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One Nation One Election: बार-बार चुनाव से परेशानी क्यों, एक बार चुनाव से जनता की भागीदारी कम होने का खतरा
सार
भाजपा लगातार राष्ट्रीय मुद्दों की राजनीति कर रही है। वह क्षेत्रीय क्षत्रपों को उभारने की बजाय राष्ट्रीय नायकों को गढ़कर उनके इर्द-गिर्द अपना पूरा चुनाव लड़ने की रणनीति लगातार अपना रही है। ऐसे में यदि पूरा चुनाव राष्ट्रीय मुद्दों पर हो तो स्वाभाविक तौर पर इसे उसका कुछ लाभ मिल सकता है।
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One Nation One Election
- फोटो : Amar Ujala
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विस्तार
केंद्र सरकार धीरे-धीरे 'एक देश एक चुनाव' की ओर बढ़ रही है। उसका मानना है कि इससे देश को बार-बार के चुनावों से मुक्ति मिलेगी और सरकारों को विकास के लिए ज्यादा समय मिलेगा। लेकिन विपक्षी दलों की राय है कि इससे भाजपा को बढ़त मिल सकती है। वह राष्ट्रवाद, हिंदुत्व और ऐसे धार्मिक मुद्दों पर चुनाव लड़ती है, जिसका राष्ट्रीय स्तर पर एक साथ चुनाव होने पर उसे एक तरफा फायदा मिल सकता है, जबकि विपक्षी दलों को इसका नुकसान हो सकता है। विशेषकर क्षेत्रीय दलों को डर है कि एक साथ चुनाव से उनके स्थानीय मुद्दों पर राष्ट्रीय मुद्दे भारी पड़ेंगे और उन्हें इसका नुकसान हो सकता है।
दरअसल, भाजपा लगातार राष्ट्रीय मुद्दों की राजनीति कर रही है। वह क्षेत्रीय क्षत्रपों को उभारने की बजाय राष्ट्रीय नायकों को गढ़कर उनके इर्द-गिर्द अपना पूरा चुनाव लड़ने की रणनीति लगातार अपना रही है। ऐसे में यदि पूरा चुनाव राष्ट्रीय मुद्दों पर हो तो स्वाभाविक तौर पर इसे उसका कुछ लाभ मिल सकता है। लेकिन देश में लोकसभा चुनावों के साथ हुए कई विधानसभा चुनावों के परिणाम बताते हैं कि कई बार जनता एक साथ चुनाव होने पर भी केंद्र में किसी दूसरी पार्टी और राज्य में किसी दूसरी पार्टी को वोट देती है। ऐसे में यह कहना पूरी तरह सही नहीं होगा कि राष्ट्रीय मुद्दों पर चुनाव होने से केवल भाजपा को ही लाभ हो सकता है।
'सत्ता पर जनता का अंकुश हैं बीच के चुनाव'
कांग्रेस नेता विश्व विजय सिंह ने अमर उजाला से कहा कि देश का संविधान बनाने वाले हमारे नेताओं ने देश में ऐसी व्यवस्था बनाई है जिसमें सरकार, न्यायपालिका और कार्यपालिका में एक संतुलन बना रहे। इनके ऊपर जनता के अंकुश की व्यवस्था भी हमारे संविधान निर्माताओं ने चुनावों के माध्यम से कर दी।
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इस समय बीच-बीच में चुनाव होने के कारण सरकारों पर लगातार जनता का दबाव बना रहता है जिससे वे अलोकप्रिय निर्णय नहीं कर पाती। लेकिन यदि चुनाव केवल पांच साल बाद ही होंगे तो इससे चुनाव के बाद के कुछ वर्षों में सरकारों को मनमानी करने की छूट मिल जाएगी। इससे सरकार पर जनता के अंकुश में कमी आएगी। उन्होंने कहा कि एक बहुदलीय और बहुवर्गीय देश में एक साथ चुनाव की व्यवस्था किसी भी तरह उचित नहीं।
'अधिक खर्च की बात बहुत तर्कसंगत नहीं'
अर्थशास्त्री अरुण कुमार का कहना है कि सत्ता पक्ष यह दावा कर रहा है कि बार-बार के चुनावों से देश की अर्थव्यवस्था पर बोझ पड़ता है। लेकिन यह बात पूरी तरह सही नहीं है। हमारे देश की भारी भरकम अर्थव्यवस्था में चुनावों पर होने वाला खर्च बहुत सीमित है। ऐसे में यह कहना सही नहीं होगा कि चुनावों पर होने वाले खर्च के कारण अर्थव्यवस्था को बड़ा नुकसान होता है।
