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Hindi News ›   India News ›   Now the BSF's native dog Rampur Hound/Mudhol Hound will be in vogue in South Asian countries

Rampur Hound/Mudhol Hound: दक्षिण एशियाई मुल्कों में होगा बीएसएफ के देशी डॉग का जलवा, खुराक कम तो खर्च भी कम

Jitendra Bhardwaj जितेंद्र भारद्वाज
Updated Fri, 24 Oct 2025 07:00 PM IST
सार

अब 'रामपुर हाउंड'/'मुधोल हाउंड, इन दोनों नस्लों के देशी डॉग, डोबर्मन पिंसर, डच शेफर्ड, बेल्जियन शेफर्ड, जर्मन शेफर्ड और लैब्राडोर नस्ल के हाई ग्रेड कुत्तों को टक्कर दे रहे हैं। अब ये डॉग देश के सामरिक/संवेदनशील क्षेत्रों में तैनात हैं। भारत से लगती  पाकिस्तान और बांग्लादेश की सीमा, नक्सल प्रभावित इलाके हों या कोई अन्य ऑपरेशनल ड्यूटी, इन मोर्चों पर देशी डॉग ने खुद को साबित कर दिखाया है।

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Now the BSF's native dog Rampur Hound/Mudhol Hound will be in vogue in South Asian countries
दक्षिण एशियाई देशों में देशी डॉग्स का जलवा। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

सीमा सुरक्षा बल 'बीएसएफ' ने एक वह टॉस्क पूरा कर दिखाया, जिसे आसान तो बिल्कुल नहीं कहा जा सकता। भारत में दो नस्लों के देशी डॉग, जिन्हें कोई पहचान नहीं रहा था, बीएसएफ ने उन्हें न केवल पहचान दी, बल्कि उन्हें ट्रेंड कर देश दुनिया के पेशेवर खोजी कुत्तों की श्रेणी में लाकर खड़ा कर दिया। इतना ही नहीं, अब 'रामपुर हाउंड'/'मुधोल हाउंड, इन दोनों नस्लों के देशी डॉग, डोबर्मन पिंसर, डच शेफर्ड, बेल्जियन शेफर्ड, जर्मन शेफर्ड और लैब्राडोर नस्ल के हाई ग्रेड कुत्तों को टक्कर दे रहे हैं। अब ये डॉग देश के सामरिक/संवेदनशील क्षेत्रों में तैनात हैं। भारत से लगती  पाकिस्तान और बांग्लादेश की सीमा, नक्सल प्रभावित इलाके हों या कोई अन्य ऑपरेशनल ड्यूटी, इन मोर्चों पर देशी डॉग ने खुद को साबित कर दिखाया है। आने वाले समय में दक्षिण एशिया के मुल्कों में बीएसएफ के देशी डॉग 'रामपुर हाउंड'/'मुधोल हाउंड का जलवा होगा। खुराक भी कम तो खर्च भी कम, इससे संभव है कि समान भौगोलिक परिस्थितियों वाले कई दूसरे देश भी बीएसएफ द्वारा ट्रेंड 'रामपुर हाउंड'/'मुधोल हाउंड' को अपने सिक्योरिटी एस्टेब्लिशमेंट/मूवमेंट का हिस्सा बनाएंगे। 

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बता दें कि किसी जमाने में मराठा सेनाओं और ब्रिटिश अफसरों के शिकारी देशी डॉग, जिन्हें 'रामपुर हाउंड'/'मुधोल हाउंड' के नाम से जाता था, अब ने भारतीय मूल की इन श्वान-नस्लों की पहचान कर उन्हें राष्ट्र के पटल पर स्थापित कर दिया है। बीएसएफ महानिदेशक दलजीत चौधरी बताते हैं कि इस ऐतिहासिक परंपरा को एक नई दिशा तब प्राप्त हुई जब जनवरी 2018 में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने टेकनपुर स्थित बीएसएफ के राष्ट्रीय श्वान प्रशिक्षण केंद्र (एनटीसीडी) का दौरा किया। इस अवसर पर उन्होंने भारतीय नस्लों के श्वानों को सुरक्षा बलों में प्रोत्साहित करने की आवश्यकता पर बल दिया। उनका यह दूरदर्शी मार्गदर्शन, स्वदेशी नस्लों को पहचान दिलाने, उन्हें प्रशिक्षित करने तथा उन्हें परिचालन भूमिकाओं में सम्मिलित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल सिद्ध हुआ। इसके बाद बीएसएफ ने यह तय किया कि देशी डॉग, सुरक्षा के मोर्चे पर किसी से कम नहीं रहेंगे। 

