नूर इनायत खान: वो राजकुमारी जो अंग्रेजों की जासूस बनीं
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नूर इनायत खान मैसूर के महाराजा टीपू सुल्तान की वंशज थीं। वही मशहूर टीपू सुल्तान जिन्होंने ब्रितानी शासन के सामने झुकने से इनकार कर दिया था। टीपू सुल्तान 1799 में अंग्रेजों के खिलाफ लड़ते हुए मारे गए थे। नूर के वजूद के इस पहलू को देखते हुए ये अंदाजा लगाना मुश्किल है कि दूसरे विश्व युद्ध के दौरान वे कैसे एक ब्रितानी जासूस बनी होंगी?
और अपनी मौत के बाद एक वॉर हीरो। मुमकिन है कि कोई ये समझ न पाए कि उन्होंने किस तरह से अपनी जिंदगी बदली होगी और उनकी जिंदगी के आखिरी बरस किस तरह से बीते होंगे। नूर की जिंदगी पर 'द स्पाई प्रिसेंज: द लाइफ ऑफ नूर इनायत खान' नाम से किताब लिखने वाली श्राबणी बसु कहती हैं, "नूर को संगीत से लगाव था।
वह गाने भी लिखती थीं। वह वीणा भी बजाती थीं और उन्होंने बच्चों के लिए कहानियां भी लिखीं।"
उनके अब्बा हिंदुस्तान से थे और सूफी मत को मानते थे।
नूर का जन्म 1914 में मॉस्को में हुआ था लेकिन उनकी परवरिश फ्रांस में हुई और वे रहीं ब्रिटेन में। उनके अब्बा हिंदुस्तान से थे और सूफी मत को मानते थे। उनकी मां अमरीकन थीं लेकिन उन्होंने भी बाद में सूफी मत को अपना लिया था। दूसरे विश्व युद्ध के समय से परिवार पेरिस में रहता था।
लेकिन जर्मनी के हमले के बाद उन लोगों ने देश छोड़ने का फैसला किया। श्राबणी बसु नूर इनायत खान की याद में एक संगठन भी चलाती हैं। उन्होंने बताया, "नूर एक वालंटियर के तौर पर ब्रितानी सेना में शामिल हो गईं। वह उस देश की मदद करना चाहती थीं जिसने उन्हें अपनाया था। उनका मकसद फासीवाद से लड़ना था।"
बाद में वो एयरफोर्स की सहायक महिला यूनिट में भर्ती हो गईं। ये 1940 की बात है। फ्रेंच बोलने में उनकी महारत ने स्पेशल ऑपरेशन एग्जिक्यूटिव के सदस्यों का ध्यान अपनी ओर खींचा। इस गुप्त संगठन को ब्रितानी प्रधानमंत्री चर्चिल ने बनाया था जिसका काम नाजी विस्तारवाद के दौरान यूरोप में छापामार कार्रवाई को बढ़ावा देना था।
नूर एक सूफी थीं, इसलिए वे हिंसा पर यकीन नहीं करती थीं।
खुफिया अभियान
महज तीन साल के भीतर 1943 में नूर ब्रितानी सेना की एक सीक्रेट एजेंट बन गईं। श्राबनी बसु कहती हैं कि नूर एक सूफी थीं, इसलिए वे हिंसा पर यकीन नहीं करती थीं लेकिन उन्हें मालूम था कि इस जंग को उन्हें लड़ना था। नूर की विचारधारा की वजह से उनके कई सहयोगी ऐसा सोचते थे कि उनका व्यक्ति खुफिया अभियानों के लिए उपयुक्त नहीं है।
एक मौके पर तो उन्होंने यह भी कह दिया कि मैं झूठ नहीं बोल सकूंगी। बसु बताती हैं, "ये बात किसी ऐसे सिक्रेट एजेंट की जिंदगी का हिस्सा नहीं हो सकती हैं जो अपना असली नाम तक का इस्तेमाल न करता हो और जिसके पास एक फर्जी पासपोर्ट हो।"