चुनावों पर खर्च से भी अर्थव्यवस्था को गति
इसका एक पहलू यह भी है कि किसी अर्थव्यवस्था में पैसा झोंककर ही अर्थव्यवस्था को गति देने का उपाय सभी सरकारें करती रही हैं। ऐसे में यदि चुनावों में अधिक पैसा लगता है तो भी यह अर्थव्यवस्था को गति देने वाला कदम माना जाना चाहिए। चुनाव के समय राजनीतिक दलों-उम्मीदवारों को पोस्टर, बैनर, प्रचार सामग्री, रैली, प्रदर्शन, रोड शो, कार्यकर्ताओं के खानपान और आवागमन में भारी खर्च करना पड़ता है तो यह पैसा निचले स्तर के लोगों की जेब में जाता है। इससे अर्थव्यवस्था को गति ही मिलती है। ऐसे में केवल इस आधार पर बीच-बीच में चुनावों का विरोध नहीं किया जाना चाहिए।
गलत तर्क दे रही सरकार- आम आदमी पार्टी
आम आदमी पार्टी की राष्ट्रीय प्रवक्ता प्रियंका कक्कड़ ने अमर उजाला से कहा कि सरकार एक देश एक चुनाव के पक्ष में गलत तर्क दे रही है। दिल्ली में उनकी सरकार को आए हुए दस साल से अधिक हो चुके हैं, लेकिन चुनावों के बीच में भी उनकी सरकार लगातार जनहित के कार्य करती रही है। उन्होंने कहा कि पांच बार में एक बार जनता का सामना करने से बेहतर है कि चुनावों में जनता की भागीदारी बढ़ाई जाए।
प्रियंका कक्कड़ ने कहा कि सत्ता पर जनता के अंकुश को समाप्त करने से सरकार अपनी इच्छा से ऐसे निर्णय करने लगेगी जिससे लोगों को नुकसान हो सकता है। उन्होंने कहा कि नोटबंदी करने का फैसला किसी के पक्ष में नहीं गया, लेकिन सरकार ने बिना किसी से सलाह लिए इसे लागू कर दिया। इसलिए बीच-बीच में चुनाव होते रहने चाहिए जिससे सरकार जनता के दबाव में रहे और कोई गलत निर्णय न ले सके।
क्षेत्रीय पहचान बढ़ाने की आवश्यकता
राजनीतिक विश्लेषक विवेक सिंह ने अमर उजाला से कहा कि हमारे देश में बहुलता है। क्षेत्रीय दलों ने क्षेत्रीय भावनाओं को राजनीतिक स्वरूप देकर हमारे लोकतंत्र में उनकी भागीदारी बढ़ाने का काम किया है। यदि चुनाव केवल राष्ट्रीय मुद्दों पर हुए तो इससे क्षेत्रीय पहचानों को उभारने में कमजोरी आ सकती है। इसलिए राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय चुनावों के बीच का अंतर और समय लगातार बरकरार रखना चाहिए।
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दरअसल, भाजपा लगातार राष्ट्रीय मुद्दों की राजनीति कर रही है। वह क्षेत्रीय क्षत्रपों को उभारने की बजाय राष्ट्रीय नायकों को गढ़कर उनके इर्द-गिर्द अपना पूरा चुनाव लड़ने की रणनीति लगातार अपना रही है। ऐसे में यदि पूरा चुनाव राष्ट्रीय मुद्दों पर हो तो स्वाभाविक तौर पर इसे उसका कुछ लाभ मिल सकता है। लेकिन देश में लोकसभा चुनावों के साथ हुए कई विधानसभा चुनावों के परिणाम बताते हैं कि कई बार जनता एक साथ चुनाव होने पर भी केंद्र में किसी दूसरी पार्टी और राज्य में किसी दूसरी पार्टी को वोट देती है। ऐसे में यह कहना पूरी तरह सही नहीं होगा कि राष्ट्रीय मुद्दों पर चुनाव होने से केवल भाजपा को ही लाभ हो सकता है।
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'सत्ता पर जनता का अंकुश हैं बीच के चुनाव'
