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West Bengal: 36 साल जेल में रहने के बाद 104 वर्षीय शख्स रिहा, अपने भाई की हत्या के आरोप में काट रहा था सजा
Wed, 04 Dec 2024 11:56 AM IST
श्वेता महतो
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कोल
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कोल
Published by: श्वेता महतो
Updated Wed, 04 Dec 2024 11:56 AM IST
सार
मंडल के बेटे ने बताया कि उनके पिता को सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद रिहा किया गया था। उन्होंने कहा कि जेल में रहने के दौरान यदि कैदी कोई अनुचित कार्य नहीं करता है तो अपनी सजा काटने के बाद वह रिहाई का हकदार है।
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सांकेतिक तस्वीर
- फोटो : istock
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विस्तार
पश्चिम बंगाल में मालदा के सुधारगृह में 36 साल तक सजा काटने के बाद 104 वर्षीय बुजुर्ग को रिहा कर दिया गया। पिछले महीने सुप्रीम कोर्ट की तरफ से उन्हें राहत मिली थी। अदालत ने उन्हें अंतरिम जमानत दे दी थी। पश्चिम बंगाल के मालदा जिले में जन्मे रसिक्त चंद्र मंडल 1988 में की गई एक हत्या के दोषी हैं। उन्होंने जमीन विवाद को लेकर अपने भाई की हत्या की थी। अदालत ने उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। उन्हें बीच में एक साल के लिए जमानत पर रिहा किया गया था और जमानत की अवधि समाप्त होने के बाद उन्हें फिर से जेल में डाल दिया गया। जेल से रिहा होने के बाद रसिक्त मंडल ने पत्रकारों से बात की। उन्होंने बताया कि वह अब बागवानी करेंगे और परिवार के साथ समय बिताएंगे। बता दें कि रसिक्त चंद्र मंडल का जन्म 1920 में मालदा जिले के एक गुमनाम गांव में हुआ था। इसी साल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने अंग्रेजों के खिलाफ असहयोग आंदोलन शुरू किया था।
पत्रकारों से बात करते हुए रसिक्त मंडल ने कहा, "मुझे नहीं मालूम कि मैंने कितने साल जेल में गुजारे। यह कभी न खत्म होने वाला लग रहा था। मुझे यह भी याद नहीं कि मुझे यहां कब लाया गया था। अब मैं बाहर आ गया हूं। अब मैं अपने आंगन में छोटे-छोटे पौधों की देखभाल करूंगा। मैंने अपने परिवार को बहुत याद किया। मैं अब उनके साथ रहना चाहता हूं।"
बेटे ने जताई खुशी
मंडल के बेटे ने बताया कि उनके पिता को सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद रिहा किया गया था। उन्होंने कहा, "जेल में रहने के दौरान यदि कैदी कोई अनुचित कार्य नहीं करता है तो अपनी सजा काटने के बाद वह रिहाई का हकदार है। मुझे खुशी है कि सुप्रीम कोर्ट ने उनकी रिहाई का रास्ता साफ कर दिया।"
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हत्या के मामले में हुी थी सजा
1988 में एक हत्या के मामले में 1994 में दोषी ठहराए जाने के बाद, जब वह 68 साल के थे, और आजीवन कारावास की सजा काट रहे थे। उन्हें उम्र संबंधी बीमारियों के कारण जेल से पश्चिम बंगाल के बालुरघाट के सुधार गृह में ट्रांसफर कर दिया गया था। सजा के खिलाफ उनकी अपील को 2018 में कलकत्ता हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया था। इसके बाद उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया, मगर यहां भी उसे निराशा हाथ लगी।
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पत्रकारों से बात करते हुए रसिक्त मंडल ने कहा, "मुझे नहीं मालूम कि मैंने कितने साल जेल में गुजारे। यह कभी न खत्म होने वाला लग रहा था। मुझे यह भी याद नहीं कि मुझे यहां कब लाया गया था। अब मैं बाहर आ गया हूं। अब मैं अपने आंगन में छोटे-छोटे पौधों की देखभाल करूंगा। मैंने अपने परिवार को बहुत याद किया। मैं अब उनके साथ रहना चाहता हूं।"
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बेटे ने जताई खुशी
मंडल के बेटे ने बताया कि उनके पिता को सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद रिहा किया गया था। उन्होंने कहा, "जेल में रहने के दौरान यदि कैदी कोई अनुचित कार्य नहीं करता है तो अपनी सजा काटने के बाद वह रिहाई का हकदार है। मुझे खुशी है कि सुप्रीम कोर्ट ने उनकी रिहाई का रास्ता साफ कर दिया।"
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हत्या के मामले में हुी थी सजा
1988 में एक हत्या के मामले में 1994 में दोषी ठहराए जाने के बाद, जब वह 68 साल के थे, और आजीवन कारावास की सजा काट रहे थे। उन्हें उम्र संबंधी बीमारियों के कारण जेल से पश्चिम बंगाल के बालुरघाट के सुधार गृह में ट्रांसफर कर दिया गया था। सजा के खिलाफ उनकी अपील को 2018 में कलकत्ता हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया था। इसके बाद उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया, मगर यहां भी उसे निराशा हाथ लगी।
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