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बीएसएफ के डीआईजी 'वेटनरी' डॉ. जीएस नाग बताते हैं, अमूमन एक पेशेवर खोजी डॉग को तैयार करने में लगभग साढ़े पांच लाख रुपये खर्च हो जाते हैं। स्प्रिंगर स्पेनियल डॉग, अफगान हाउंड, कॉकर स्पेनियल, डोबर्मन पिंसर, डच शेफर्ड, बेल्जियन शेफर्ड, जर्मन शेफर्ड और लैब्राडोर नस्ल, ये करीब आठ साल की आयु तक ही काम करते हैं। उसके बाद सुरक्षा बलों में इन्हें रिटायर कर दिया जाता है। इनकी खुराक भी अधिक रहती है। दूसरी तरफ, अगर 'रामपुर हाउंड'/'मुधोल हाउंड' नस्ल के डॉग की बात करें तो इनकी खुराक और ट्रेनिंग का खर्च उतना नहीं होता। हालांकि अभी तक इन्हें ट्रेंड करने के खर्च को सटीक आंकड़े में नहीं बता सकते, मगर इतना कह सकते हैं कि वह खर्च दूसरे पेशेवर कुत्तों के मुकाबले कम है। अंदाजा है कि इनकी ट्रेनिंग पर लगभग 4-4.50 लाख रुपये खर्च आएगा। चूंकि ये शिकारी कुत्ते रहे हैं, इसलिए इन्हें मानव फ्रेंडली व्यवहार तक लाने में काफी वक्त लगा है। अब ये मनुष्यों के बीच सहज भाव से रह रहे हैं।  

डीआईजी 'वेटनरी' डॉ. जीएस नाग ने बताया, सबसे खास बात है कि इन दोनों नस्लों के कुत्ते, बहुत फुर्तीले होते हैं। लिहाजा, ये शिकारी डॉग रहे हैं, तो ऐसे में ये बहुत आक्रामक होते हैं। लंबी कूद हो या ज्यादा हाइट, ये डॉग आसानी से अपनी ड्यूटी पूरी कर लेते हैं। इनके दूसरे गुणों में उच्च फुर्ती, सहनशक्ति, अनुकूलनशीलता, रोग प्रतिरोधक क्षमता एवं न्यूनतम देखभाल की आवश्यकता, शामिल है। दूसरी नस्ल के डॉग के मुकाबले ये कुत्ते एक तिहायी खाना कम खाते हैं। साथ ही इनका जीवनकाल भी, दो तीन साल अधिक रहता है। ये डॉग पांच से नौ माह में ट्रेंड हो जाते हैं। अभी दूसरे सुरक्षा बलों से इन नस्लों के डॉग की मांग आ रही है। पुलिस संगठन भी संपर्क में हैं। फिलहाल हिमाचल प्रदेश ने सबसे पहले 'रामपुर हाउंड' और 'मुधोल हाउंड' डॉग की मांग की है। उम्मीद है कि बहुत जल्द इन दोनों नस्लों के डॉग, दक्षिण एशिया के देशों, अफगानिस्तान, बांग्लादेश, भूटान, भारत, मालदीव, नेपाल, पाकिस्तान और श्रीलंका आदि में अपनी पहचान बना सकते हैं। मिलती जुलती भौगोलिक स्थितियों वाले देशों में इन डॉग को काम करने में कोई परेशानी नहीं आएगी। 