कांग्रेस नेता विश्व विजय सिंह ने अमर उजाला से कहा कि देश का संविधान बनाने वाले हमारे नेताओं ने देश में ऐसी व्यवस्था बनाई है जिसमें सरकार, न्यायपालिका और कार्यपालिका में एक संतुलन बना रहे। इनके ऊपर जनता के अंकुश की व्यवस्था भी हमारे संविधान निर्माताओं ने चुनावों के माध्यम से कर दी।
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इस समय बीच-बीच में चुनाव होने के कारण सरकारों पर लगातार जनता का दबाव बना रहता है जिससे वे अलोकप्रिय निर्णय नहीं कर पाती। लेकिन यदि चुनाव केवल पांच साल बाद ही होंगे तो इससे चुनाव के बाद के कुछ वर्षों में सरकारों को मनमानी करने की छूट मिल जाएगी। इससे सरकार पर जनता के अंकुश में कमी आएगी। उन्होंने कहा कि एक बहुदलीय और बहुवर्गीय देश में एक साथ चुनाव की व्यवस्था किसी भी तरह उचित नहीं।
'अधिक खर्च की बात बहुत तर्कसंगत नहीं'
अर्थशास्त्री अरुण कुमार का कहना है कि सत्ता पक्ष यह दावा कर रहा है कि बार-बार के चुनावों से देश की अर्थव्यवस्था पर बोझ पड़ता है। लेकिन यह बात पूरी तरह सही नहीं है। हमारे देश की भारी भरकम अर्थव्यवस्था में चुनावों पर होने वाला खर्च बहुत सीमित है। ऐसे में यह कहना सही नहीं होगा कि चुनावों पर होने वाले खर्च के कारण अर्थव्यवस्था को बड़ा नुकसान होता है।
चुनावों पर खर्च से भी अर्थव्यवस्था को गति
इसका एक पहलू यह भी है कि किसी अर्थव्यवस्था में पैसा झोंककर ही अर्थव्यवस्था को गति देने का उपाय सभी सरकारें करती रही हैं। ऐसे में यदि चुनावों में अधिक पैसा लगता है तो भी यह अर्थव्यवस्था को गति देने वाला कदम माना जाना चाहिए। चुनाव के समय राजनीतिक दलों-उम्मीदवारों को पोस्टर, बैनर, प्रचार सामग्री, रैली, प्रदर्शन, रोड शो, कार्यकर्ताओं के खानपान और आवागमन में भारी खर्च करना पड़ता है तो यह पैसा निचले स्तर के लोगों की जेब में जाता है। इससे अर्थव्यवस्था को गति ही मिलती है। ऐसे में केवल इस आधार पर बीच-बीच में चुनावों का विरोध नहीं किया जाना चाहिए।
गलत तर्क दे रही सरकार- आम आदमी पार्टी
आम आदमी पार्टी की राष्ट्रीय प्रवक्ता प्रियंका कक्कड़ ने अमर उजाला से कहा कि सरकार एक देश एक चुनाव के पक्ष में गलत तर्क दे रही है। दिल्ली में उनकी सरकार को आए हुए दस साल से अधिक हो चुके हैं, लेकिन चुनावों के बीच में भी उनकी सरकार लगातार जनहित के कार्य करती रही है। उन्होंने कहा कि पांच बार में एक बार जनता का सामना करने से बेहतर है कि चुनावों में जनता की भागीदारी बढ़ाई जाए।
प्रियंका कक्कड़ ने कहा कि सत्ता पर जनता के अंकुश को समाप्त करने से सरकार अपनी इच्छा से ऐसे निर्णय करने लगेगी जिससे लोगों को नुकसान हो सकता है। उन्होंने कहा कि नोटबंदी करने का फैसला किसी के पक्ष में नहीं गया, लेकिन सरकार ने बिना किसी से सलाह लिए इसे लागू कर दिया। इसलिए बीच-बीच में चुनाव होते रहने चाहिए जिससे सरकार जनता के दबाव में रहे और कोई गलत निर्णय न ले सके।
क्षेत्रीय पहचान बढ़ाने की आवश्यकता
राजनीतिक विश्लेषक विवेक सिंह ने अमर उजाला से कहा कि हमारे देश में बहुलता है। क्षेत्रीय दलों ने क्षेत्रीय भावनाओं को राजनीतिक स्वरूप देकर हमारे लोकतंत्र में उनकी भागीदारी बढ़ाने का काम किया है। यदि चुनाव केवल राष्ट्रीय मुद्दों पर हुए तो इससे क्षेत्रीय पहचानों को उभारने में कमजोरी आ सकती है। इसलिए राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय चुनावों के बीच का अंतर और समय लगातार बरकरार रखना चाहिए।