार राष्ट्रपति और उप राष्ट्रपति दोनों ही सत्तारूढ़ पार्टी के नेता ही होंगे। पहले तो उपरष्ट्रपति दूसरी पार्टी के होते थे लेकिन इस बार ऐसा नहीं होगा. तो ऐसे में कुछ भी हो जाए तो कम है।