बीएसएफ ने कई वर्षों की मेहनत के बाद अब भारतीय मूल की श्वान-नस्लों की पहचान कर उन्हें राष्ट्र के पटल पर स्थापित कर दिया है। अब कोई भी टॉस्क, चाहे किसी भवन में या जंगल में, ये दोनों नस्लों के डॉग उसे पूरा करते हैं। विस्फोटक पदार्थ या ड्रग, इनकी पहचान ये बखूबी कर रहे हैं। यही वजह है कि इन्हें भारत पाकिस्तान और भारत बांग्लादेश बॉर्डर पर तैनात किया गया है। इनकी प्रभावशाली कार्यक्षमता ने स्वदेशी नस्लों को सुरक्षा बलों की परिचालन संरचना में एक सुदृढ़ स्थान प्रदान किया है। 'रामपुर हाउंड', उत्तर प्रदेश के रामपुर रियासत से संबंधित है, जिसे नवाबों द्वारा गीदड़ों व अन्य बड़े शिकार के लिए विकसित किया गया था। यह नस्ल अपनी गति, सहनशक्ति व निर्भीकता के लिए प्रसिद्ध है। 

'मुधोल हाउंड', जो दक्कन के पठार का मूल निवासी है, पारंपरिक रूप से शिकार व सुरक्षा कार्यों में प्रयुक्त होता रहा है। इसे मराठा सेनाओं से भी जोड़ा जाता है। बाद में राजा मलोजीराव घोरपड़े द्वारा इसका संरक्षण एवं संवर्धन किया गया, और उन्होंने इसे ब्रिटिश अधिकारियों के समक्ष "कारवां हाउंड" के रूप में प्रस्तुत किया। डीआईजी 'वेटनरी' डॉ. जीएस नाग बताते हैं कि ये डॉग, दूसरे कुत्तों के मुकाबले ज्यादा स्वस्थ रहते हैं। ये आसानी से बीमार नहीं पड़ते। मौसम बदलने का भी इन पर ज्यादा असर नहीं होता। ये गुण इन्हें भारत के विविध भौगोलिक और जलवायु क्षेत्रों में विशेष रूप से प्रभावी बनाते हैं। 

बीएसएफ, न केवल इन श्वानों को टेकनपुर स्थित राष्ट्रीय श्वान प्रशिक्षण केंद्र में प्रशिक्षित कर रहा है, बल्कि इनके प्रजनन का कार्य भी सक्रिय रूप से कर रहा है। यह पहल अब सहायक 'के9' प्रशिक्षण केंद्रों और क्षेत्रीय इकाइयों तक विस्तारित हो चुकी है, जिससे भारतीय नस्लों के श्वानों की संख्या में निरंतर वृद्धि हो रही है। वर्तमान में, 150 से अधिक भारतीय नस्लों के श्वान देश के विभिन्न सामरिक एवं संवेदनशील क्षेत्रों में तैनात हैं। इनकी सफलता का प्रमाण वर्ष 2024 के अखिल भारतीय पुलिस ड्यूटी मीट (लखनऊ) में मिला, जहां बीएसएफ की "रिया", एक मुधोल हाउंड, ने सर्वश्रेष्ठ ट्रैकर ट्रेड श्वान एवं 'डॉग ऑफ द मीट' दोनों खिताब अर्जित किए। यह पहला अवसर था जब किसी भारतीय नस्ल के श्वान ने 116 विदेशी नस्लों को पराजित कर यह उपलब्धि प्राप्त की। यह भारतीय श्वानों की उत्कृष्टता, अनुशासन एवं क्षमताओं का जीवंत प्रमाण है। इस गौरवशाली विरासत को आगे बढ़ाते हुए, आगामी राष्ट्रीय एकता दिवस परेड में, जो एकता नगर, गुजरात में आयोजित होगी, केवल भारतीय नस्लों के श्वानों की एक मार्चिंग टुकड़ी बीएसएफ का प्रतिनिधित्व करेगी। 

भारतीय नस्लों के श्वानों का बीएसएफ में समावेश, प्रशिक्षण, प्रजनन एवं तैनाती, भारत की आत्मनिर्भरता, स्वदेशी विरासत एवं राष्ट्रीय गौरव के प्रति प्रतिबद्धता का सशक्त उदाहरण है। यह पहल न केवल भारत की परंपरागत नस्लों को पुनर्जीवित करती है, अपितु यह भी प्रमाणित करती है कि भारत आत्मविश्वास, शक्ति और गरिमा के साथ अपने पथ पर अग्रसर है। इस मार्ग में भारतीय श्वान राष्ट्र सेवा में अग्रिम पंक्ति में हैं। 

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