खतरनाक भूमिका
ब्रिटेन के नेशनल आर्काइव्स के दस्तावेजों के मुताबिक इसके बावजूद नूर के आला अफसरों को लगता था कि उनका किरदार एक दृढ़ इरादे वाली महिला का है। उन्हें जो जिम्मेदारी दी गई, वो बहुत खतरनाक किस्म की थी। नूर को एक रेडियो ऑपरेटर के तौर पर ट्रेन किया गया और जून, 1943 में उन्हें फ्रांस भेज दिया गया।
इस तरह के अभियान में पकड़े जाने वाले लोगों को हमेशा के लिए बंधक बनाए जाने का खतरा रहता था। जर्मन सीक्रेट पुलिस 'गेस्टापो' इन इलेक्ट्रॉनिक सिग्नल्स की पहचान और इनके स्रोत को पकड़ सकती थी। बसु के मुताबिक उनकी खतरनाक भूमिका को देखते हुए कई लोग मानते थे कि फ्रांस में वह छह हफ्ते से अधिक जीवित नहीं रह पाएंगी। नूर के साथ काम कर रहे दूसरे एजेंटों की जल्द ही पहचान कर ली गई। उनमें से ज्यादातर गिरफ्तार कर लिए गए लेकिन नूर फरार होने में कामयाब रहीं।
लेकिन अक्टूबर, 1943 में नूर धोखे का शिकार हो गईं।
धोखे का शिकार
इसके बाद भी जर्मन पुलिस की नाक के नीच नूर ने फ्रांस में अपना ऑपरेशन जारी रखा। लेकिन अक्टूबर, 1943 में नूर धोखे का शिकार हो गईं। श्राबनी बसु कहती हैं, "उनके किसी सहयोगी की बहन ने जर्मनों के सामने उनका राज जाहिर कर दिया। वह लड़की ईर्ष्या का शिकार हो गई थी क्योंकि नूर हसीन थीं और हर कोई उन्हें पसंद करता था।"
इसके बाद जर्मन पुलिस ने उन्हें एक अपार्टमेंट से गिरफ्तार कर लिया। लेकिन नूर ने आसानी से सरेंडर नहीं किया। वह लड़ीं और बसु के मुताबिक छह हट्टे-कट्टे पुलिस अधिकारियों ने मिलकर उन्हें काबू में किया। दो मौकों पर उन्होंने भागने की कोशिश की लेकिन वे कामयाब नहीं हो पाईं। जर्मन एजेंटों ने ब्रितानी ऑपरेशन के बारे में जानकारी निकलवाने के लिए नूर को बहुत प्रताड़ित किया।
श्राबनी बसु कहती हैं, "लेकिन वे नूर का असली नाम तक नहीं पता कर पाए। उन्हें ये कभी पता नहीं लगा कि वे भारतीय मूल की थीं।"
महिला जासूस
लेकिन नूर अपने नोटबुक्स नष्ट नहीं कर पाई थीं और इससे मिली जानकारी के आधार पर जर्मनों ने कुछ ब्रितानी एजेंटों को गिरफ्तार कर लिया। कैदी के रूप में एक साल गुजारने के बाद उन्हें दक्षिणी जर्मनी के एक यातना शिविर में भेज दिया गया जहां उन्हें नए सिरे से प्रताड़ित किया गया। बाद में नाजियों ने उन्हें तीन अन्य महिला जासूसों के साथ गोली मार दी।
मौत के वक्त उनकी उम्र महज 30 साल थी। इस घटना के साक्षियों का कहना है कि मौत के वक्त उन्होंने आजादी का नारा दिया था। नूर की बहादुरी को उनकी मौत के बाद फ्रांस में 'वॉर क्रॉस' देकर सम्मानित किया गया। ब्रिटेन में उन्हें क्रॉस सेंट जॉर्ज दिया गया। अब तक केवल तीन और महिलाओं को इस सम्मान से नवाजा गया है।